भारत और पड़ोसी देशों के बच्चे भी अब हिंदी को सहज भाषा के रूप में ले रहे हैं।
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दरअसल हिंदी की यह ‘जय यात्रा’ अपने दम पर और हिंदी भाषियों की जिजीविषा के कारण ही ज्यादा है। भले ही यह माना जाता हो कि आज भारतीय विदेशों में अपनी अच्छी अंग्रेजी के कारण रोजगार पाते हों, लेकिन इसी के साथ यह भी मान लिया गया है कि भारत की प्रतिनिधि भाषा हिंदी ही है। अंग्रेजी रोजगार की भाषा हो सकती है, लेकिन हिंदी अस्मिता की भाषा है। इसे जाने बगैर भारत को नहीं जाना जा सकता।
हिंदी का यह स्वाभाविक ‘वर्चस्व’ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में तो स्थापित हो ही चुका है। इसमें हिंदी फिल्मों का बड़ा योगदान है। साथ ही टीवी और इंटरनेट भी अब हिंदी को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेजी के अलावा अनूदित मनोरंजन सामग्री हिंदी में ही उपलब्ध है।
भारत और पड़ोसी देशों के बच्चे भी अब हिंदी को सहज भाषा के रूप में ले रहे हैं। खुद भारत के भीतर भी गैर हिंदी भाषी राज्यों में युवा पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की तुलना में हिंदी ज्यादा सहजता से बोल और समझ पाती है। यह काम हिंदी की औपचारिक शिक्षा से ज्यादा हिंदी के जरिए भारत को जानने की सहज जिज्ञासा और जरूरत के कारण ज्यादा हो रहा है।
अगर संसद भारत की आत्मा है तो हिंदी के हक में एक बहुत ब़ड़ा बदलाव वहां दिखाई पड़ता है। पहली लोकसभा में जितने सांसद देश भर से चुन कर आए थे, उनमें से साठ फीसदी प्राय: अंग्रेजी में ही अपनी बात रखते थे। केवल हिंदी भाषी प्रदेशो के सांसद ही हिंदी में बोलते थे और उनमें से भी कुछ ऐसे थे, जो अंग्रेजी में ज्यादा बोलना पसंद करते थे बजाए हिंदी के। अब भाषायी अभिव्यक्ति के स्तर पर संसद का परिदृश्य बहुत कुछ बदला हुआ है।
आज अठारहवीं लोकसभा ( और राज्यसभा में भी) में 70 फीसदी से ज्यादा सांसद हिंदी में अपनी बात रखते हैं या फिर ऐसा करने की कोशिश करते हैं। यह बदलाव खास तौर पर बंगाली, असमी, अोडिया, मराठी, तेलुगू (तेलंगाना), पंजाबी, गुजराती, कन्नड , कश्मीरी भाषी सांसदो के रवैये में देखने को मिलता है। अभी तमिलनाडु और कुछ हद तक केरल इसका अपवाद हैं। लेकिन अगर ज्यादातर गैरहिंदी भाषी सांसद अब अपनी बात हिंदी में ही रखने को प्राथमिकता दे रहे हैं, उसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि उन्हें लगता है कि इसी भाषा के जरिए वो अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा पाएंगे। उनकी बात समूचे देश में सुनी जाएगी। यह बदलाव किसी दबाव के तहत नहीं बल्कि इस बात के खुले मन से स्वीकार से हुआ है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सम्प्रेषण की भाषा हिंदी ही हो सकती है, जोकि वह है भी।
संतोष की बात यही है कि हिंदी बगैर बैसाखियों के अपनी चाल और मस्ती में आगे बढ़ती जा रही है। एक महानदी की तरह वह साथ मिलने वाली भाषायी नदियों को भी अपने में समोती चली जा रही है। जो नई हिंदी गढ़ी जा रही है, वह नई सदी की हिंदी है। नई सभ्यता, संस्कृति और समरसता की हिंदी है। वह सबको साथ लेकर और सबके भीतर लहलहाने वाली हिंदी है।
हिंदी की यही ताकत उसे और अधिक स्वीकार्य बनाएगी। देश के भीतर हिंदी का राजनीतिक विरोध 60 साल में सिमटता गया है। धीरे- धीरे यह और सिकु़ड़ता जाएगा। क्योंकि हिंदी और तेजी से देश की एक स्वाभाविक जरूरत बन रही है, बनती चली जाएगी।
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