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ह्यूमन राइट्स वॉच रिपोर्ट 2024 : भारत सरकार और प्रधानमंत्री की छवि को धूमिल करता एकतरफा चिट्ठा

सार

एचआरडब्ल्यू रिपोर्ट में यह तथाकथित दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषणों में मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा भड़काने के उद्देश्य से घृणा फैलानेवाले भाषण तथा इस्लामोफोबिक बयानबाजी की भरमार थी।

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रिपोर्ट में मुसलमानों पर लक्षित हमले के रूप में "बुलडोजर न्याय" का चित्रण एक घोर गलत चित्रण है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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14 अगस्त 2024 को ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने, "भारत : नफरत फैलाने वाले भाषणों ने मोदी के चुनाव अभियान को बढ़ावा दिया" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट 2024 के चुनाव अभियान की विकृत और पक्षपातपूर्ण कहानी प्रस्तुत करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बदनाम करने का एक जानबूझकर किया गया दुष्प्रचार प्रतीत होता है।

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दरअसल, उक्त रिपोर्ट कुछ चुनिंदा बयानों की व्याख्या करती है, घटनाओं को गलत तरीके से पेश करती है और प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को नफरत और विभाजन के वाहक के रूप में चित्रित करने के लिए संदर्भ को नजरअंदाज करती है।

रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ने और उसका विश्लेषण करने के बाद, यह एक बहुत ही दोषपूर्ण और भ्रामक विवरण है, जो अभियान की प्रकृति और भारत में राजनीतिक माहौल को गलत तरीके से दर्शाता है। रिपोर्ट में घटनाक्रमों को संदर्भ से काटकर हकीकत को नजरअंदाज किया गया है।
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एचआरडब्ल्यू रिपोर्ट में यह तथाकथित दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषणों में मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा भड़काने के उद्देश्य से घृणा फैलाने वाले भाषण तथा इस्लामोफोबिक बयानबाजी की भरमार थी। यह दावा किसी भी तरह सत्य एवं तथ्य पर आधारित नहीं हो सकता, बल्कि यह पूरी तरह से अतिशयोक्तिपूर्ण है।


यह रिपोर्ट इन भाषणों के व्यापक संदर्भ को नजरअंदाज करती है। राजनीतिक अभियान, विशेष रूप से भारत जैसे विविधतापूर्ण तथा जटिल लोकतंत्र में, अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान तथा सामाजिक सामंजस्य पर जोरदार बहसें शामिल होती हैं। प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए हर संदर्भ राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों तथा तुष्टीकरण की राजनीति के खतरों को उजागर करने के उद्देश्य से थे, न कि घृणा या हिंसा भड़काने के उद्देश्य से।

रिपोर्ट में मुसलमानों पर लक्षित हमले के रूप में "बुलडोजर न्याय" का चित्रण एक घोर गलत चित्रण है। यह शब्द अवैध अतिक्रमणों तथा निर्माणों पर कार्रवाई को संदर्भित करता है, जो कानून का उल्लंघन करते हैं, चाहे इसमें शामिल लोगों की धार्मिक या सामुदायिक संबद्धता कुछ भी हो। यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि ये कार्य कानून के शासन को बनाए रखने और यह सुनिश्चित करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा हैं, जहां सभी नागरिक, चाहे उनकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो, समान कानूनी मानकों के अधीन हों।

कानून प्रवर्तन एजेंसियों का कर्तव्य है कि वे गैरकानूनी प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई करें। HRW रिपोर्ट का दावा है कि मोदी प्रशासन के तहत अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा सामान्य हो गई है। यह तथ्य पूरी तरह से निराधार है। भारत, किसी भी अन्य बड़े और विविध देश की तरह, सांप्रदायिक सद्भाव से संबंधित चुनौतियों का सामना करता है। हालांकि, यह सुझाव देना गलत है कि सरकार ने दंड से मुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। 

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रिपोर्ट में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) पर भाजपा द्वारा चुनाव संहिता के उल्लंघन को संबोधित करने में विफल रहने का भी आरोप लगाया गया है। - फोटो : X/@narendramodi
इसके विपरीत, मोदी सरकार ने सांप्रदायिक तनावों को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसमें सख़्त कानून प्रवर्तन, अंतर-धार्मिक संवाद को बढ़ावा देना और हिंसा भड़काने या इसमें भाग लेनेवालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना शामिल है। उल्लेखनीय है कि HRW रिपोर्ट मोदी के अभियान के बयानों की चुनिंदा व्याख्या करती है, ताकि उन्हें विभाजनकारी और सांप्रदायिक के रूप में चित्रित किया जा सके।

हालांकि, इन बयानों को चुनावी बयानबाजी के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए, जहां राजनीतिक स्पेक्ट्रम के नेता अपने विरोधियों की तीखी आलोचना करते हैं। मोदी द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं का संदर्भ और सांस्कृतिक संरक्षण के बारे में चिंताएं राष्ट्रीय पहचान पर एक वैध चर्चा का हिस्सा हैं और इसे किसी समुदाय पर हमला नहीं माना जाना चाहिए।

रिपोर्ट में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) पर भाजपा द्वारा चुनाव संहिता के उल्लंघन को संबोधित करने में विफल रहने का भी आरोप लगाया गया है। यह आरोप निराधार है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में ECI की स्वतंत्र और मजबूत भूमिका की अवहेलना करता है। ECI ने लगातार चुनावी कदाचारों की निगरानी की है और इसके खिलाफ कार्रवाई की है, चाहे इसमें शामिल कोई भी पक्ष हो।

रिपोर्ट में प्रस्तुत दावे भारत में सांप्रदायिक तनाव की एकतरफा तस्वीर पेश करने का प्रयास करते हैं, स्थानीय विवादों और व्यापक सामाजिक मुद्दों की जटिलताओं की अनदेखी करते हुए हर घटना के लिए हिंदू समूहों को गलत तरीके से जिम्मेदार ठहराते हैं। इसके अलावा, रिपोर्ट यह पहचानने में विफल रहती है कि भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियां इन मुद्दों को संबोधित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही हैं और अपराधियों को उनके धार्मिक या राजनीतिक जुड़ावों के बावजूद न्याय के कटघरे में लाया जा रहा है।

आपराधिक जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी अटकलें और निराधार हैं। भारत की न्यायपालिका और जांच निकाय स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता के बारे में किसी भी चिंता को दूर करने के लिए मजबूत कानूनी तंत्र मौजूद हैं। यह धारणा कि कुछ व्यक्तियों की राजनीतिक संबद्धता के कारण मामलों को निष्पक्ष रूप से नहीं संभाला जा रहा है, पूरी तरह से निराधार है। यह रिपोर्ट पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को बदनाम करने की एक सोची-समझी कोशिश है, जिसमें चुनिंदा घटनाओं को उजागर किया गया है, जो भारत में सांप्रदायिक संबंधों की विकृत तस्वीर पेश करती हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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