देश में कम वजन वाले कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक वजन यानी मोटापा से ग्रस्त बच्चों की संख्या से कई गुणा अधिक है।
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देश में कम वजन वाले कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक वजन यानी मोटापा से ग्रस्त बच्चों की संख्या से कई गुणा अधिक है। भारत में आज भी 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने को विवश है। जाहिर है कि इस स्थिति में इन लोगों को पर्याप्त मात्रा में कैलोरी युक्त भोजन की प्राप्ति नहीं हो पाती है। वहीं जन्म के समय शिशु के लिए मां का दूध उत्तम व अनिवार्य आहार होने के बाद भी देश में केवल 37.1 प्रतिशत नवजात शिशु ही मां का स्तनपान करते हैं।
नवजात के लिए पौष्टिक व प्रतिरक्षा मूल्य के लिए आवश्यक मां का दूध उन्हें नहीं मिलने से वे कुपोषित हो जाते हैं। इस तरह ज्ञान की कमी के कारण बच्चों का लालन-पालन बेहतर तरीके से नहीं हो पाता है। दूसरी ओर लाखों बच्चे मोटापा से ग्रस्ति हैं। ये वे बच्चे हैं जिन्हें पोषक तत्व तो अधिक मात्रा में मिल रहे हैं लेकिन वे उन्हें पचाने के लिए व्यायाम और योग पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इससे इतर उनको मोबाइल गेम्स और टेलीविजन ने इस कदर आकर्षित कर रखा है कि उनकी मैदानी खेलों के प्रति रुचि ही खत्म होने लगी है।
राष्ट्र के विकास और संवृद्धि पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली यह वर्तमान रिपोर्ट इसलिए ओर भी चिंताजनक हो जाती है कि देश जहां एक ओर विश्व की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था कहलाया जा रहा है तो दूसरी ओर देश के सरकारी गोदामों में प्रतिवर्ष लाखों क्विंटल अनाज बारिश से सड़ जाने के कारण भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को कुपोषित होना पड़ रहा है। जहां बी.पी.एल परिवारों को शासकीय उचित मूल्य दुकानों के माध्यम से कम दर में पोषण युक्त अन्न उपलब्ध कराया जा रहा है, जहां कुपोषण से निपटने के लिए अनेकों योजनाएं और हेल्थ केयर सिस्टम चलाया जा रहा है, उस देश में बच्चे कुपोषित हैं यह कहीं ना कहीं उन नीतियों का सही क्रियान्वयन ना होना ही है।
दरअसल, देखा जाए तो देश में आईसीडीएस जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना चल रही है एवं इनकी प्रक्रियाएं विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों पर आधारित है किंतु वर्तमान समय में यह प्रोजेक्ट आधारभूत एवं संस्थागत संसाधनों की कमियों से जूझ रहा है, अत: प्रक्रिया परिणाम आधारित ना होकर केवल कागजी कार्यवाही पर ज्यादा टिकी है।
जागरूकता का अभाव
निसंदेह देश में कुपोषण को लेकर जागरूकता की कमी है व कार्यकर्ताओं में पर्याप्त प्रशिक्षण का अभाव है। इन समस्याओं के लिए एक पहल यह हो सकती है कि हम कार्यकर्ताओं को ज्यादा से ज्यादा कुपोषित बच्चों की पहचान करने के लिए प्रोत्साहित करें, ऊष्मायन केंद्रों को अत्याधुनिक बनाएं, संसाधनों के साथ मेडिकल स्टाफ की पूर्ति करें, गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करें, उन्हें अच्छी तरह से कुपोषण के प्रति एवं उसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करें। इसके लिए हमारा मकसद 'पोलियो मुक्त भारत' की भांति 'कुपोषण मुक्त भारत' का होना चाहिए।
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