देश की आजादी के आन्दोलन में गणेश उत्सव ने बहुत महत्वपूण भूमिका निभायी थी। 1894 मे अंग्रेजो ने भारत मे एक कानून बना दिया था जिसे धारा 144 कहते हैं
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गणेश उत्सव का पौराणिक महत्व
इस त्योहार के साथ कई कहानियां भी जुड़ी हुई हैं जिनमें से उनके माता-पिता माता पार्वती और भगवान शिव के साथ जुड़ी कहानी सबसे ज्यादा प्रचलित है। शिवपुराण में रुद्रसंहिता के चतुर्थ खण्ड में वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया था। भगवान शिव ने जब भवन में प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। इससे पार्वती नाराज हो उठीं। भयभीत देवताओं ने देवर्षि नारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया।
भगवान शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुख बालक को अपने हृदय से लगा लिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्र पूज्य होने का वरदान दिया।
देश की आजादी के आन्दोलन में गणेश उत्सव ने बहुत महत्वपूण भूमिका निभायी थी। 1894 मे अंग्रेजो ने भारत मे एक कानून बना दिया था जिसे धारा 144 कहते हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद आज भी लागू है। इस कानून मे किसी भी स्थान पर 5 से अधिक व्यक्ति इकट्ठे नहीं हो सकते थे। और ना ही समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन कर सकते थे।
महान क्रांतिकारी बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 मे वन्देमातरम नामक एक गीत लिखा था जिस पर भी अंग्रेजों प्रतिबंध लगा कर गीत गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया था। इन दोनों बातों से लोगो मे अंग्रेजो के प्रति बहुत नाराजगी व्याप्त हो गयी थी। लोगो मे अंग्रेजो के प्रति भय को खत्म करने और इस कानून का विरोध करने के लिए महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की और सबसे पहले पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव का आयोजन किया गया।
1894 से पहले लोग अपने अपने घरों में गणपति उत्सव मनाते थे। लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे। पुणे के शनिवारवाडा के गणपति उत्सव मे हजारो लोगों की भीड़ उमड़ी। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएगे अंग्रेज पुलिस उन्हे गिरफ्तार करके दिखाए। कानून के मुताबिक अंग्रेज पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम मे एकत्रित भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी। लेकिन किसी धार्मिक समारोह मे उमड़ी भीड़ को नहीं।
20 अक्तूबर 1894 से 30 अक्तूबर 1894 तक पहली बार 10 दिनों तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया।
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पुणे का शनिवारवाड़ा में गणपति उत्सव
20 अक्तूबर 1894 से 30 अक्तूबर 1894 तक पहली बार 10 दिनों तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया। लोक मान्य तिलक वहां भाषण के लिए हर दिन किसी बड़े नेता को आमंत्रित करते। 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित किए गए। उसके अगले साल 31 और अगले साल ये संख्या 100 को पार कर गई।
फिर धीरे -धीरे महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो अहमदनगर, मुंबई, नागपुर, थाणे तक गणपति उत्सव फैलता गया। गणपति उत्सव में हर वर्ष हजारो लोग एकत्रित होते और बड़े नेता उसको राष्ट्रीयता का रंग देने का कार्य करते थे। इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया और राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई।
1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से कहा था-
गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना है। आजादी हासिल करना है और अंग्रेजो को भारत से भगाना है। आजादी के बिना गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं रहेगा। तब पहली बार लोगों ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा। आजादी के आन्दोलन में लोकमान्य तिलक द्धारा गणेश उत्सव को लोकोत्सव बनाने के पीछे सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य था। लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों की दूरी समाप्त करने के लिए यह पर्व प्रारम्भ किया था जो आगे चलकर एकता की मिसाल बना।
जिस उद्देश्य को लेकर लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव को प्रारम्भ करवाया था वो उद्देश्य आज कितने सार्थक हो रहें हैं। आज के समय में पूरे देश में पहले से कहीं अधिक धूमधाम के साथ गणेशोत्सव मनाये जाते हैं। मगर आज गणेशोत्सव में दिखावा अधिक नजर आता है। आपसी सदभाव व भाईचारे का अभाव दिखता है। आज गणेश उत्सव के पण्डाल एक दूसरे के प्रतिस्पर्धात्मक हो चले हैं। गणेशोत्सव में प्रेरणाएं कोसों दूर होती जा रही हैं और इनको मनाने वालों में एकता नाम मात्र की रह गई है।
इस बार भी कोरोना महामारी के कारण लगी सरकारी पाबंदियों के चलते सार्वजनिक स्थानों पर गणेशोत्सव का भव्य आयोजन नहीं हो पाएगा। ऐसे में लोगों को अपने घरों में ही मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाकर उसका पूजन करना चाहिए। लागों को गणेश पूजन करते समय विश्व शांति की कामना करनी चाहिए।
कोरोना के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिये गणेश पूजन करते समय भी हमें निर्धारित शारीरिक दूरी बनाए रखनी चाहिए। इस बार मन में गणेश पूजा करनी चाहिए। जो पैसा हम गणेशोत्सव मनाने पर हर बार खर्च करते थे उसे इस बार कोरोना से बचाव पर खर्च करें। इस साल के लिये यही सर्वश्रेष्ठ गणेश पूजा होगी।
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