15 अगस्त 2021 को हिंदुस्तान अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ में प्रवेश कर गया। आजादी के इन 75 सालों में जहां भारत ने ज्ञान-विज्ञान, समाज, तकनीक, राजनीति, रक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं, तो वहीं 75 सालों की इस विकास यात्रा में भारत ने अपनी सभ्यता, संस्कृति, विरासत और धरोहर को पहचानने और अपनी स्मृतियों को सहेजने का गौरवशाली कार्य भी किया है।
हाल ही में यूनेस्को यानी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ने गुजरात स्थित धौलावीरा को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यह भारत का 40वां ऐसा स्थल है जो यूनेस्को की इस सूची में शामिल है।
धौलावीरा ना केवल भारतीय उपमहाद्वीप का गौरव है बल्कि यह मनुष्य सभ्यता की प्राचीन, वैज्ञानिक और सभ्य संस्कृति का वह अध्याय है जो भारत भूमि पर लिखा गया।
आजादी की 75वीं वर्षगांठ के साल में वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, अमर उजाला के पाठकों से श्रृंखलाबद्ध रूप में धौलावीरा की कहानी साझा कर रहे हैं।
राजेश बादल, पुरातत्व विषयों पर गहन रुचि और दक्षता के साथ लिखते रहे हैं। यह विषय लंबे समय से ना केवल उनके पठन-पाठन में शामिल होता रहा है अपितु उनकी शैक्षेेेणिक यात्रा की विषय विशेषज्ञता का हिस्सा भी रहा है।
पढ़िए श्रृंखला के रूप में धौलावीरा की कहानी का अंतिम भाग
वैसे सिंधु सभ्यता के शीर्षकों का ही संकलन किया जाए तो इससे एक किताब भर जाए। जाहिर है यदि आप पांच या छह कड़ियों में जब आप इस सभ्यता को समेटने की कोशिश करते हैं तो लगता है कि अन्याय कर रहे हैं। फिर भी मुअनजोदड़ो से धौलावीरा तक का सफ़र जानना दिलचस्प है। ऐसा लगता है कि इतिहास अपने को दोहरा रहा है। हम उस दौर में जहाँ थे कमोबेश आज भी वहीं हैं। सभ्यता के ये निशान जब पुरातत्वविदों की पड़ताल में आज के दौर की अनेक कहानियों से जुड़ेंगे तो यक़ीनन अचरज होगा।
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समाज का त्रिस्तरीय बंटवारा
बहरहाल, धौलावीरा उस सभ्यता से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि वह भारतीय समाज की आज की रचना से मेल खाता है। मसलन आज हम आमदनी के हिसाब से समाज को आर्थिक आधार पर वर्गों में बांटने लगे हैं ( मैं इसका विरोधी हूं ) एक उच्च आमदनी वाला अमीर वर्ग, दूसरा मध्यम वर्ग और अब तीसरा विकसित हो गया है निम्न आय वर्ग।
इस तरह तीन वर्गों में विभाजित यह समाज नज़र आता है। मुअनजोदड़ो और हड़प्पा में हमने देखा था कि वहां भी अमीर और ग़रीब की दो श्रेणियां ही थीं। लेकिन धौलावीरा के निशां इसकी तस्दीक करते हैं कि आज के भारतीय समाज की तरह वहां भी त्रिस्तरीय बंटवारा था। अर्थात् उच्च आयवर्ग, मध्यवर्ग और निम्न आयवर्ग।
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इसी आधार पर शहर नियोजन और सामाजिक रहन-सहन के साक्ष्य मिले हैं। नगर नियोजन में भी पहली बार राजप्रासाद याने महल की उपस्थिति का भी प्रमाण मिला है। महल में शानदार नक़्क़ाशीदार पत्थर के स्तंभ मिले हैं।
दरअसल, धौला वीरा का अर्थ है - सफ़ेद कुआं। चूंकि यह कच्छ के सफ़ेद नमकीन मैदानों में बसा था। संभवतया इस कारण ही इसका नाम धौलावीरा पड़ा होगा। वे कुएं ,जो सफ़ेद मिट्टी में स्थित हैं।
धौलावीरा: सन् 1967 के आसपास पुरातत्वविद जगत पति जोशी ने इस सभ्यता के अवशेषों का पता लगाया।
- फोटो : राजेश बादल
सात बार उत्थान और पतन
जाने-माने पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल मिजाज़ से यायावर हैं। अतीत के इन दस्तावेजों को पढ़ने में उनकी ख़ास दिलचस्पी रहती है। जब कोरोना ने इस देश पर हमला बोला, उसके चंद रोज़ पहले ही वे धौलावीरा में पूर्वजों की विरासत खोजने गए थे। लौटे तो वहां के अनमोल ख़ज़ाने के साथ। कुछ अनुभव उनके और तस्वीरें उनके सह यात्री उत्कर्ष तिवारी ने अपने कैमरे के ज़रिए दुनिया तक पहुंचाई।
शम्भू नाथ जी बताते हैं-
"इस नगर ने सात बार उत्थान और पतन देखा। चौथा और पांचवां चरण चरमोत्कर्ष था। फिर यह नगर सिकुड़ने लगा और 1900 ईसा पूर्व के आस-पास यह एक छोटा-सा नगर रह गया और गांव का रूप लेते-लेते विलुप्त हो गया। सन् 1967 के आसपास पुरातत्वविद जगत पति जोशी ने इस सभ्यता के अवशेषों का पता लगाया।
अब धोलावीरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सभ्यता की नुमाइंदगी कर रहा है।
- फोटो : राजेश बादल
वर्ष 1989 में पुरातत्वविद पद्मश्री डॉक्टर रवींद्रसिंह बिष्ट की देखरेख में यहां खुदाई शुरू हुई। कोई 13 सत्रों में यह खुदाई जारी रही। मैं कोरोना काल के कुछ पहले 2019 में इस 5000 साल पुरानी सभ्यता के खंडहर देखने गया था। इस तरह शायद मैं आख़िरी सिविलियन था, जो इन अवशेषों को देखने वहां पहुंच सका, क्योंकि इसके बाद कोरोना के चलते इस एएसआई के विशेषज्ञों के अलावा किसी और के जाने पर रोक लगा दी गई "।
अब धोलावीरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सभ्यता की नुमाइंदगी कर रहा है। अभी तक इस स्थान ने जितने भी क़िस्से उगले हैं, वे यह साबित करने के लिए काफी हैं कि धौलावीरा मुअनजोदड़ो और हड़प्पा के आगे की अवस्था का बयान करता है। इससे बाद के ब्यौरे से भारत में ही पनपी और विकसित हुई एक नई सभ्यता के सुबूतों की हम उम्मीद कर सकते हैं।
धौलावीरा की कहानी के पिछले सारे भागों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
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