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हिंदी दिवस 2019ः हिंदी के विकास का सफरनामा, हिंदी कैसे बनी भारत के हृदय की भाषा

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आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी भाषा के विकास की जब भी बात आती है तो मुझे आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो पंक्तियां याद आती हैंः-

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                                                         'निज भाषा उन्नति रहे, सब उन्नति के मूल।                                      
                                                          बिनु निज भाषा ज्ञान के, रहत मूढ़-के-मूढ़।।'
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उपरोक्त दोहे से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि आधुनिक हिंदी के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपनी भाषा हिंदी से कितना लगाव था। यदि हम हिंदी भाषा के विकास की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले सौ सालों में हिंदी का बहुत विकास हुआ है और दिन-प्रतिदिन इसमें और तेजी आ रही है। हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है।

संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसे आर्य भाषा या देवभाषा भी कहा जाता है। हिंदी इसी आर्य भाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी मानी जाती है, साथ ही ऐसा भी कहा जाता है कि हिंदी का जन्म संस्कृत की ही कोख से हुआ है।

भारत में संस्कृत 1500 ई. पू, से 1000 ई. पूर्व तक रही, ये भाषा दो भागों में विभाजित हुई- वैदिक और लौकिक। मूल रूप से वेदों की रचना जिस भाषा में हुई उसे वैदिक संस्कृत कहा जाता है, जिसमें वेद और उपनिषद का जिक्र आता है, जबकि लौकिक संस्कृत में दर्शन ग्रंथों का जिक्र आता है। इस भाषा में रामायण, महाभारत, नाटक, व्याकरण आदि ग्रंथ लिखे गए हैं। संस्कृत के बाद जो भाषा आती है वह है पालि। पालि भाषा 500 ई. पू. से पहली शताब्दी तक रही और इस भाषा में बाैद्ध ग्रंथों की रचना हुई।

बौद्ध ग्रन्थों में बोलचाल की भाषा का शिष्ट और मानक रूप प्राप्त होता है। पालि के बाद प्राकृत भाषा का उद्भव हुआ। यह पहली ईस्वी से लेकर 500 ई. तक रही। इस भाषा में जैन साहित्य काफी मात्रा में लिखे गए थे। पहली ई. तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा इसको प्राकृत की संज्ञा दी गई। उस दौर में जो बोलचाल की आम भाषा थी वह सहज ही बोली व समझी जाती थी, वह प्राकृत भाषा कहलाई।

दरअसल, उस समय इस भाषा में क्षेत्रीय बोलियों की संख्या बहुत सारी थी, जिनमें शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, मराठी, मागधी और अर्धमागधी आदि प्रमुख हैं। प्राकृत भाषा के अंतिम चरण से अपभ्रंश का विकास हुआ ऐसा माना जाता है। यह भाषा 500 ई. से 1000 ई. तक रही। अपभ्रंश के ही जो सरल और देशी भाषा शब्द थे उसे अवहट्ट कहा गया और इसी अवहट्ट से ही हिंदी का उद्भव हुआ।

हिंदी के कई अधिकांश विद्वान हिन्दी का विकास अपभ्रंश से ही मानते हैं। - फोटो : अमर उजाला
ऐसा कहा जाता है कि हिंदी का जो विकास हुआ है वह अपभ्रंश से हुआ है और इस भाषा से कई आधुनिक भारतीय भाषाओं और उपभाषाओं का जन्म हुआ है, जिसमें शौरसेनी (पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी और गुजराती), पैशाची (लंहदा, पंजाबी), ब्राचड़  (सिन्धी), खस (पहाड़ी), महाराष्ट्री (मराठी), मागधी (बिहारी, बांग्ला, उड़िया और असमिया), और अर्ध मागधी (पूर्वी हिन्दी) शामिल है।

नोट के तौर पर यह भी कहा जाता है हिंदी के कई अधिकांश विद्वान हिंदी का विकास अपभ्रंश से ही मानते हैं। वहीं कई विद्वानों का मानना है कि हिंदी का उद्भव अवहट्ट से हुआ।

बता दें कि अवहट्ट नाम का जिक्र मैथिल महान कवि कोकिल विद्यापति की 'कीर्तिलता' में आता है। पूरे देश के भक्त कवियों ने अपनी वाणी को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हिंदी का सहारा लिया। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में हिंदी और हिंदी पत्रकारिता की बहुत अहम भूमिका रही। महात्मा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय नेता हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने लगे थे। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित कर दिया गया। यह तो था हिंदी के विकास का सफरनामा।

हिंदी भाषा के विकास में यदि और जानने की कोशिश करेंगे तो हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टिकोण से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें हिंदी को तीसरा स्थान दिया जाता था।

हिंदी विश्व की लगभग 3,000 भाषाओं में से एक है। इतना ही नहीं  हिंदी आज दुनिया की सबसे बड़ी आबादी द्वारा बोली और समझे जानी वाली भाषा है। भाषाई सर्वेक्षणों के आधार पर दुनिया की आबादी का 18 प्रतिशत इसे समझता है, जबकि अन्य भाषा की बात करें तो चीनी भाषा मैंडरीन समझने वालों की संख्या 15.27 और वहीं अंग्रेजी समझने वालों की संख्या 13.85 प्रतिशत कही गई है।

हिंदी को हम भाषा की जननी, साहित्य की गरिमा, जन-जन की भाषा और राष्ट्रभाषा भी कहते हैं। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि  हिंदी भविष्य की भाषा है। हां, एक बात जरूर है कि हम इस भाषा का प्रयोग वास्तविक जीवन में जरूर करते है लेकिन यह रोजगार और महत्वाकांक्षी की भाषा बनने में थोड़ी कारगर नहीं बन पाई।

इससे यह जाहिर नहीं होता कि हिंदी का विकास नहीं हुआ। उपरोक्त में कई ऐसे तथ्य हैं, जो पूर्ण रूप से साबित करते हैं कि हिन्दी का विकास कितनी तेजी से हुआ है। हमारे देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपना बधाई संदेश हिंदी में प्रसारित करते हैं क्योंकि हिंदी भाषा अपनत्व का बोध कराती है।

भविष्य में हिंदी का वर्चस्व कम से कम दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में तो अवश्य ही रहेगा और इसका कारण है बहुत बड़े वर्ग का हिंदी भाषा जानना। हिंदी भाषा की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व की शीर्षतम सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने उत्पादों को हिंदी में बनाना भी शुरू किया है।

एक कंपनी जो सारे विश्व में अंग्रेजी भाषा में अपने उत्पाद बेचती है, पर भारत में वह अपने सॉफ्टवेयर हिंदी में ला रही है। इतना ही नहीं, जितनी भी मोबाइल कंपनियां हैं सभी ने सारे हैंडसेट्स में भारतीय भाषाओं को भी शामिल करना शुरू कर दिया है। यह इस बात का इशारा है कि भारतीय जनमानस में हिंदी भाषा का कितना वर्चस्व है। यहां तक की सारे डिजिटल माध्यमों में हिंदी की पहुंच बढ़ी है। चाहे वह बैंक एटीएम हो या किसी सरकारी या गैरसरकारी फॉर्म या अन्य। सारे माध्यमों में हिंदी का विकास तेजी से हो रहा है।
 
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हिन्दी को हम भाषा की जननी, साहित्य की गरिमा, जन-जन की भाषा और राष्ट्रभाषा भी कहते हैं। - फोटो : फाइल फोटो
एक बात ध्यान देने योग्य है कि अपने शैशव काल से लेकर आज तक इंटरनेट ने जो सीढ़ियां चढ़ीं हैं वो अपने आप में प्रतिमान है, लेकिन जितनी प्रसिद्धि हिंदी भाषा की वेबसाइटों को मिलती है, उतनी किसी और को नहीं मिलती। इसके साथ ही यदि भारत में आप हिन्दी और अंग्रेजी समाचार चैनल की बात करेंगे तो आपको बखूबी पता चल जाएगा कि किस भाषा के चैनल की डिमांड और टीआरपी ज्यादा है।

भारत में कोई भी वस्तु तब तक नहीं प्रचलित होती है, जब तक कि उसमें भारतीयता का पुट न सम्मिलित हो, इसलिए हिंदी भाषा वो पुट है, जिसके बिना ख्याति संभव नहीं।

हिंदी भाषा की जितनी मांग है, इंटरनेट पर उतनी उपलब्धता नहीं है। लेकिन जिस रफ्तार से भारत में इंटरनेट का विकास हुआ है, उसी तरह से हिंदी भी इंटरनेट पे छाई रही है। समाचारपत्र से लेकर हिंदी ब्लॉग तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। साधुवाद तो गूगल को भी जाता है, जिसने हिंदी में खोज करने की जगह उपलब्ध कराई।

इतना ही नहीं विकिपीडिया ने भी हिंदी की महत्ता को समझते हुए कई सारी सामग्री का सॉफ्टवेयर अनुवाद हिंदी में प्रदान करना शुरू कर दिया, जिससे हिंदी भाषी को किसी भी विषय की जानकरी सुलभ हुई।

आज के परिपेक्ष्य में हिंदी भी इंटरनेट की एक अहम लोकप्रिय भाषा बनकर उभरी है और ऐसा माना जाता है कि है जब लोग अपने विचार और लेखन हिंदी भाषा में इंटरनेट पर और ज्यादा करेंगे तो वह दिन दूर नहीं की सारी सामग्री हिंदी में भी इंटरनेट पर मिलने लगेगी।

भाषा नदी की धारा के समान चंचल होती है। यह रुकना नहीं जानती, यदि कोई भाषा को बलपूर्वक रोकना भी चाहे तो यह उसके बंधन को तोड़ आगे निकाल जाती है। यही भाषा की स्वाभाविक प्रकृति और प्रवृत्ति है, चाहे कोई भी भाषा क्यों ना हो। अंत में हम यही कहना चाहेंगे की हिंदी भाषा सबसे अहम है, क्योंकि इसमें हमारा मान है।

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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