अचानक से कांग्रेस के नेताओं, समान विचारधारा वाली पार्टियों के नेताओं, बीजेपी के विरोधी पूर्व पत्रकारों-बुद्धिजीवियों ने कश्मीरी पंडितों के कश्मीर घाटी से निष्कासन के लिए एक नया विलेन ढूंढ लिया है, ऐसा विलेन जो कभी इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, यहां तक कि वीपी सिंह सरकार के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद तक की आंखों का तारा हुआ करता था। ‘कश्मीर फाइल्स’ मूवी को कई सीरियस नहीं ले रहा था, लेकिन जब सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा हुआ तो निशाने पर कांग्रेस भी आ गई और उसकी कई वजह थीं।
शुरुआत से कश्मीर नीति, धारा 370 और फौरी कारण में मकबूल बट को मौत की सजा देने वाले जज के हत्यारे यासीन मलिक को इतनी तबज्जों देना कि पीएम मनमोहन सिंह से मिला दिया, ऐसे में बीजेपी के विरोधियों ने कश्मीर के उस दौर के गर्वनर जगमोहन पर तब ठीकरा फोड़ा, जब वो जिंदा नहीं हैं।
आखिर कश्मीर का सच क्या है? क्या वाकई जगमोहन जिम्मदार हैं? अगर हैं तो कश्मीरी पंडितों के संगठन उन्हें अपना रक्षक क्यों मानते हैं? फिर क्यों अमित शाह धारा 370 को हटाने के बाद उनसे मिलने गए थे?
दिल्ली कायापलट कर दी जगमोहन ने
इन्हीं 2 आखिरी सवालों में मोटे तौर पर जवाब है, जो एक पक्ष का हीरो है, उसे दूसरे पक्ष विलेन बना देता है। पहले जानें सिविल सेवा के अधिकारी जगमोहन मल्होत्रा ने कश्मीर से पहले दिल्ली का कायापलट कैसे किया था? मोरारजी देसाई को याद था कि इस व्यक्ति ने मास्टर प्लान के लिए केवल 5 करोड़ रुपए ‘रिवॉल्विंग फंड’ के तौर पर उनके वित्त मंत्री रहते लिए थे, जबकि बजट 732 करोड़ था और उसी से दिल्ली में हजारों एकड़ जमीन डीडीए के लिए जुटा ली थी।
मोरारजी ने पूछागांधी मां-बेटे को क्यों सपोर्ट कर रहे हो? तो जैसे कल्याण सिंह ने बाबरी का दोष अपने ऊपर लिया, जगमोहन ने भी स्लम हटाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, एक तरह से ये श्रेय भी था।
एशियाड के दौरान 2 साल के अंदर नेहरू स्टेडियम, इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम, तालकटोरा पूल, करणी सिंह शूटिंग रेंज, गेम्स विलेज जैसे इनफ्रास्ट्क्चर खड़ा करना जगमोहन के बस की ही बात थी। दिल्ली में मेट्रो लाने का आइडिया भी उन्हीं का था। पुराने किले में लोग लकड़ी की टालें और कोयला डिपो चलाते थे, उन्हें हटाया गया।
डीडीए के उपाध्यक्ष बने तो दिल्ली में ग्रुप हाउसिंग स्कीम लांच की गईं, मयूर विहार और बसंत कुंज जैसे इलाके बने, लोगों को मदनगीर, दक्षिणपुरी और त्रिलोकपुरी में बसाया गया। दिल्ली में हाउसिंग योजना देखकर तो मार्गेट थैचर तक ने इंदिरा गांधी को लिखकर तारीफ की थी।
कयामत की रात जगमोहन ने संभाला था जम्मू-कश्मीर का चार्ज
जो लोग कश्मीरी पंडितों को लेकर ये सवाल पूछे रहे हैं कि कश्मीरी पंडितों ने घाटी को जगमोहन के गवर्नर रहते छोड़ा? उनको ये पता होना चाहिए या पता होते भी जनता को वो जानबूझकर नहीं बता रहे हैं कि कश्मीरी पंडित 19 जनवरी 1990 को ‘पलायन दिवस’ के तौर पर मनाते हैं, और जगमोहन ने अपने दूसरे कार्यकाल में कश्मीर के गर्वनर के तौर पर चार्ज लिया था, वो तारीख भी यही थी- 19 जनवरी 1990 की रात, लेकिन घाटी में नहीं, बल्कि जम्मू में, क्योंकि सर्दियों की राजधानी जम्मू होती थी।
उस रात वो वहां पहुंचे ही थे और लगभग सभी बड़े सिविल व सैन्य अधिकारी उनके स्वागत के लिए जम्मू में मौजूद थे और उसी रात ये खेल हो गया।
आपको समझना होगा कि जगमोहन पहली बार इस कार्यकाल में एक कमजोर प्रधानमंत्री और गठबंधन सरकार के साथ काम कर रहे थे। इससे पहले वो नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के साथ काम कर चुके थे, और बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स को उन्होंने अंजाम दिया था। कैसे उन्होंने यमुना किनारे की गंदी बस्तियों और श्मशान घाटों की तस्वीर बदल दी थी, ये पूरे देश को पता है।
इमरजेंसी के दौरान भी वो विवादों मे रहे, लेकिन हर बार उनके साथ उनके काम के चलते सरकार मजबूती से खड़ी रहती थी। यूं भी उनके जाने से पहले ही कश्मीर के हालात काफी खराब हो चले थे। 4 जनवरी को ही आतंकी संगठनों का हिंदुओं को घाटी छोड़ने का फरमान अखबारों में छप गया था।
जगमोहन को कश्मीर भेजने के पीछे मुफ्ती की मंशा
जब गांधी परिवार के करीबी थे, तब वीपी सिंह ने उन्हें कश्मीर क्यों भेजा? इस सवाल के जवाब कश्मीरी पंडितों के पलायन के बीच छुपे हैं। ये समझना होगा-
दरअसल वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पहले कांग्रेस में थे, उनकी और अरुण नेहरू की जगमोहन से अच्छी दोस्ती थी। उस वक्त कश्मीर में सरकार थी मुफ्ती के दुश्मन और उनकी बेटी महबूबा के वर्तमान में शुभचिंतक फारुख अब्दुल्ला की। मुफ्ती को अच्छे से पता था कि अगर जगमोहन को गर्वनर बनाकर कश्मीर भेजा गया तो फारुख अब्दुल्ला फौरन इस्तीफा दे देंगे, क्योंकि उन्हें जगमोहन पसंद नहीं थे। मुफ्ती खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे।
जिस जगमोहन को आज आतंकियों के सामने कमजोर साबित किया जा रहा है, उसी जगमोहन को कभी गर्वनर बनाकर इंदिरा गांधी ने अप्रैल 1984 में कश्मीर भेजा था और खालिस्तानी आतंकियों से रिश्ते बनाने जैसी हरकतों के चलते उनकी पार्टी को तुड़वाकर उनके ही बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार बनवा दी थी।