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राजस्थान डायरी: कर्ज में डूबा है राज्य, नए मुख्यमंत्री के सामने खड़ा है चुनौतियों का बड़ा पहाड़

सार

कमजोर वित्तीय प्रबंधन से जूझ रहे राजस्थान में गारंटियां कैसे पूरी होंगी? पिछली सरकार की लोक-लुभावन योजनाओं का क्या होगा? यह एक बड़ा सवाल है।
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चुनाव से कुछ महीने पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में मुफ्त बिजली योजना शुरू की। मुफ्त बिजली योजना सरकार को भारी पड़ रही है। - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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राजस्थान में भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई है। शुक्रवार को नए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा शपथ ग्रहण कर लेंगे। कांग्रेस सरकार की नाकामियों को गिनाकर भाजपा सत्ता में लौटी है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बड़ी गारंटियां मरुधरा की जनता को दीं।

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अब राजस्थान में भी डबल इंजन की सरकार है, लेकिन प्रदेश के नए मुखिया के सामने चुनौतियों का बड़ा पहाड़ भी खड़ा है। कमजोर वित्तीय प्रबंधन से जूझ रहे राजस्थान में गारंटियां कैसे पूरी होंगी? पिछली सरकार की लोक-लुभावन योजनाओं का क्या होगा? यह एक बड़ा सवाल है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रचार के दौरान राजस्थान में महंगे पेट्रोल-डीजल का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कीमतें कम करने का वादा किया था। भाजपा शासित अन्य प्रदेशों से राजस्थान में 10-11 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल-डीजल महंगा है। कड़ी आलोचनाओं के बाद भी अशोक गहलोत सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं घटाई थीं।

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दरअसल, राजस्थान सरकार को पेट्रोल-डीजल पर वैट से भारी कमाई हो रही है। वर्ष 2021-22 और 2022-23 में राज्य सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर वैट से 35,975 करोड़ रुपए का टैक्स जुटाया, जो देश के 18 राज्यों द्वारा वसूले गए 32,000 करोड़ के टैक्स से ज्यादा है।

नई सरकार को पेट्रोल-डीजल की कीमतें अन्य भाजपा शासित प्रदेशों के बराबर करनी होगी। अभी हो रही कमाई की भरपाई कहां से होगी, यह नई सरकार के लिए एक चुनौती रहेगी।
 

चुनाव से कुछ महीने पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में मुफ्त बिजली योजना शुरू की। मुफ्त बिजली योजना सरकार को भारी पड़ रही है। बिजली कंपनियां कंगाली के मुहाने पर पहुंच चुकी हैं। घाटा 1.20 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो चुका है। फिलहाल घरेलू उपभोक्ताओं को 200 यूनिट और किसानों को 2000 यूनिट प्रतिमाह बिजली मुफ्त दी जा रही है।


मुफ्त बिजली योजना से अभी सरकार के खजाने को 7000 करोड़ रुपए वार्षिक का बोझ सहन करना पड़ रहा है। चूंकि, नए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पिछली सरकार की जनहित योजनाओं को जारी रखने का वादा किया है तो इस घाटे को पूरा करना उनके लिए बड़ी चुनौती रहने वाली है। 

अशोक गहलोत अपनी चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना को सबसे ज्यादा प्रचारित करते आ रहे थे। उन्होंने पिछले बजट में बीमा राशि को 25 लाख रुपए कर दिया था। उनका चुनावी वादा था कि पुनः सरकार आने पर 50 लाख का बीमा दिया जाएगा।

भाजपा शासित राज्यों में पांच लाख रुपए का आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा मिलता है। यह भी सभी के लिए नहीं है, जबकि राजस्थान में सभी को बीमा का लाभ दिया जा रहा है। चिरंजीवी योजना पर निर्णय लेना नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022-23 में राजस्थान का कर्ज बढ़कर 5 लाख 37 हजार 013 करोड़ हो चुका है। पं - फोटो : अमर उजाला
अशोक गहलोत ने वरिष्ठ नागरिकों की वृद्धावस्था पेंशन बढ़ा दी थी और हर साल 15 फीसदी बढ़ोतरी का प्रावधान किया। इससे राज्य पर 12,000 करोड़ रुपए सालाना का बोझ पड़ा। इस योजना में अभी केंद्र सरकार का योगदान मात्र 367 करोड़ रुपए का है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्जवला गैस धारकों को 450 रुपए में गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने का वादा किया है। राजस्थान में 76 लाख परिवार उज्जवला के अंतर्गत आते हैं। ऐसे में नई सरकार पर 750 करोड़ रुपए से ज्यादा का बोझ पड़ने वाला है। 

अभी योजनाओं को लागू करने के लिए राजस्थान सरकार भारी कर्ज ले रही है। सरकार ने इसी साल अप्रैल से अगस्त की तिमाही में 12,288 करोड़ कर्ज लिया और अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में फिर 14,000 करोड़ का कर्ज लेने की ओर सरकार बढ़ गई।
 
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022-23 में राजस्थान का कर्ज बढ़कर 5 लाख 37 हजार 013 करोड़ हो चुका है। पंजाब के बाद राजस्थान देश में सबसे ज्यादा कर्ज में डूबा राज्य है।

वित्तीय प्रबंधन के अलावा नई सरकार के आगे कानून व्यवस्था बड़ी चुनौती रहने वाली है, क्योंकि यही एक ऐसा मुद्दा है, जिसे भाजपा ने सबसे ज्यादा उछाला था। दूसरा प्रतियोगी परीक्षाओं को करने के लिए भी नई सरकार को ठोस योजना बनानी पड़ेगी। राजस्थान अभी पेपर लीक के लिए बदनाम है। सांप्रदायिक सौहार्द बनाना भी नए मुख्यमंत्री के लिए बड़ा चैलेंज होगा, क्योंकि पिछले 5 सालों में करौली, भीलवाड़ा, जोधपुर समेत कई शहरों में सांप्रदायिक हिंसा हुई है। 

अभी 100 दिन की कार्ययोजना की बात भाजपा की ओर से की जा रही है। लोकसभा चुनाव तक पुरानी सरकार की योजनाएं चलती रहेंगी, ऐसा लगता है। 6 महीने बाद स्पष्ट होगा कि नए मुख्यमंत्री का विजन क्या है और वो जनता की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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