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संस्कृति के पन्नों से: गणेश ने इस तरह तोड़ा कुबेर का अहंकार

सार

कुबेर सहमत हो गया। वह गणेश को साथ लेकर अपनी स्वर्ण-नगरी लंका पहुंचा। उसने गणेश को अनेक तरह की स्वर्ण-निर्मित अद्भुत वस्तुएं दिखाईं। स्वर्ण देख-देखकर गणेश ऊब गए। उन्हें भूख लगी। भूख लगने पर व्यक्ति को स्वर्ण नहीं, भोजन चाहिए!
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Lord Ganesh and Kuber story - फोटो : Social media
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विस्तार
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धन का देवता और लंका का राजा बनने के बाद कुबेर का वर्चस्व बहुत बढ़ गया था। ऐश्वर्य, घमंड का जनक है। कुबेर को अहंकार हो गया कि वह अपार धन-संपदा से किसी को भी संतुष्ट कर सकता है। एक बार वह कैलाश पहुंचा और शिव-पार्वती को आतिथ्य स्वीकार करने का निमंत्रण दे डाला। शिव-पार्वती समझ गए कि कुबेर वैभव का प्रदर्शन करना चाहता है। उन्होंने कहा, ‘हमें कुछ आवश्यक कार्य है; तुम चाहो तो हमारे पुत्र गणेश को अतिथि बना लो।’

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कुबेर सहमत हो गया। वह गणेश को साथ लेकर अपनी स्वर्ण-नगरी लंका पहुंचा। उसने गणेश को अनेक तरह की स्वर्ण-निर्मित अद्भुत वस्तुएं दिखाईं। स्वर्ण देख-देखकर गणेश ऊब गए। उन्हें भूख लगी। भूख लगने पर व्यक्ति को स्वर्ण नहीं, भोजन चाहिए!

कुबेर ने गणेश के लिए आसन लगवा दिया। सेवक, गणेश के लिए थाल में भोजन ले आए। इधर सेवक ने गणेश के सामने भोजन से भरा थाल रखा, उधर गणपति ने थाल खाली कर दिया और कहा, ‘इतने-से भोजन से क्या होगा? मुझे भूख लगी है। और भोजन लाओ!’
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सेवक इस बार बड़े थाल में दोगुना भोजन लेकर लौटा। गणेश उसे खाकर सेवक की ओर देखने लगे। सेवक और भोजन लाया...और फिर बस, लाता ही चला गया! कुबेर ने गणेश को समझाया- ‘वत्स, अधिक खाने से पेट खराब हो जाता है। तुम्हें और नहीं खाना चाहिए।’

गणेश ने कटाक्ष किया- ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि धन के देवता के पास बालक को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है?’ अहंकार पर चोट पड़ी तो कुबेर ने कहा, ‘कुबेर, पूरे संसार का पेट भर सकता है! खाओ...मैं भी देखता हूं, तुम कितना खा सकते हो!’

गणेश मुसकराए और खाने बैठ गए। कुबेर के सेवक भोजन पकाते-परोसते थक गए, लेकिन गणेश तृप्त नहीं हुए। सैकड़ों लोगों का भोजन गणेश अकेले चट कर गए। कुबेर का अन्न-भंडार खाली होने लगा तो उसे लगा कि दाल में कुछ काला है! उसने संकोचपूर्वक गणेश से पूछा, ‘मेरा भंडार रिक्त हो चला है। अब क्या खिलाऊं?’

गणेश ने कुबेर के स्वर्णासन को देखकर कहा, ‘भोजन नहीं है तो क्या? आपके पास स्वर्ण तो बहुत है! मैं जब से आया हूं, तब से आप मुझे स्वर्ण ही तो दिखा रहे हैं। अब मैं उसी से पेट भरूंगा।’ गणेश ने कुबेर के सिंहासन का पाया चबा लिया। सिंहासन लड़खड़ाया और एक ओर लुढ़क गया। कुबेर ने हाथ जोड़ लिए। परंतु इतनी देर में गणेश ने और कई चीज़ें चबा डाली थीं।

कुबेर के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। वह कैलाश भागा और शिव-पार्वती के सामने गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘गणेश ने मेरा अन्न-भंडार खाली कर दिया है लेकिन उसकी भूख शांत नहीं हुई। अब वह महल की स्वर्ण-निर्मित अनमोल वस्तुएं चबा रहा है। मैं समझ चुका हूं कि आपने और गणेश ने मेरा अहंकार दूर करने के लिए यह लीला रची थी। मैं लज्जित हूं।’

तब पार्वती ने कुबेर को एक मुट्ठी चावल दिए और कहा, ‘गणेश को अहंकार पसंद नहीं है। यह चावल विनम्रता से गणेश को परोस देना। उसकी भूख शांत हो जाएगी।’ कुबेर चावल लेकर लंका पहुंचा। तब तक गणेश बहुत-सा और सामान खा चुके थे। उसने तुरंत चावल पकाए और आदर सहित गणेश को अर्पित कर दिए। चावल खाते ही गणेश ने जोर-से डकार ली और उठकर खड़े हो गए। ‘वाह! अब तृप्ति हुई है!’

गणेश ने कहा, ‘मेरा पेट भर गया, धनराज कुबेर। अब आप मुझे वापस मेरे माता-पिता के पास ले चलिए।’ ‘किंतु...मेरा सिंहासन...और अनमोल वस्तुएं...’ कुबेर ने संकोच करते हुए कहा।
‘हा! हा!!’ गणेश ने ठहाका लगाया। ‘इनकी चिंता मत कीजिए। वैसे भी मुझे अहंकार से बना भोजन पचता नहीं है!’ यह सुनकर कुबेर पानी-पानी हो गया। कुबेर, बालक गणेश को कैलाश छोड़कर लौटा तो उसे सब सामान एवं अपना सिंहासन सही-सलामत मिल गया। और, साथ ही एक सबक भी!

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