‘फ्लॉवर्स ऑफ शांघाई’
हो सिआओ-सिएन ने 1998 में ‘फ्लॉवर्स ऑफ शांघाई’ बनाई। 115 मिनट की यह पीरियड फिल्म उन्नीसवीं सदी के अंत में स्थापित है और शांघाई के ‘फ्लॉवर हाउसेस’ यानि गणिकाओं के घर की कहानी कहती है। फिल्म रोमांस, जलन, ईर्ष्या, तनाव को परदे पर साकार करती है।
यहां तेल-लैम्प की सुनहरी रोशनी है, अफीम की पिनक है, पूरा वातावरण नशीला है। मगर यहां की औरतों को इस स्वर्ण-पिंजड़े में ही रहना है, उन्हें इसके बाहर जाने की इजाजत नहीं है। एक रेगुलर ग्राहक मास्टर वान्ग है जिसका मिस्ट्रेस से लंबा संबंध है, मगर बेवफाई का भय सदा बना हुआ है। यह गुजरे जमाने की क्रूरता दिखाती हुई फिल्म दर्शक को हिला देती है।
1967 की फिल्म ‘ड्रैगन इन’
इस सदी की बात करें तो ताइवान में कई अच्छी फिल्में बनी हैं। 1967 में ‘ड्रैगन इन’ नाम से एक मार्शल आर्ट्स की एक फिल्म बनी थी। मगर मैं बात कर रही हूं 2003 में बनी फिल्म ‘गुडबाई, ड्रैगन इन’ की। 13 पुरस्कारों से सम्मानित साई मिन्ग-लिआन्ग की यह फिल्म थियेटर को दी गई श्रद्धांजलि है।
एक एतिहासिक थियेटर में एक अंधेरी तथा बरसती रात में अंतिम बार 1967 की फिल्म ‘ड्रैगन इन’ दिखाई जा रही है। बहुत थोड़े से दर्शक आए हैं। फिल्म चल रही है और उसके बीच में थियेटर के विभिन्न कर्मचारियों, उसके संरक्षकों का प्रवेश होता है। दो भूत बीते काल का मर्सिया पढ़ते हैं। यह फिल्म हमारे अपने देश के थियेटर के लिए काफी सटीक बैठती है।
फिल्म दिखाती है, एक समय यह थियेटर दर्शकों की भीड़ सम्भाल नहीं पाता था, आज यहां कोई झांकने नहीं आता है। थियेटर बंद होने के कगार पर है। फिल्म नॉस्टेल्जिया का सर्वोत्तम नमूना है।
ताइवान की नई लहर के सिनेमा के अग्रणी एडवर्ड यंग अमेरिका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी गए तो इलैक्ट्रिकल इंजिनियरिंग पढ़ने थे मगर सिनेमा के प्रति खिंचाव ने उन्हें सदर्न कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी पहुंचा दिया। ऐसा भी समय आया जब उन्हें लगा वे सिनेमा बनाने केलिए नहीं बने हैं। एक रात वे सीटेल में कार चला रहे थे और उन्होंने एक विज्ञापन देखा, विज्ञापान था, ‘जर्मन न्यू वेव: अगुरे, द रैथ ऑफ गॉड’।
वे सिनेमा थियेटर के भीतर गए और उनका जीवन बदल गया। उन्होंने सिनेमा बनाने की ठान ली। नई लहर के बारे में एडवर्ड यंग कहते हैं यह एक नई दुनिया थी और हम एक-दूसरे को ढ़ेर सारी कहानियां कह सकते थे।
एडवर्ड यंग की 2000 की फिल्म ‘यी यी’ एक साल के समय को समेटती है। इसी एक साल के समय में बात शादी से शुरू होती है और अंतिम संस्कार पर समाप्त होती है। 173 मिनट की इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं वु निएन-जेन, केली ली, जोनाथन चैन्ग ने की हैं। समीक्षकों के अनुसार निर्विवाद रूप से यह गाथा बीसवीं सदी का एक मास्टरपीस है। उनकी फिल्म 1991 की ‘ए ब्राइटर समर डे’ ने 8 पुरस्कार बटोरे।
साई मिंग-लिआंग की ‘रेबल्स ऑफ द नियोन गॉड’ (1992), चेन यु-सुन की ‘ट्रोपिकल फिश’ (1995), वांग तुंग की ‘स्ट्रावूमन’ (1987) तथा चैंग यी की ‘कुएइ-मेइ, ए वूमन’ (1985), साइ मिंग-लिआंग की ‘वाइव ल’अमोर’ (1994), कुन-हो चेन की ‘ग्रोइंग अप’ (1983), वु निएन-जेन की ‘ए बोरोड लाइफ’ (1994) तथा तैन लाई की ‘द पीच ब्लोसम लैंड’ ताइवान की कुछ अच्छी फिल्मों के नाम हैं।
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