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तिनका-तिनका डायरी: जेल में टीवी, रेडियो और सुधार

सार

जेल के अंदर खाली समय काटना बंदियों के लिए सबसे कठिन काम होता है। विचाराधीन बंदियों के लिए यह समस्या और भी ज़्यादा है क्योंकि उन पर किसी काम को करने का कोई दबाव भी नहीं होता और जेल में उनकी अवधि भी निश्चित नहीं होती।

कैदियों के लिए लेखिका और पत्रकार वर्तिका नंदा लंबे समय से काम कर रही हैं। उनका यह प्रयास तिनका-तिनका के रूप में लोकप्रिय और सराहनीय अभियान ही बन गया है। आप भी शामिल हों उनके इस अभियान के हिस्से में। प्रस्तुत है ये लेख।
 
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उत्तर प्रदेश की जेल में बंद एक महिला बंदी ने मुझे बताया था कि लगातार सोप ओपेरा देखने से उसका दिमाग एक काल्पनिक दुनिया में रहने लगा है। - फोटो : Social media
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विस्तार
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हत्या के मामले में तिहाड़ जेल में सज़ा काट रहे ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने जेल के अपने सेल में एक टीवी सेट की मांग की है। सुरक्षा कारणों से सुशील कुमार को जेल की बैरक में रखने के बजाय एक अलग सेल में रखा गया है। इस सेल में उसके पास टीवी सेट नहीं है। ऐसे में जेल में समय काटना उसे मुश्किल लग रहा है, इसलिए उसने जेल प्रशासन को चिट्ठी लिखकर अपने लिए टीवी सेट मुहैया कराने का निवेदन किया है।

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क्या टीवी देखने की अनुमति दी जा सकती है? 
नेल्सन मंडेला रूल्स 2015 के मुताबिक जेल में बंदियों को टीवी देखने की अनुमति दी जा सकती है। इसी तरह से मॉडल प्रिज़न मैन्युअल 2016 और दिल्ली प्रिज़न मैन्युअल 2018 में भी जेल में टीवी देखने के प्रावधान को शामिल किया गया है।

असल में दुनियाभर में जेलों की बैरकों में आमतौर पर टीवी सेट देने का प्रावधान होता है ताकि बंदी बाहरी दुनिया से जुड़े रह सकें। सूचना, समाचार और मनोरंजन को बंदियों की मौलिक जरूरत माना गया है। लेकिन संचार और सीमित आजादी की इस तरह की सभी सुविधाओं की उपलब्धता बंदियों के “अच्छे आचरण” पर निर्भर करती है।
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तमाम देशों के प्रिज़न मैन्युअल इस बात को साफ तौर पर कहते हैं कि अगर बंदी का आचरण जेल में अनुशासनात्मक है और उसका  व्यवहार जेल प्रशासन के लिए समस्या नही हो तो उसे एक सीमित दायरे में इस तरह की सुविधाएं दी जा सकती हैं जिनमें टीवी देखने की अनुमति भी शामिल है लेकिन इस छूट को एक “सुविधा” के तौर पर माना जाएगा, न कि अधिकार के तौर पर।

असल में जेल के अंदर खाली समय काटना बंदियों के लिए सबसे कठिन काम होता है। विचाराधीन बंदियों के लिए यह समस्या और भी ज़्यादा है क्योंकि उन पर किसी काम को करने का कोई दबाव भी नहीं होता और जेल में उनकी अवधि भी निश्चित नहीं होती। उन्हें जेल से बाहर निकलने के सिवा और कोई बात महत्वपूर्ण नहीं लगती। ऐसे में बंदी किसी काम को करने के बजाय टीवी देखना पसंद करते हैं।

जेल में बदल सकती है कैदी की जिंदगी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
भारत में कैदी और जेल 
भारत में जेल राज्य का विषय है। इसलिए हर राज्य को यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि जेल के बंदी को क्या कंटेंट मुहैया कराया जाए, किन चैनलों को दिखाए जाने की अनुमति हो और टीवी को कितने घंटे चालू रखा जाए। कुछ जेलों में 24 घंटे तक टीवी के चलने का प्रावधान है, जबकि देश की कुछ जेलें इसे कुछ घंटों की मियाद में बांधकर रखती हैं ताकि बंदी रात-दिन टीवी न देखें। लेकिन इसके बावजूद सच यही है कि जेल के अंदर टीवी की मौजूदगी के खट्टे और मीठे दोनों ही अनुभव हैं। तिनका-तिनका के बीते कुछ सालों में जेल में किए शोध के दौरान जेल के टीवी को लेकर भी बेहद दिलचस्प नतीजे देखने को मिले हैं।

महाराष्ट्र की जेल में 21 साल की सज़ा काट चुके एक बंदी ने मुझे बताया था कि जब वो जेल में गया, तब उसकी जेल में टीवी नहीं था। कई सालों तक उसे यही लगता रहा कि शोले ही आज भी सबसे लोकप्रिय फिल्म है। बहुत साल बाद बैरक में टीवी आने पर उसे पता चला कि जेल में आने  के वक्त वह बाहर जिस दुनिया को वो छोड़कर आया था, वह  दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है।

ऐसे में जेल के अंदर अखबार, टीवी, टेलीफोन या फिर चिट्ठी की सुविधा होने से बंदियों को बाहर की दुनिया की जानकारी मिलती रहती है। कोरोना के समय में मुलाकातें बंद होने के कारण बंदियों का बाहर के लोगों से संवाद बहुत सीमित हुआ है। ऐसे में बंदियों के लिए टेलीफोन की सुविधा का भी विस्तार किया गया है। अकेले उत्तर प्रदेश में पहले बंदियों को फोन पर बात करने के लिए 2 मिनट का समय मिलता था जिसे कोरोना के दौरान 5-10 मिनट तक कर दिया गया।

इसी तरह बंदी के लिए जेल में चिट्ठी लिखने या पेन और पेपर की सुविधा मिल पाना भी उनके “अच्छे आचरण” पर निर्भर करता है और इसका फैसला काफी हद तक अकेले सुपरिटेंडेंट के हाथ में होता है। “अच्छे आचरण” की आड़ में कई बार भ्रष्ट तंत्र फल-फूल भी जाता है।

कितनी जायज है सुशील कुमार की मांग? 
बहरहाल, सुशील कुमार ने टीवी सेट की मांग की है। यह जेल प्रशासन पर है कि वह उसकी इस मांग को किस नज़र से देखता है। अगर कानूनी ओर जेल सुधार के पक्ष से देखा जाए तो उसे टीवी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। लेकिन यह ताज्जुब की बात है कि आज तक राज्य सरकारों ने इस बात पर विचार नहीं किया कि टीवी का अनियंत्रित देखा जाना बंदियों के मानसिक और शारिरिक स्वास्थ्य के साथ कैसा खिलवाड़ कर सकता है।

उत्तर प्रदेश की जेल में बंद एक महिला बंदी ने मुझे बताया था कि लगातार सोप ओपेरा देखने से उसका दिमाग एक काल्पनिक दुनिया में रहने लगा है। कई छोटे अपराधी टीवी के कार्यक्रमों को देखकर ही अपराध करने के नए फाॅर्मूले सीख लेते हैं। हालांकि जेलों में अपराध कार्यक्रमों को देखने की मनाही होती है लेकिन कई टीवी धारावाहिक अपराध की जमीन से जोड़े रखने में सक्षम होते हैं।

निर्माताओं को इस बात का इल्म नहीं होता कि उनके बनाए हथकंडेनुमा कई कार्यक्रम और संवाद समाज को कैसा नुकसान पहुंचा सकते हैं। सुविधाओं पर सही नियंत्रण न होना और कंटेट पर पैनी नजर की कमी जेल की पूरी अवधारणा को ध्वस्त कर सकती हैं।
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जेल के अंदर अपनी तरह की कई और जेलें होती हैं जिसकी तरफ आम लोगों का ध्यान नहीं जाता। - फोटो : iStock
जेल के अनुशासन और कैदियों की दुनिया 
वैसे तो जेल का मतलब ही मनचाही आवाजाही और कई और अधिकारों पर रोक या कमी होता है। यह जगह अपराध की सजा को काटने के तौर पर देखी जाती है लेकिन कई बार जेल अधिकारी जेल को सिर्फ अनुशासन और बंदी संख्या तक ही सीमित कर डालते हैं। जेल आया व्यक्ति अपनी पहचान को खो न दे और उसके पास अपने हुनर को निखारने या नए हुनर सीखने के विकल्प भी मौजूद हों, उस पर जेलों का ध्यान कम ही जाता है। कई बार जेलें हर व्यक्ति को एक ही तराजू पर आंकने लगती हैं।

जेल आने से पहले हर व्यक्ति की अपनी कुछ क्षमताएं होती हैं जिन्हें जेल के खाली समय में नया चेहरा दिया जा सकता है लेकिन अक्सर जेलें इस खाली समय को अवसर में तब्दील करने के बजाय बंदियों को या तो पूरी तरह से निठल्ला बना देती हैं या फिर उन्हें उन कामों में लगा देती हैं जिनका बंदी के स्वभाव और रुचि से कोई वास्ता नहीं होता। बाहर के लोग सोचते हैं कि जो जेल गया है, वह बदलाव के साथ बाहर आएगा लेकिन बदलाव का माहौल बनेगा और बंदी खुद भी बदलाव चाहेगा, तभी तो बदलाव आएगा न।  

जेल के अंदर अपनी तरह की कई और जेलें होती हैं जिसकी तरफ आम लोगों का ध्यान नहीं जाता। जेल प्रशासन और बंदी- दोनों ही जब तक समान रूप से बदलाव करना न चाहें, तब तक कोई भी बाहरी शक्ति जेल के माहौल में बेहतरी नहीं ला सकती।

बने-बनाए पुराने ढर्रे पर चलते जाना जेल के अंदर एक और जेल बनाने जैसा ही होता है। ऐसे में जेल रेडियो को एक सार्थक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। भारत में सबसे पहला जेल रेडियो तिहाड़ में ही आया था। बाद में 2019 में देश की सबसे पुरानी जेल इमारत जिला जेल आगरा में तिनका तिनका ने जब जेल रेडियो की शुरुआत की तो उसका मॉडल बंदियों की जरूरत और उनकी भलाई को मानस में रखकर ही गढ़ा गया।

इस साल तिनका तिनका ने हरियाणा की जेलों में रेडियो की शुरुआत कर दी है। 7 जेलों में रेडियो तैयार हैं। करीब 50 बंदी रेडियो ज़ॉकी बन चुके हैं। अब वे टीवी पर परोसे जा रहे बने-बनाए कार्यक्रमों की बजाय अपना कंटेट खुद तैयार कर रहे हैं। उनके बनाए दो गानों की सराहना तो खुद देश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन कर चुके हैं। अपने हाथों में पेन, कागज और माइक के जरिए वे हर रोज अपनी जेलों के लिए सूचना, ज्ञान और मनोरंजन का ऐसा संसार बना रहे हैं जिसमें सब कुछ शुद्ध है, वह भी टीआरपी और मुनाफे की होड़ से परे।

इसलिए सुशील कुमार जैसे बहुत से बंदी ऐसे हैं जिनके समय के सही इस्तेमाल के लिए जेलें कुछ शानदार प्रयोग कर सकती है, बशर्ते जेल सुनने और अमल करने को तैयार हो।

(डॉ. वर्तिका नन्दा जेल सुधारक हैं और जेलों पर एक विशेष अभियान तिनका तिनका- की संस्थापक हैं। उन्होंने हाल में ICSSR के लिए भारतीय जेलों में संचार की जरूरतों पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है। प्रमुख, पत्रकारिता विभाग, लेडी श्री राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय/ ईमेल-tinkatinkaorg@gmail.com)
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