बापू पर बनी फिल्में और डॉक्यूमेंट्री
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पश्चिमी देशों का गांधी को लेकर रुख
पश्चिम शुरू से गांधी में रुचि रख रहा था लेकिन अलग ढ़ंग से। शुरू में हॉलीवुड का रवैया गांधी के प्रति बड़ा नकारात्मक था। वे सीधे उन पर फ़िल्म नहीं बना रहे थे मगर ‘गंगा दीन’ तथा ‘एवरीबॉडी लाइक्स म्यूजिक’ जैसी फ़िल्मों में परोक्ष रूप से उनका मजाक उड़ा रहे थे। जिसका भारतीय फ़िल्म प्रेस विरोध कर रहा था।
1923 में ब्रिटिश सरकार गांधी पर फ़िल्म बनाने को उत्सुक थी मगर हीरो के रूप में नहीं। फ़ीचर फ़िल्म के पूर्व न्यूजरील दिखाना ब्रिटिश काल में भी होता था। 1922 में ऐसी ही एक साइलेंस न्यूजरील दिखाई जा रही थी, शीर्षक था, ‘गांधी– नाऊ कंडेम्ड टू सिक्स इयर्स’ इसमें गांधी को लोगों को संबोधित करते दिखाया गया था।
इसी तरह 1932 में उन्हें एक न्यूजरील में ‘गांधी फ़ास्ट ब्रिंग न्यू इंडियन क्राइसिस’ शीर्षक से दिखाया जा रहा था। ब्रिटिश सरकार के लिए वे एक बड़ी मुसीबत (‘नटोरियस एजीटेटर’) थे। पर एक अमेरिकन न्यूजरील कंपनी ‘फ़ॉक्स मूवीटोन’ ने 1931 में उनकी आवाज को ‘महात्मा गांधी टॉक्स’ नाम से पकड़ा था। गांधी जी ने इस शूटिंग को नापसंद करते हुए भी इसमें सहयोग किया था।
गांधी जी पर पहली ब्रिटिश फ़िल्म
गांधी जी पर पहली ब्रिटिश फ़िल्म की बात करें तो यह है, ‘नाइन आवर्स टू राम’। मार्क रॉबसन के निर्देशन में 1963 में बनी इस फ़िल्म में हत्या पूर्व गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे की मानसिकता के नौ घंटों का काल्पनिक चित्रण किया है। यहाँ गांधी की भूमिका जे.एस कश्यप ने की है।
यह फ़िल्म स्टेनली वॉलपर्ट (उन्होंने गांधी, जिन्ना, नेहरू, भुट्टो पर भी लिखा है) के लेखन ‘गांधी’ज पैशन: द लाइफ़ एंड लेगेसी ऑफ़ महात्मा गांधी’ पर आधारित है। यहाँ गांधी कुछ ही दृश्यों में आते हैं और गांधी जी के अलावा अन्य अभिनेता गैर भारतीय हैं और उनका भारतीय लहजे में इंग्लिश बोलना बड़ा अटपटा लगता है।
पश्चिम वाले गांधी जी के खिलाफ़ फ़िल्म बनाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने हॉलीवुड के उस समय के अमेरिका के एक प्रसिद्ध फ़िल्मकार डी. ड्ब्ल्यू. ग्रिफ़िथ से बात भी की थी। मगर बात बनी नहीं। इसके पहले गांधी जी पर फ़िल्म निर्माण की एक और योजना पूरी होने के पहले ही समाप्त हो गई।
गांधी जी की मृत्यु के कुछ साल बाद ही 1952 में हंगरी के फिल्मकार गेब्रियल पास्कल गांधी जी पर फिल्म निर्माण करना चाहते थे। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि वे कुछ कर पाते उससे पहले ही 1954 में उनकी मृत्यु हो गई और यह प्रयास असफ़ल हो गया।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन की प्रोफ़ेसर और भारतीय संस्कृति तथा सिनेमा की विशेषज्ञ रेचल ड्वायर लिखती हैं, हंगेरियन फ़िल्म निर्देशक गैब्रियल पास्कल तथा इंग्लिश फ़िल्मकार डेविड लीन (बाद में उन्होंने ‘लॉरेंस ऑफ़ अरबिया’ जैसी बेहतरीन फ़िल्म बनाई और खूब प्रसिद्धि पाई) गांधी पर फ़िल्म बनाना चाहते थे। लीन तो 1958 में भारत आए भी मगर उनकी स्क्रिप्ट को स्वीकृति नहीं मिली। इस तरह कई निर्देशक चाहते हुए भी महात्मा को परदे पर न ला सके।
लेकिन एक अन्य प्रयास ऐसा सफ़ल हुआ जिसकी मिसाल मिलनी काफ़ी मुश्किल है। गांधी के अनुयायी मोतीलाल कोठारी ने रिचर्ड एटेनबरो को लुई फिशर की लिखी गांधी की जीवनी (गांधी: हिज लाइफ़ एंड मेसेज फ़ॉर द वर्ल्ड) दे कर इस ग्रैंड फ़िल्म को बनाने का सुझाव रिचर्ड एटेनबरो को दिया था।
सितारवादक रविशंकर ने एक समय राग ‘मोहनकौंस’ बनाया था, रविशंकर ने ही जॉर्ज फेंटॉन के साथ मिलकर एटेनबरो की फिल्म ‘गांधी’ के लिए संगीत रचना की। रिचर्ड एटेनबरो की ‘गांधी’ ने महात्मा गांधी पर बनी सारी फ़िल्मों के रिकॉर्ड भंग कर दिए। जिस पर हम आगे बात करेंगे।
आगे पढ़िए गांधी और सिनेमा श्रृंखला का पांचवां भाग- गांधी जी पर कुछ और फ़िल्में
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