"आज, अफगानिस्तान में लगभग 10 मिलियन (एक करोड़) बच्चों को जीवित रहने के लिए मानवीय सहायता की आवश्यकता है।
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क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, या युद्ध के कानून, जंग के लिए 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की भर्ती या उपयोग पर रोक लगाते हैं। "पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सशस्त्र बलों या समूहों में भर्ती करना अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के रोम संविधि के तहत एक युद्ध अपराध है। यह अफगानिस्तान पर भी लागू होता है, जो लोग युद्ध अपराधों के लिए प्रतिबद्ध हैं, इस किस्म का आदेश देते हैं, सहायता करते हैं, या कमान की जिम्मेदारी संभालते हैं उन पर आईसीसी या राष्ट्रीय अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकता है।
सशस्त्र संघर्ष में बच्चों की भागीदारी पर बाल अधिकारों पर कन्वेंशन के लिए वैकल्पिक प्रोटोकॉल है, जिसे अफगानिस्तान ने 2003 में स्वीकार किया था। इसमें कहा गया है कि गैर-राज्य सशस्त्र समूह किसी भी परिस्थिति में लोगों की भर्ती नहीं कर सकते हैं। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल नहीं कर सकते। यह वैकल्पिक प्रोटोकॉल सरकारों पर भी लागू होता। सैन्य बलों का भी दायित्व है कि वे बच्चों को विशेष सम्मान और ध्यान दें।
वर्तमान में अफगानिस्तान में बच्चों की स्थति बहुत ख़राब होने वाली है। यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरीटा एच। फोर कहती हैं-
"आज, अफगानिस्तान में लगभग 10 मिलियन (एक करोड़) बच्चों को जीवित रहने के लिए मानवीय सहायता की आवश्यकता है। इस साल अनुमानित 10 लाख बच्चों के गंभीर तीव्र कुपोषण से पीड़ित होने का अनुमान है और बिना इलाज के उनकी मृत्यु हो सकती है।
यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक का ये बयान काफी ज्यादा चिंता पैदा कर रहा है। तालिबान के कब्जे के बाद सिर्फ एक हफ्ते में ही लाखों बच्चे खतरे की रेखा के नीचे आ गए हैं। अफगानिस्तान में इस वक्त स्थिति ये है कि एटीएम पूरी तरह से खाली हो चुके हैं, लोगों के खाने पर लाले पड़ गए हैं, सरकार और प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं हैं। हजारों सरकारी अधिकारी अपनी जान बचाने के लिए छिपे हुए हैं तो हजारों अधिकारी फरार हो चुके हैं।
यूनाइटेड नेशंस ने कहा है कि करीब 4 लाख 35 हजार बच्चों के विस्थापित होने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
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आंकड़े और रिपोर्ट्स के बीच भी एक सच है
यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 42 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हो चुके हैं, जिनमें 22 लाख लड़कियां हैं। वहीं, यूनाइटेड नेशंस ने अपनी रिपोर्ट में कहता है-
इस साल जनवरी महीने से अफगानिस्तान में 2 हजार से ज्यादा बच्चों के साथ गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हुए हैं और ये वो मामले हैं, जो रिकॉर्ड में आए है। वहीं यूनाइटेड नेशंस ने कहा है कि करीब 4 लाख 35 हजार बच्चों के विस्थापित होने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
यूनाइटेड नेशंस की एजेंसी यूनिसेफ कहती है-
आने वाले वक्त में अफगानिस्तान में बच्चों की स्थिति काफी ज्यादा दयनीय होने वाली है और बच्चों को काफी ज्यादा मानवीय सहायता की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि, राजनीतिक परिवर्तन की वजह से बच्चों के सामने विनाशकारी परिणाम सामने आने वाले हैं, बच्चियों की स्थिति तो नर्क के समान होने वाली है और कोविड-19 महामारी का अलग विनाशकारी लहर चलेगा। किन्तु अब अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आइसीसी) ने यहां युद्ध अपराधों की जांच शुरू कर दी है। इन मामलों में वे तालिबानी कंमाडर भी दोषी माने जाएंगे, जिनके नेतृत्व में निर्दोष लोगों पर अत्याचार हो रहा है।
यद्दपि तालिबान ने घोषणा की है की वह ‘इस्लामिक अमीरात ओफ़ अफगानिस्तान’ का गठन करेगा ओर अपने हर नागरिक की भलाई के लिए काम करेगा, परन्तु इस बात पर कितना भरोसा किया जाएगा इस पर एक प्रश्न चिन्ह है। फ़िलहाल तो विश्व को अभी भी इन बच्चों के प्रति संवेदनशील होना होगा नहीं तो, पूरा विश्व ऐसे ही नए तालिबान हर देश में बनते देखेगा।
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