बापू से प्रेरित फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई
- फोटो : Twitter
दक्षिण अफ़्रीका में गांधी के संघर्ष की कहानी
फ़िल्म ‘मेकिंग ऑफ़ महात्मा’ दक्षिण अफ़्रीका में गांधी के संघर्ष और सत्याग्रह को शिद्दत से दिखाती है। पीटर मारित्जबर्ग के सूने प्लेटफ़ॉर्म पर फ़ेंक दिए जाने से मोहनदास का आत्मसम्मान अपमानित हुआ और उन्होंने गुलाम देश के नागरिकों को सम्मान दिलाने का प्रण किया। फ़िल्म पात्र के अंतर में पैठ कर उसके मनोविज्ञान का अध्ययन करती है एवं उसके मानसिक द्वंद्व को दर्शक तक पहुँचाती है।
फ़िल्म गांधी के त्याग-बलिदान को रेखांकित करती फ़िल्म कई दृश्यों, जैसे मोहनदास करमचंद का अश्वेत होने के कारण, आधिकारिक टिकट होने के बावजूद सत्ता द्वारा ट्रेन से फ़ेंका जाना, गुस्से और जिद में कस्तूर बा को गर्भावस्था में घर से बाहर निकालना, श्वेत मालिक से कोड़े की चोट खाए अश्वेत के घावों पर मलहम लगाना आदि के लिए स्मरण रखी जाएगी।
रजित कपूर युवा गांधी के लिए पुरस्कृत हुए। गांधी न तो बौद्धिक थे, न राजनेता और न ही समाज सुधारक या धार्मिक लेकिन करोड़ों लोगों के पूज्य बने, उद्धारक बने, फ़िल्म यह सब पुरजोर ढ़ंग से प्रदर्शित करती है।
गांधी दुनिया से जुड़े लेकिन अपने ही बच्चों से न जुड़ सके। गांधी (दर्शन जरीवाला) और उनके बेटे हरि लाल (अक्षय खन्ना) के रिश्तों को लेकर 2007 में फ़िरोज अब्बास खान ने ‘गांधी माई फादर’ फ़िल्म बनाई। जरीवाला को इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यह फ़िल्म पिता-पुत्र के नाजुक संबंधों की पहचान करती है।
जून 1948 में एक भिखारीनुमा नशे में धुत्त आदमी अपने पिता का नाम गांधी बताता है। पहले लोग समझ नहीं पाते हैं, बाद में पता चलता है यह पिता, परिवार, समाज से उपेक्षित, जीवन से निराश-हताश गांधी का बेटा हीरालाल गांधी है। पूरी फ़िल्म फ़्लैशबैक में चलती है।
गांधी 1906 में दक्षिण अफ़्रीका चले जाते हैं, वहाँ वे घटनाचक्र मे पड़ते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता, और राजनैतिक नेता के रूप में उभरते हैं। इस बीच भारत में रह गया उनका बेटा हरिलाल गुलाब (भूमिका चावला) से शादी करता है। मगर उसे गुलाब को छोड़ कर दक्षिण अफ़्रीका, डरबन जाना पड़ता है। यहाँ बा के किरदार में शैफ़ाली शाह है। फ़िल्म पीढ़ियों की सोच की खाई को प्रदर्शित करती है।
एक ने खुद को देश के लिए कुर्बान कर दिया तो दूसरे ने पिता द्वारा अनदेखी किए जाने पर खुद को नष्ट कर डाला। माँ के प्रति समर्पित हीरालाल एक दिन अपने पिता से कहता है, ‘आप जो भी हैं इसके (‘बा’) और मात्र इसके कारण हैं।’ हीरालाल बैरिस्ट्री पढ़ने इंग्लैंड जाना चाहता था गांधी उसे समाज सेवा में जोड़ना चाहते थे। कुंठित-भ्रमित हीरालाल शराब के नशे में खुद को डुबो लेता है, इस्लाम का रास्ता अपनाता है।
136 मिनट की धीमी गति से आगे बढ़ती हुई फ़िल्म उसकी हताशा-निराशा को चित्रित करती है। फ़िल्म श्वेत-श्याम फ़ुटेज का प्रयोग करती है। पियुष कनौजिया के संगीत से सजी फ़िल्म उन्हीं के नाटक, ‘गांधी वर्सेस महात्मा’ पर बनी है। पुरस्कार से नवाजी फ़िल्म गांधी को कमतर नहीं दिखाती है।
आगे हम गांधी जी पर बनी सर्वोत्तम फ़िल्म को देखेंगे।
आगे पढ़िए गांधी और सिनेमा श्रृंखला का छठा भाग- परदे पर अमर महात्मा गांधी
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।