दुनिया बदली है और समाज भी। अब पुरुषों का भावुक होकर अपने बच्चों के प्रति लगाव दिखाना आम बात है।
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दुनिया बदली है और समाज भी। अब पुरुषों का भावुक होकर अपने बच्चों के प्रति लगाव दिखाना आम बात है। वे अब केवल बच्चे के पिता बनने तक सीमित नहीं रह गए है बल्कि पिता होने के सहज रूप को भी खुलकर जी रहे हैं।
मेरे एक परिचित सज्जन हैं। 3-4 साल पहले जब उनके बच्चे का जन्म हुआ तो वे लेबर रूम में अपनी पत्नी के साथ थे और बाहर आकर इतना रोये की डॉक्टर को उन्हें सम्भालने आना पड़ा। बाद में उन्होने बताया कि एक महिला जीवन के इस पड़ाव पर इतने दर्द और तकलीफ से गुजरकर बच्चे को जन्म देती है उन्हें यह अंदाजा नहीं था। वह बोले कि यह देखने के बाद अपनी पत्नी और हर महिला के लिए उनके मन मे सम्मान और बढ़ गया है।
वे इस दर्द को तो नहीं सहन कर सकते लेकिन बच्चे की परवरिश में मां के बराबर भूमिका निभाने का पूरा प्रयास करेंगे और उन्होने यह बात सच कर दिखाई। बाद में एक दिन उनकी पत्नी ने खुद हंसते हुए कहा कि रात को जागकर बच्चे की नैपी बदलने से लेकर उसके साथ साथ उनकी (पत्नी की) डाइट का भी पूरा ख्याल रखने तक हर काम उनके पति ने इतनी शिद्दत से किया कि उन्हें लगा माँ जरूर वे बनी हैं लेकिन पैरेंटिंग के पूरे नम्बर तो उनके पति को ही मिलेंगे।
अपनी दादी की मृत्यु के समय जब मैंने पहली बार अपने पिता को रोते देखा तो मैं एकदम से जड़ हो गई थी। हमेशा धीर गम्भीर रहने वाले पिता को इस तरह टूटते मैंने कभी नही देखा था। रफ-टफ इमेज वाले अपने पिता को इस तरह देखना मुझे अंदर तक झकझोर गया।
उस दिन मैंने यह भी समझा कि अपने दायित्वों को निभाते हुए हमेशा एक सख्त पिता की भूमिका निभाने वाले पापा न जाने कितने सालों से अपने आंसुओं को भीतर दबाए हुए थे। उनके इस रूप ने मेरे लिए उनके नए भावनात्मक पक्ष को सामने ला खड़ा किया था।
आजकल जमाना सोशल मीडिया का है और यहां आपको भावनाओं में भरकर रोते हुए कई पिता आसानी से दिखाई दे जाएंगे। तो इस फादर्स डे पितृत्व के एहसास को खुलकर जीने और अपने बच्चे के प्रति भावनाओं को खुलकर प्रकट करने वाले पिताओं के इन आंसुओं का स्वागत कीजिये, ये उनके कमजोर होने की नहीं, भावनात्मक रूप से और मजबूत होने की निशानी है।
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