जीवन जीने के लिए खाद्य पदार्थों की मूलभूत आवश्यकता होती है। आहार शुद्ध और पौष्टिक होना चाहिए। सुरक्षा का तात्पर्य है खतरे की चिंता से मुक्ति। खाद्य सुरक्षा का तात्पर्य है खाद्य की कमी के खतरे की चिंता से मुक्ति।
खाद्य सुरक्षा का मतलब है समाज के सभी नागरिकों के लिए जीवन चक्र में पूरे समय पर्याप्त मात्रा में ऐसे विविधतापूर्ण भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित होना, यह भोजन सांस्कृतिक तौर पर सभी को मान्य हो और उन्हें हासिल करने के समुचित माध्यम गरिमामय हो।
खाद्य सुरक्षा की इकाई देश भी हो सकता है, राज्य भी और गांव भी। खाद्य सुरक्षा की अवधारणा व्यक्ति के मूलभूत अधिकार को परिभाषित करती है। अपने जीवन के लिए हर किसी को निर्धारित पोषक तत्वों से परिपूर्ण भोजन की जरूरत होती है। महत्वपूर्ण यह भी है कि भोजन की जरूरत नियत समय पर पूरी हो।
किसी ने क्या खूब कहा है- भूखे भजन न होए गोपाला ! पहले अपनी कंठी माला। भूखे पेट तो ईश्वर का भजन भी नहीं होता है। फिर विकास की बात सोचना अपने को अंधेरे में रखने के समान है। इसका एक पक्ष यह भी है कि आने वाले समय की अनिश्चितता को देखते हुए हमारे भण्डारों में पर्याप्त मात्रा में अनाज सुरक्षित हो, जिसे जरूरत पड़ने पर तत्काल जरूरतमंद लोगों तक सुव्यवस्थित तरीके से पहुंचाया जाए।
भोजन का अधिकार एक व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। केवल अनाज से हमारी थाली पूरी नहीं बनती है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें विविधतापूर्ण भोजन (अनाज, दालें, खाने का तेल, सब्जियां, फल, अंडे, दूध, फलियां, गुड़ और कंदमूलों) की हर रोज़ जरूरत होती है ताकि कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, सुक्ष पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा किया जा सके।
भोजन का अधिकार सुनिश्चित करने में सरकार की सीधी भूमिका है क्योंकि अधिकारों का संरक्षण नीति बनाकर ही किया जाता है और सरकार ही नीति बनाने की जिम्मेदारी निभाती है। यदि यह विविधता न हो तो हमारा पेट तो भर सकता है, परन्तु पोषण की जरूरत पूरी न हो पाएंगी।
सामान्यतः केवल गरीबी ही भोजन के अधिकार को सीमित नहीं करती है; लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के कारण भी लोगों के भोजन के अधिकार का हनन हो सकता है। पीने के साफ़ पानी, स्वच्छता और सम्मान भी भोजन के अधिकार के हिस्से हैं।