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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ताइवान का सिने इतिहास

सार

ताइवान में सिनेमा का आगमन बहुत पहले हो गया था। जापानियों ने यहां सिने-प्रदर्शन किया। शुरू में यहां केवल प्रोपगंडा फिल्में बनीं और दिखाई जा रही थीं। सिनेमा सरकार के नियंत्रण में था और सेंट्रल मोशन पिक्चर कॉरपोरेशन के अंतर्गत बन रहा था।
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1998 की फिल्म ‘फ्लॉवर्स ऑफ शांघाई’ का दृश्य - फोटो : Twitter
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विस्तार
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पूर्वी एशिया में ताइवान द्वीप तथा कुछ और द्वीपों के समूह का नाम है, चीनी गणराज्य। यही ताइवान के नाम से भी जाना जाता है। 1949 में चीन के गृहयुद्ध के बाद ताइवान अलग हो गया मगर अभी भी चीन के दबदबे में है। विश्व की एक सबसे बड़ी जनसंख्या के बावजूद यह अभी तक संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य नहीं है।

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इसी ताइवान में सिनेमा का आगमन बहुत पहले हो गया था। जापानियों ने यहां सिने-प्रदर्शन किया। शुरू में यहां केवल प्रोपगंडा फिल्में बनीं और दिखाई जा रही थीं। जापानी उपनिवेश कानून के अंतर्गत बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशक तक ऐसी फिल्में यहां बनती और दिखाई जाती रहीं। सिनेमा सरकार के नियंत्रण में था और सेंट्रल मोशन पिक्चर कॉरपोरेशन के अंतर्गत बन रहा था। सेंसरशिप का कठोर नियंत्रण था। 

अस्सी के दशक में मार्शल लॉ ढीला हुआ और ताइवान में सिनेमा की नई लहर आई। अब फिल्में ताइवान के लोगों के बदलते नजरिए को दिखाने लगीं। पहली लहर 1982 से 1990 तक चली और दूसरी लहर 1990 से प्रारंभ हो कर अब तक जारी है। इन फिल्मों के कथानक ताइवान के परम्परागत मूल्यों का ह्रास, राष्ट्रवाद का उदय, वास्तविकता, कम्युनिज्म से संघर्ष, मार्शल लॉ के समय में लोगों के अनुभवों पर आधारित होते हैं। एडवर्ड यंग, हो सिआओ-सिएन, वु नेयन-जेन आदि नई लहर सिनेमा के मुख्य निर्देशक रहे हैं।

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1994 की फिल्म ‘ए बोरोड लाइफ’

वु नेयन-जेन की 1994 की फिल्म ‘ए बोरोड लाइफ’ एक पारिवारिक गाथा है। इसे निर्देशक ने 1950 के दशक में एक खदान-शहर में स्थापित किया है। पिता-पुत्र के संबंध द्वारा फिल्म पीढ़ियों के नजरिए में आए बदलाव को दिखाती है। वु नेयन-जे चाहते थे कि हो सिआओ-सिएन इस फिल्म का निर्देशन करें। पर वे यह जानते थे कि हो सिआओ-सिएन बहुत व्यस्त हैं।

जब उन्होंने यह प्रस्ताव हो सिआओ-सिएन ने सुझाव दिया क्यों नहीं वु नेयन-जेन स्वयं यह कार्य करें, और यही हुआ। स्क्रीनप्ले भी उन्होंने खुद तैयार किया। इस तरह यह फिल्म बनी जिसे सिने-निर्देशक मार्टिन स्कोरसेस अपनी पसंददीदा सूची में रखते हैं।

शुरुआत में ये लोग मिलकर फिल्म बना रहे थे बाद में व्यक्तिगत रूप से फिल्म बनाने लगे।

वान जेन और जेन्ग जुआन्ग सियांग के साथ मिल कर हो सिआओ-सिएन ने 1983 में करीब डेढ़ घंटे की ‘द सैंडविच मैन’ फिल्म बनाई। यह फिल्म हुआन्ग चुन-मिन्ग की तीन कहानियों का चित्रण है। इसमें आधुनिकरण के दौर में अशिक्षित मजदूर के समक्ष आने वाली चुनौतियां हैं, जापानी वस्तुओं का उपभोक्ताओं पर प्रभाव तथा अमेरिकी सैनिकों का ताइवान जीवन पर असर दिखाया गया है।

बोर जेन्ग चेन, यंग ली-यिन, ते-नान लाई आदि ने हास्य, परम्परा की आलोचना आदि को अपने अभिनय से साकार किया है। इसी तरह कई लोगों ने मिल कर 1982 में 106 मिनट की फिल्म ‘इन अवर टाइम’ बनाई।

हो सिआओ-सिएन ने अपने बचपन से प्रेरित होकर ‘ए टाइम टू लिव, ए टाइम टू डाई’ बनाई। 138 मिनट की यह फिल्म आह-हा-गु नामक लड़के के कमिंग ऑफ एज की कहानी है। यह एक त्रयी का हिस्सा है। त्रयी का प्रथम भाग ‘ए समर एट ग्रैंडपा’ज’ 1984 में बना, जबकि तीसरा भाग ‘डस्ट इन द विंड’ 1986 में बना।

‘ए टाइम टू लिव, ए टाइम टू डाई’ (1985) में जब इस लड़के का परिवार मैनलैंड चीन से ताइवान रहने आता है तो परिवार के प्रौढ़ नए परिवेश में समायोजन केलिए संघर्ष करते हैं, परंतु युवक को आगे बढ़ने में दिक्कत नहीं होती है। वह नए वातावरण से शीघ्र समायोजन कर लेता है।

पीढ़ियों की समझ का अंतर इसमें स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। प्रौढ़ होने पर यह युवक परिवार तथा परम्परा से दूर होता चला जाता है। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना प्राप्त हुई।

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विश्व सिनेमा - फोटो : istock

‘फ्लॉवर्स ऑफ शांघाई’

हो सिआओ-सिएन ने 1998 में ‘फ्लॉवर्स ऑफ शांघाई’ बनाई। 115 मिनट की यह पीरियड फिल्म उन्नीसवीं सदी के अंत में स्थापित है और शांघाई के ‘फ्लॉवर हाउसेस’ यानि गणिकाओं के घर की कहानी कहती है। फिल्म रोमांस, जलन, ईर्ष्या, तनाव को परदे पर साकार करती है।

यहां तेल-लैम्प की सुनहरी रोशनी है, अफीम की पिनक है, पूरा वातावरण नशीला है। मगर यहां की औरतों को इस स्वर्ण-पिंजड़े में ही रहना है, उन्हें इसके बाहर जाने की इजाजत नहीं है। एक रेगुलर ग्राहक मास्टर वान्ग है जिसका मिस्ट्रेस से लंबा संबंध है, मगर बेवफाई का भय सदा बना हुआ है। यह गुजरे जमाने की क्रूरता दिखाती हुई फिल्म दर्शक को हिला देती है।


1967 की फिल्म ‘ड्रैगन इन’

इस सदी की बात करें तो ताइवान में कई अच्छी फिल्में बनी हैं। 1967 में ‘ड्रैगन इन’ नाम से एक मार्शल आर्ट्स की एक फिल्म बनी थी। मगर मैं बात कर रही हूं 2003 में बनी फिल्म ‘गुडबाई, ड्रैगन इन’ की। 13 पुरस्कारों से सम्मानित साई मिन्ग-लिआन्ग की यह फिल्म थियेटर को दी गई श्रद्धांजलि है।

एक एतिहासिक थियेटर में एक अंधेरी तथा बरसती रात में अंतिम बार 1967 की फिल्म ‘ड्रैगन इन’ दिखाई जा रही है। बहुत थोड़े से दर्शक आए हैं। फिल्म चल रही है और उसके बीच में थियेटर के विभिन्न कर्मचारियों, उसके संरक्षकों का प्रवेश होता है। दो भूत बीते काल का मर्सिया पढ़ते हैं। यह फिल्म हमारे अपने देश के थियेटर के लिए काफी सटीक बैठती है।

फिल्म दिखाती है, एक समय यह थियेटर दर्शकों की भीड़ सम्भाल नहीं पाता था, आज यहां कोई झांकने नहीं आता है। थियेटर बंद होने के कगार पर है। फिल्म नॉस्टेल्जिया का सर्वोत्तम नमूना है।

ताइवान की नई लहर के सिनेमा के अग्रणी एडवर्ड यंग अमेरिका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी गए तो इलैक्ट्रिकल इंजिनियरिंग पढ़ने थे मगर सिनेमा के प्रति खिंचाव ने उन्हें सदर्न कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी पहुंचा दिया। ऐसा भी समय आया जब उन्हें लगा वे सिनेमा बनाने केलिए नहीं बने हैं। एक रात वे सीटेल में कार चला रहे थे और उन्होंने एक विज्ञापन देखा, विज्ञापान था, ‘जर्मन न्यू वेव: अगुरे, द रैथ ऑफ गॉड’।

वे सिनेमा थियेटर के भीतर गए और उनका जीवन बदल गया। उन्होंने सिनेमा बनाने की ठान ली। नई लहर के बारे में एडवर्ड यंग कहते हैं यह एक नई दुनिया थी और हम एक-दूसरे को ढ़ेर सारी कहानियां कह सकते थे।

एडवर्ड यंग की 2000 की फिल्म ‘यी यी’ एक साल के समय को समेटती है। इसी एक साल के समय में बात शादी से शुरू होती है और अंतिम संस्कार पर समाप्त होती है। 173 मिनट की इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं वु निएन-जेन, केली ली, जोनाथन चैन्ग ने की हैं। समीक्षकों के अनुसार निर्विवाद रूप से यह गाथा बीसवीं सदी का एक मास्टरपीस है। उनकी फिल्म 1991 की ‘ए ब्राइटर समर डे’ ने 8 पुरस्कार बटोरे।

साई मिंग-लिआंग की ‘रेबल्स ऑफ द नियोन गॉड’ (1992), चेन यु-सुन की ‘ट्रोपिकल फिश’ (1995), वांग तुंग की ‘स्ट्रावूमन’ (1987) तथा चैंग यी की ‘कुएइ-मेइ, ए वूमन’ (1985), साइ मिंग-लिआंग की ‘वाइव ल’अमोर’ (1994), कुन-हो चेन की ‘ग्रोइंग अप’ (1983), वु निएन-जेन की ‘ए बोरोड लाइफ’ (1994) तथा तैन लाई की ‘द पीच ब्लोसम लैंड’ ताइवान की कुछ अच्छी फिल्मों के नाम हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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