फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: एम.टी.वासुदेवन नायर- मलयालम स्क्रीनप्ले राइटिंग में क्रांति

सार

केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड के तहत उन्हें ‘केरलवर्मा पषशी राजा’, ‘परिणयं’ (1995), ‘निर्माल्यं’ (1974) के स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें ‘कडवु’ (1992), ‘ओप्पोल’ (1981) के लिए सर्वोत्तम कहानी का राज्य पुरस्कार प्राप्त हुआ।
विज्ञापन
सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मलयालम और बंगाल का साहित्य-सिनेमा प्रेम प्रसिद्ध है, वे अपने साहित्यकार और फिल्मकार का सम्मान करना जानते हैं। किसी मलयाली के सामने एम. टी. कह कर देखिए वह उनके विषय में इतने सम्मान से बात करेगा, उसने उनका कुछ-न-कुछ अवश्य पढ़ा होगा, उनकी फिल्म देखी होगी। जी हां, एम. टी. वासुदेवन नायर जिन्हें प्यार से मात्र एम. टी कहा जाता है, साहित्यकार और फिल्मकार दोनों हैं। जब मैं उन्हें फिल्मकार कह रही हूं, तो वे एक साथ कहानी लेखक, स्क्रीनप्ले राइटर, अभिनेता और सिने-निर्देशक सब हैं। आज उनके सिने-लेखक व्यक्तित्व पर बात करती हूं।

विज्ञापन


15 पुरस्कारों से नवाजे एम. टी. का जन्म 9 अगस्त 1933 को कुडलूर, केरल में हुआ था। उनकी पत्नी के. सरस्वती प्रशिक्षित नृत्यांगना हैं।

लेखक और निर्देशक के रूप में उन्हें 1958, 1970, 1982 एवं 1986 में केरल साहित्य अकादमी, केंद्रीय साहित्य अकादमी (1970), भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1995) साथ ही राष्ट्रीय निर्देशक के पुरस्कार मिले हैं। उन्हें 2013 में अकादमी की फेलोशिप भी प्राप्त हुई। मगर स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में भी उनका काम कमाल का रहा है। 

कहा जाता है कि उन्होंने मलयालम स्क्रीनप्ले राइटिंग में क्रांति कर दी और सिद्ध कर दिया कि फिल्म का वास्तविक नायक स्क्रीनप्ले ही होता है। निर्देशक के रूप में वे कई बार पुरस्कृत हुए साथ ही उन्हें ‘निर्माल्यं’ (1974), ‘ए नॉर्दन स्टोरी ऑफ़ वैलर’ (उरु वडक्कन वीर गाथा) (1990), ‘कडवु’ (1992), ‘सदयं’ (1993), ‘परिणयं’ (1995) फिल्मों के स्क्रीनप्ले केलिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।

विज्ञापन

फिल्म ‘निर्माल्यं’ (1974) के लिए मिला पुरस्कार

केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड के तहत उन्हें ‘केरलवर्मा पषशी राजा’, ‘परिणयं’ (1995), ‘निर्माल्यं’ (1974) के स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में पुरस्कृत किया गया। इसी तरह उन्हें ‘कडवु’ (1992), ‘ओप्पोल’ (1981) के लिए सर्वोत्तम कहानी का राज्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। 2005 में एम. टी. को पद्म भूषण सम्मान मिला।

अगर उनके स्क्रीनप्ले सहित समस्त लेखन का सार निकालें तो यह किसी अपराध के लिए पश्चाताप एवं स्वमोचन हेतु सहा गया आंतरिक कष्ट होता है। यहां भावात्मक सघनता होती है और साथ ही होती है, प्रेम की लयात्मकता। उनके यहां भयंकर गरीबी के दर्शन होते हैं। ‘निर्माल्यं’ में यह देखा जा सकता है। जमींदारी प्रथा के अंत के समय होने वाले दर्द को भी वे दिखाते हैं।

‘अमृतं गमय’ स्क्रीनप्ले में वे यही प्रश्चाताप दिखाते हैं। एक व्यक्ति अपने पाप मोचन के लिए पूरी जिंदगी लगा देता है। भले ही वह अपना प्रेम खोता है लेकिन अंत में अपना मोचन कर पाता है। वे केरल के मलाबार क्षेत्र के मातृसत्तात्मक परिवार से आते हैं और मातृसत्तात्मक परिवार उनकी कई कहानियों में नजर आता है।

‘केरल वर्मा पषशी राजा’ फिल्म में एम. टी. ने ऐतिहासिक आधार पर स्क्रीनप्ले लिखा है। हालांकि इसके संवाद लेखन में उन्होंने दो अन्य लोगों का साथ लिया है, मगर स्क्रीनप्ले उनका है, जिसके लिए वे राज्य द्वारा पुरस्कृत हुए।

2009 की इस फिल्म में पषशी राजा नामक हिन्दु राजा की जीवनी ली है। इस राजा ने 18वीं सदी में अंग्रेजों से लोहा लिया था। फिल्म का निर्देशन टी. हरिहरन ने किया है, फिल्म में मलयालम के प्रसिद्ध अभिनेताओं, मम्मूट्टि और मोहनलाल दोनों ने अभिनय किया है।

विज्ञापन

सिनेमा की दुनिया - फोटो : istock

फिल्म ‘कडवु’ (1991)

‘सदयं’ भी सिबि मलयाली द्वारा निर्देशित है, मोहनलाल यहां भी हैं। कहानी और स्क्रीनप्ले एम. टी. वासुदेवन का है। इसमें वे एक सजायाफ्ता कैदी के अंतिम दिनों को चित्रित करते हैं। कहानी चूंकि दो बच्चियों हत्या से जुड़ी है अत: रहस्य धीरे-धीरे खुलता है। फिल्म को एकमात्र पुरस्कार, रजत कमल स्क्रीनप्ले लेखन के लिए मिला है। ‘कडवु’ (1991) का निर्देशन स्वयं एम. टी. ने किया है। यहां कहानी भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कृत रचनाकार एस. के. पोट्टेकाट की है और स्क्रीनप्ले एम. टी. ने लिखा है।

‘ए नॉर्दन स्टोरी ऑफ वैलर’ फिल्म का निर्देशन टी हरिहरन ने किया है और लेखन एम. टी. का है। यह बहादुरी की गाथा दो वीरों की लड़ाई को दिखाती है। नायक यहां एक बार फिर मम्मूट्टि हैं। 1980 की फिल्म ‘ओप्पोल’ के स्क्रीनप्ले में एम. टी. बाल मनोविज्ञान को प्रस्तुत करते हैं। इसका निर्देशन उन्होंने नहीं किया है, निर्देशक के. एस. सेतुमाधवन हैं। एक छोटा बच्चा अपनी मां को अपनी बड़ी बहन समझता है और जब यह स्त्री गोविंदन से शादी करती है तो बच्चा ईर्ष्या से भर उठता है।

पौने तीन घंटे की फिल्म ‘परिणयं’ में निर्देशन एक बार फिर टी. हरिहरान ने किया है जिसे एम. टी. ने लिखा है। यहां वे समाज की कुरीति को चित्रित करते हैं। 17 साल की किशोरी उन्नीमाया को एक बूढ़े के पल्ले बांध दिया जाता है और जब वह मर जाता है तो समुदाय उसे दुत्कारता है। वह माधवन के प्रेम में पड़ कर गर्भवती हो जाती है।

फिल्म ‘चेरु पुन्चिरी’ (2000)

माधवन कथकली कलाकार है मगर ‘चेरु पुन्चिरी’ (2000) में एक वयोवृद्ध युगल है जो अपना जीवन समारोह पूर्वक व्यतीत कर रहे हैं। दोनों एक-दूसरे के साथ प्रसन्न हैं। यहां लेखन और निर्देशन दोनों एम. टी. वासुदेव नायर का है। इस फिल्म को बंबई इंटरनेशनल फिल्म समारोह में पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

एक अन्य मार्मिक फिल्म ‘पेरुन्तच्चन’ इंग्लिस में ‘द मास्टर कारपेंटर’ नाम से उपलब्ध है। 1991 की सवा दो घंटे से कुछ ऊपर अवधि की इस फिल्म का लेखन भी एम. टी. ने किया है। निर्देशन अजयन का है। इस फिल्म में पेरुन्तच्चन एक सिविख्यात कारपेंटर है जो अपने समय के सामाजिक नियमों का कड़ाई से पालन करता है। जब उसका अपना बेटा कन्नन बड़ा हो कर उन नियमों के प्रति विद्रोह करता है, तो वह उसे भी नहीं छोड़ता है।

एम. टी. वासुदेवन नायर ने और बहुत सारी फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा है। उमर होने के बावजूद वे बहुत सक्रिय हैं।

-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें