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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: सई परांजपे- प्रमुख महिला स्क्रिप्ट राइटर

सार

स्क्रिप्ट राइटर, निर्देशक, अभिनेता सई परांजपे के भीतर रूस और भारत का साझा रक्त है। उनका जन्म 19 मार्च 1938 को हुआ था। उनके पिता रूसी थे और मां महाराष्ट्र से ताल्लुक रखती थीं। फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ (1981) का लेखन तथा निर्देशन सई परांजपे ने किया था।
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Cinema, camera - फोटो : istock
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विस्तार
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नए सिने-दर्शक/सिने-प्रेमी भले ही सई परांजपे के नाम से परिचित न हों, मगर वे सिने-संसार में एक बड़ा नाम हैं। आपने ‘स्पर्श’, ‘चश्मे बद्दूर’, ‘कथा’ जैसी फिल्में अवश्य देखी होंगी, कम-से-कम इनके नाम अवश्य सुने होंगे। सिने-संसार सई परांजपे को सफल सिने-निर्देशक के रूप में जानता-पहचानता आया है। एक ओर वे लोकप्रिय सिनेमा का हिस्सा रही हैं, इसके साथ समीक्षक भी सदा से उनके प्रशंसक रहे हैं। मगर इसके साथ उन्होंने स्क्रिप्ट राइटिंग भी की है। आज उनके इसी रूप की चर्चा करती हूं।

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स्क्रिप्ट राइटर, निर्देशक, अभिनेता सई परांजपे के भीतर रूस और भारत का साझा रक्त है। उनका जन्म 19 मार्च 1938 को हुआ था। उनके पिता रूसी थे और मां महाराष्ट्र से ताल्लुक रखती थीं। पिता चित्रकार थे और मां शकुंतला मराठी अभिनेत्री। उनके नाना ऑस्ट्रेलिया में भारत के राजदूत थे और उन्हें सर की उपाधि प्राप्त थी। माता-पिता के विवाह-विच्छेद के बाद वे नाना आर. पी. परांजपे के यहां पली-बढ़ीं। उनकी मां इंग्लैंड में पढ़ी थीं।

कई देशों में शिक्षा प्राप्त सई की आठ वर्ष की उम्र में पहली किताब (मराठी भाषा में) प्रकाशित हुई थी और बाद में कॉलेज में उन्हें अभिनय के लिए पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षण लिया था। फिल्म बनाने के पूर्व वे नाटक तथा प्रोग्राम लिख रही थीं। उन्होंने मंच अभिनेता अरुण जोगलेकर से शादी की, पर शादी चली नहीं। पर दोनों मित्र बने रहे, एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे के साथ काम करते रहे। दोनों के बच्चे कला से जुड़े हैं। उनका बेटा गौतम मराठी सिने-निर्देशक है तथा बेटी विनी जोगलेकर परांजपे अभिनेत्री है।
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समय-समय पर ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन तथा चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी से जुड़ी सई परांजपे ने मराठी, हिन्दी तथा इंग्लिश तीनों भाषाओं में बच्चों एवं वयस्कों के लिए लिखा। उन्होंने 21 फिल्मों का निर्देशन किया और पांच फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा। उन्हें दो फिल्मफेयर अवॉर्ड (‘स्पर्श’) तथा एक नेशनल फिल्म अवॉर्ड (‘कथा’) प्राप्त हुआ।

फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’

फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ (1981) का लेखन तथा निर्देशन सई परांजपे ने किया था। दर्शकों ने इस ढ़ाई घंटे की मजेदार कॉमेडी फिल्म का भरपूर आनंद उठाया, आज भी आप इसका मजा ले सकते हैं। इस तीन बेरोजगार मस्त नौजवानों की कहानी में ओमी (राकेश बेदी) और जय (रवि बासवानी) मस्त पर आलसी हैं जबकि तीसरा सिद्धार्थ पराशर पढ़ाकू और शर्मीला है।

मजा तब आता है, जब यही चुपचाप रहने वाला नेहा राजन (दीप्ति नवल) का दिल जीत लेता है। इन दोनों की दोस्ती बाकी दोनों की जिंदगी में खलबली पैदा कर देती है। पर अभिनय में इन सबसे बाजी मार ले जाते हैं, पनवाड़ी ललन मियां बने सईद जाफरी। संवाद और मनोरंजक दृश्य सई परांजपे की लेखन की विशेषता है। यहां आप मजे लेकर इसे देख सकते हैं।

सई परांजपे ‘चश्मे बद्दूर’ से एक साल पहले बनाई अपनी फिल्म के कारण दर्शकों के दिल में उतर चुकी थीं। 1980 में उन्होंने नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी को लेकर ढ़ाई घंटे के एक अद्भुत फिल्म ‘स्पर्श’ बनाई थी। इसे भी उन्होंने स्वयं लिखा और निर्देशित किया है।

इस पुरस्कृत फिल्म में नसीर यानी अनिरुद्ध परमार है तो अंधा, परंतु वह इस क्षीणता को खुद पर कभी हावी नहीं होने देना चाहता है। उसका अहं बहुत आहत होता है, यदि कोई उसकी न्यूनता को देखते हुए उसकी सहायत करना चाहता है। वह नेत्रहीन लोगों के एक स्कूल का प्रिंसपल भी है।

लेकिन एक दिन उसकी मुलाकात कविता (शबाना आजमी) से होती है, दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, मगर यह सरल न था। जब शादी की बात आती है तो अनिरुद्ध के मन में संशय होता है, कहीं कविता उस पर दया और सहानुभूति तो नहीं लादेगी। कहीं उसे सरपरस्ती तो नहीं देने लगेगी, सरपरस्ती जिससे उसे नफरत है। पूरी कहानी की मर्मस्पर्शिता आपको फिल्म देख कर स्वयं अनुभव करनी होगी। सई ने पुरस्कार पाए नसीर तथा शबाना को फिल्मफेयर का सर्वोत्तम अभिनय का नामांकन मिला।

 

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सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock

म्युजिकल ड्रामा कॉमेडी फिल्म ‘दिशा’

1992 में सई परांजपे ने सवा दो घंटे की म्युजिकल ड्रामा कॉमेडी फिल्म ‘दिशा’ के संवाद और कहानी लिखी और उसे निर्देशित भी किया। यहां भुखरी में परसाराम (ओम पुरी) है, जो बारह साल से एक कुंआ खोदते हुए ‘पगला परसा’ का  खिताब पा गया है। उसकी पत्नी हंसा (शबाना आजमी) बीड़ी फैक्टरी में काम करती है। उनके चार बच्चे हैं, जिनके नाम सुन कर आप मुस्कुरा उठेंगे।

बच्चों के नाम हैं, शर्मीला, जीतेंद्र, अमिताभ तथा कद्दु। परसा का एक भाई है, सोमा सरपत (रघुवीर यादव) जिसे कभीकदा खेतों में काम मिल जाता है। उनका पड़ोसी युवा, हाल में विवाहित वसंत (नाना पाटेकर) है। वसंत की पत्नी फूलवती (राजश्री सावंत) और बीमार पिता दशरथ (नीलू फुले) है। बेटे की शादी के लिए पिता ने 10,000 रुपए का कर्ज लिया हुआ है। काम की खोज में पहले सोमा बंबई जाता है फिर आय के लालच में वसंत वहां जाता है।

पति से मिलने फूलवती बंबई जाती है और वह वहां जो हालात देखती है तो दंग रह जाती है। वसंत और सोमा 39 और लोगों के साथ एक कमरे में रह रहे हैं। सब मिल में काम करते हैं और कम वेतन के कारण कर्ज में डूबे हुए हैं। एक दिन वसंत पिता का पत्र पाकर वापस लौटता है। 135 मिनट की इस फिल्म में गांव में क्या हुआ है, बताना मेरा काम नहीं है।

सशक्त स्त्रियां पति की अनुपस्थिति में परिवार संभालती हैं। जब वसंत गांव लौट रहा है, दृश्य को आनंद मोदक का संगीत साधता है। सीधी-सरल फिल्म के सिनेमाटोग्राफर हैं, पुरस्कृत मधु अंबाट। 

2013 में फिर से बनी ‘चश्मे बद्दूर’

सई परांजपे की लिखी पटकथा पर एक बार फिर से 2013 में करीब दो घंटे की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ डेविड धवन ने बनाई, जिसका सई ने डेविड धवन और रेणुका कुन्जरु के साथ मिलकर लेखन किया है। कहानी वही है। खूबसूरत पड़ोसी लड़की सीमा (तापसी पन्नू) से शर्मीले सिड (अली जाफार) को प्रेम हो जाता है और उसके दोनों दोस्त ओमी (दिवेंदु शर्मा) एवं जय (सिद्धार्थ) उन्हें अलग करने की कोशिश करते हैं। फिल्म में अनुपम खेर तथा ऋषि कपूर भी हैं। फिल्म केलिए साउथ अफ्रीकन इंडिया फिल्म एंड टेलिविजन का पोपुलर पुरस्कार नवोदिता तापसी अप्न्नू को मिला था।

सई परांजपे ने ‘मैलोडी’, ‘पपीहा’, ‘चकाचक’, ‘सिकंदर’, ‘जादू का शंख’, ‘बेगार’, ‘फीडम फ्रॉम फियर’, ‘साज’, ‘कथा’, ‘कैप्टन लक्ष्मी’, ‘अंगूठा छाप’, ‘भागो भूत’ आदि 21 फिल्मों का निर्देशन किया, साथ ही दूरदर्शन केलिए ‘द लिटिल टी शॉप’, ‘अड़ोस-पड़ोस’, ‘छोटे बड़े’ फिल्मों का निर्देशन भी किया।

उन्होंने 1961 में एक अन्य फ़िल्म का स्क्रिप्ट लेखन किया था। इस ड्रामा फिल्म का नाम ‘निरुपमा आनी परिरानी’ है। इसमें सीमा देव, यशवंत दत्त, विश्वास कुंते ने भूमिकाएं की हैं और इस फिल्म का निर्देशन विनय काले ने किया है। इस फिल्म के विषय में जानकारी नहीं मिली, न ही फिल्म मिली।

सई परांजपे का नाम सिने-जगत में बड़े आदर के साथ लिया जाता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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