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हिंदी दिवस विशेष: मातृ भाषा की मारक क्षमता को समझिए, हिंदी की ताकत पहचानिए

सार

  • राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 'हरिजन-पत्रिका' के 9 जुलाई, 1938 के अंक में अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा-प्राप्त करने के अपने कटु अनुभवों के बारे में लिखा कि 'हमें और हमारे बच्चों को अपनी विरासत पर ही आगे बढ़ना होगा।
  • अगर हम दूसरों से लेंगे तो अपने-आप को शक्तिहीन बना देंगे। विदेशी खाद पर हम पनप नहीं सकते। मैं विदेशी भाषाओं के खजाने को अपनी भाषाओं के माध्यम से लेना चाहता हूं।'
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भाषा हमारी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को गढ़ती है - फोटो : iStock
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विस्तार
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पहले भाषा ने जन्म लिया या पहले समाज का निर्माण हुआ। यह कुछ ऐसा ही सवाल है जैसा कि मुर्गी पहले आई या अंडा पहले आया। 'भाषा' समाज के लिए बहु-उपयोगी साधन है। इस दृष्टि से समाज का निर्माण पहले हुआ होगा। समाज ने संप्रेषण क्षमता के विकास की दिशा में संकेतों के माध्यम से भाषा का निर्माण किया होगा। भाषा और समाज दोनों के निर्माण में दोनों एक दूसरे के सहायक की भूमिका में संस्कृति का विकास करते दिखते हैं। जैसे समाज सिर्फ वही नहीं है जो दिख रहा है। ठीक वैसे ही भाषा भी सिर्फ वह नहीं है जो लिखी और बोली जा रही है। 

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भाषा वह भी है जो हमारी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को गढ़ती है। लिखत-पढ़त वाली भाषा से ज्यादा उस मनोभाषा और देहभाषा को समझना जरूरी है जो भाषाई संरचना में निहित सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक-राजनीतिक तत्वों को तैयार करती है। इसलिए भाषाई संदर्भ की समझ सिर्फ शाब्दिक अर्थों तक सीमित नहीं है बल्कि उन सभी आयामों, संदर्भों और दृष्टिकोणों में विसरित है जो 'भाषा' का निर्माण करते है या सीधे कहें तो जो भाषिक मनोविज्ञान निर्मिति करते हैं और उस सामाजिक गढ़त के पीछे काम करते हैं जो भाषा को शक्तिशाली बनाते हैं। 
 

भाषा मात्र संप्रेषण का माध्यम नहीं होती है, यह तो उसका साधारण नैसर्गिक दायित्व है। भाषा के साथ सत्ता, शक्ति, वर्ग सब शामिल हैं। भाषा की राजनीति पुरानी परिणति है। भाषा शासन-प्रशासन की शक्ति सहयोगिनी के रूप में पुराने समय से काम करती आई है। वह सामाजिक करेंसी की तरह काम करती रही है। विशिष्ट वर्गों के निर्माण में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं स्थापित करती रही है, जो सत्ता संरचना के काम आते हैं।

 

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मातृभाषा सीखने की प्रक्रिया और हम 

जब हम अपनी मातृभाषा सीख रहे होते हैं तो एक सोचने-समझने की पूरी विधि को अख्तियार कर रहे होते हैं। भाषा हमें हमारे परिवेश में प्रतिष्ठित करने वाली दृष्टि प्रदान कर रही होती है। यह बहुत नैसर्गिक प्रक्रिया की तरह हमारे जीवनानुभवों में संपन्न होती रहती है। इसकी ताकत, क्षमता और विस्तार की विशेषताएं, उस भ्रूण के अंकुरण की तरह प्राथमिक स्तर पर ही तय हो जाती है जो भावी संसार बनाने वाला है। भाषा का अपने समाज और संस्कृति से अनन्य संबंध है। 

बेशक मनुष्य के पास भाषा सीखने की अदभुत क्षमता है, पर वह भाषा को तभी सीख पाता है, जब उसे एक भाषायी समाज का परिवेश प्राप्त हो। एक ओर जहां समाज के माध्यम से ही भाषा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे पहुंचती है तो दूसरी ओर भाषा के माध्यम से ही समाज संगठित और संचालित रहता है। भाषा के अभाव में सामाजिक संरचना धराशाही हो जाएगी। 

इसी तरह भाषा का अपनी संस्कृति से गहरा संबंध होता है। भाषाई मजबूती संस्कृति की मजबूती पर बहुत निर्भर करती है। दुनियायीं अनुभव बताते है कि वे ही समाज बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से सफल सिद्ध हुए हैं जिनमें भाषाई समृद्धि बनी रही। उन्हीं समाजों ने विज्ञान और तकनीकी में तरक्की की है जिनकी समृद्ध भाषाओं ने अपने-अपने विषयों में प्रगति की। किसी भी संस्कृति और विज्ञान का विकास भाषा के आधार घरातल पर ही निर्भर करता है।

विश्व में सात हजार भाषाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक माह दो भाषाएं मर रही हैं। - फोटो : iStock
परंपरागत समाजों की संस्कृतियां अपनी रुढ़ियों, अंधविश्वासों और अंध-आस्थाओं के चलते सामाजिक-सांस्कृतिक वर्जनाओं का विस्तार करते हुए नए क्षैतिजों का निषेध करती जाती है। अपने शिक्षा माध्यमों को बांझ बना लेती है। संसार के नए वैज्ञानिक रूपों के निरंतर नकार की यह प्रवृत्ति और रुढ़िवादिता का यह रुकावटी रवैया हमें भाषाई रूप से कभी समृद्ध नहीं होने देता है। नतीजतन ऐसे समाज वैज्ञानिक सिद्धांतो को समझने में असमर्थ ही बने रहते हैं। इसलिए सिर्फ संस्कृति को ही विकसित करना अथवा केवल भाषा को ही समृद्ध बनाना एकांगी विकास होगा। 

एक विकसित समाज के निर्माण की दिशा में संस्कृति और भाषा को समानांतर रूप से विकसित करने की जरुरत होती है। इसी तरह भाषा शिक्षा से जुड़ी है। शिक्षण का मातृ-भाषाई माध्यम सिर्फ सुगमता ही नहीं लाता है बल्कि उसकी प्रभाविकता भी इससे जुड़ी होती है।


प्रसिद्ध चिंतक 'जीरोम ब्रुनर' यही कहते हैं- 

'बच्चे अपने समाज और संस्कृति को ग्रहण करते हुए बड़े होते है, समाज व संस्कृति उनके सीखने के स्वभाव का निर्धारण करते हैं। बहुत हद तक उसके इस स्वभाव से निर्धारित होता है कि बच्चा क्या सीखेगा और किन बातों को सीखना उसकेलिए आसान होगा। एक शिक्षक के लिए ये महत्वपूर्ण बातें हैं।' अतः संस्कृति और शिक्षा के अतःसंबंध में भाषा अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है।

किसी भी समुदाय, समाज और संस्कृति की समृद्धि का पैमाना उसकी भाषा होती है। एक बड़ी आम धारणा है कि किसी जाति या संस्कृति को समाप्त करना हो तो पहले उसकी भाषा को समाप्त करो। वह जाति या संस्कृति स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। भाषा लुप्त होने पर न केवल संस्कृति विलुप्त होती है, अपितु साहित्य और इतिहास भी अतीत के गर्त में खो जाते हैं। 


'साइंटिफिक अमेरिकन माइंड' में जाने-माने भाषा वैज्ञानिक डॉ. कौरे बिन्स लिखते हैं-

विश्व में सात हजार भाषाएं हैं, जिनमें से प्रत्येक माह दो भाषाएं मर रही हैं। और उनके साथ अनेकानेक संततियों से प्राप्त सांस्कृतिक ज्ञान तथा मानव मस्तिष्क का रहस्यमय शब्द प्रेम भी सदा के लिए लुप्त हो रहा है। मातृभाषाएं केवल संवाद के लिए नहीं होती हैं, वे संस्कृति के निर्माण और विकास की दिशा में मार्गदर्शक होती हैं। 

आज की आधुनिक वैश्विक दुनिया में जिसे 'सूचना समाज' की संज्ञा दी जा रही है, इसने भाषाई वर्चस्व का मोर्चा खोल दिया है। मीडिया और सोशल मीडिया के मैदान में भाषाएं अपने शक्ति-प्रदर्शन पर उतारू हैं। दुनिया की तमाम भाषाएं अपनी-अपनी मारक क्षमता के साथ सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित कर बजरिए बाजार सत्ता और शक्ति के नए प्रतिमान स्थापित करने की होड़ में हैं। नतीजतन विकासशील समाज पहचान के संकट के कगार पर पंहुच चुके हैं। 

वहीं विकसित समाज तो अपनी भाषा को बचाए हुए हैं और अपनी संस्कृति को विस्तार के नए क्षैतिज दे रहे हैं। लेकिन पिछड़े समाजों की भाषा-बोली लगभग लुप्त होने की तरफ बढ़ रही हैं। वैश्विक स्तर पर बड़ी भाषाओं ने छोटी भाषाओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। वैश्वीकरण के दबाव में दुनिया की 6700 बोली जाने वाली भाषाओं में से 40 प्रतिशत भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं, जबकि इन भाषाओं में उस समाज की संस्कृति और उनका हजारों-हजार वर्ष का ज्ञान सन्निहित है। 
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हिंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव उत्तर भारत में है। - फोटो : Amar Ujala

भाषा और हमारा समाज 

हजारों आदिवासी भाषाएं जो अपनी ज़ड़ों से जुड़ी हैं। सदियों के जीवन अनुभवों से उपजी ये भाषाएं पर्यावरण के गहरे सरोकारों में रची-बसी हैं। इनमें ज्ञान की अथाह राशि सन्निहित हैं। आधुनिक विकास की होड़ ने परंपरागत ज्ञान के उस अगाध भंडार को विकास की होड़ में दफना दिया है। विकास के नाम पर जंगलों का सफाया, उन आदिवासी भाषाओं और संस्कृतियों का भी सफाया कर रहा है जो देशज और मौलिक ज्ञान के अजस्र स्रोत थे। इन आदिवासी भाषाओं में ज्ञान की जो विशिष्टता निहित है उसका संरक्षण और संवर्द्धन नव-सृजन के स्फुरण की क्षमता रखता है। ऐसे ज्ञान-बीज की विलुप्ति एक पूरी भाषाई सभ्यता और संस्कृति की समाप्ति है जो बहुत सारे सामाजिक-सांस्कतिक जीन विश्व को मुहैया करा सकती थी।

भाषा शिक्षा का माध्यम है, वह माध्यम अपनी मातृभाषा भी हो सकती है और कोई दूसरी भाषा भी। इसलिए भाषा किसी-न-किसी उद्देश्य या प्रयोजन के संदर्भ में सीखी अथवा सिखाई जाती है। लेकिन मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में विकसित करने का मतलब है अपने समाज और देश की संप्रेषण प्रक्रिया को सुदृढ़, व्यापक और सशक्त बनाना, क्योंकि मातृभाषा वह सामाजिक वास्तविकता है जो व्यक्ति को अपने भाषायी समाज के विभिन्न सामाजिक संदर्भों से जोड़ती है और उसकी सामाजिक अस्मिता का निर्धारण करती है। इसी के आधार पर व्यक्ति अपने समाज और संस्कृति से जुड़ा रह सकता है। 
भाषा ही समाज में संस्कृति और संस्कारों की संवाहक होती है। भाषा व्यक्ति को अपनी सौंधी गंध में समाजीकृत करती है उसे सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती है। व्यक्ति के बौद्धिक विकास के साथ-साथ उसकी संवेदनाओं और अनुभूतियों की सहज-स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपनी भाषा में ही होती है। 

मातृ भाषाई माध्यम विभिन्न विषयों के ज्ञान को स्वाभाविक और सरल व सहज ढंग से हमारे व्यक्तित्व में उतारता है। मातृभाषा विद्यार्थी में बोलने, समझने, पढ़ने और लिखने जैसे सभी चारों कौशलों के विकास के साथ-साथ साहित्यिक रसास्वादन के क्षमतावर्द्धन में भी योग करती है। हर कोई अपनी भाषा की सूक्ष्मताओं और विशिष्टताओं से परिचित भी होता है। इससे लिखित साहित्य तक उसकी पहुंच आसान हो ही जाती है। 

परिणामतः उसकी सर्जनात्मक क्षमता और तार्किक शक्ति का विकास होता है। सर्जनात्मक प्रतिभा से उसकी साहित्यिक रचना की रुचि बढ़ती है जिससे समाज में समाजोपयोगी कार्य करने की भाषिक क्षमता भी विकासोन्नमुख दिशा में सक्रिय होना चाहती है। भाषा की यह शक्ति उसके प्रयोग पर निर्भर रहती है। नए-नए प्रयोग ही उसकी मारक क्षमता का विकास करते हैं और किसी भाषा के सशक्त भाषा बनने में प्रेरक की भूमिका निभाते हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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