जिस दौर के दौरान दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे थे, उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर एकक्षत्र राज था। हिन्दी भाषा में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का देश में जबरदस्त बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे नाममात्र के कुछ कवि ही बच गए थे।
इस समय सिर्फ़ 44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की। दुष्यंत कुमार की हिंदी भाषा पर जितनी अच्छी पकड़ थी, उर्दू भाषा की भी उतनी अच्छी जानकारी भी। यही वजह है कि उनको देश का पहला हिंदी ग़ज़ल लेखक माना जाता है। दुष्यंत कुमार ने कविता, गीत, गजल, काव्य, नाटक, कथा, हिंदी की सभी विधाओं में लेखन किया था, लेकिन उनकी गजलें उनके लेखन की दूसरी विधाओं पर हमेशा भारी पड़ी और लोगों के दिलों-दिमाग पर छा गईं।
उनकी हर गज़ल आम आदमी की आवाज़ बन गई है, जिसमें चित्रित है, आम आदमी के जीवन संघर्ष की दास्तान, आम आदमी के जीवना का दर्द व दर्पण, देश की राजनैतिक विडम्बनाएं और विसंगतियां। राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्रशासनिक तन्त्र की संवेदनहीनता, वही उनकी गजलों का ताकतवर स्वर है।
दुष्यन्त कुमार ने गज़ल को रूमानी तबिअत से निकालकर देश के आम आदमी से जोड़ने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। दुष्यंत कुमार ने गजल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और वह इसमें पूरी तरह सफल भी हुए।
कहां तो तय था चिराग़ां हर एक घर के लिए
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहां दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पांवों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूं आवाज़ में असर के लिए
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए
जिएं तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।