यह मामला तंत्र की निष्ठुरता और व्यवस्था के अंधे होने का चिंतनीय उदाहरण है, और यह भी कि तंत्र बड़े लोगों के लिए अलग पैमानों पर काम करता है और छोटे लोगों के लिए अलग। कायदे-कानून शायद ऐसे ही बेसहारा लोगों के लिए ही हैं, रसूखदारों के लिए नहीं। ऐसा ही एक मामला उजागर भले भोपाल में हुआ, लेकिन देश में ऐसे कितने ही प्रकरण होंगे, जिस पर मानवीय संवेदना और करुणा के साथ विचार करने की जरूरत है।
कोरोना की दूसरी और सबसे घातक लहर में देश में कितने ही बच्चे अनाथ हो गए। कई बच्चों के माता-पिता दोनों ही असमय दुनिया छोड़ गए। ऐसे ही अभागे दो बच्चों के पिता ने भारतीय जीवन बीमा निगम ( एलआईसी) से घर बनाने के लिए होम लोन लिया था। लेकिन पिता और मां के भी कोरोना में अचानक निधन के बाद एलआईसी ने बच्चों के नाम लोन वसूली के नोटिस भेजने शुरू कर दिए।
दोनों बच्चे अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं। उन जैसे कई अनाथ बच्चों को तो अनाथाश्रम में ही रहना पड़ रहा है, लेकिन गनीमत है तो इस घटना में शामिल दोनों बच्चों की देखरेख उनके मामा-मामी कर रहे हैं। मामा के सामने भी सवाल यह है कि वो अपने भांजे भांजियों की देखभाल करें या फिर अपने जीजा के होम लोन को चुकाएं। इतना पैसा तो उनके पास भी नहीं हैं। ये दिल को द्रवित करने वाली खबर मीडिया में आई तो पढ़कर कई लोगों की आंखें नम हो गईं। कुछ हाथ भी मदद के लिए आगे आए।
बेसहारा बच्चों को कर्ज का नोटिस
यह पूरा मामला भोपाल के पाठक परिवार के बच्चे वनिशा पाठक और विवान पाठक का है। वनिशा 17 साल की और विवान 11 साल का है। वनिशा पढ़ने में होशियार है और उस ने कक्षा दसवीं में 99.8 फीसद अंक लाकर अव्वल स्थान प्राप्त किया था। दोनों बच्चों के माता-पिता प्रोफेसर थे। कोरोना से पहले उनकी जिंदगी भी तमाम दूसरे बच्चों की तरह खुशहाल थी। लेकिन दूसरी लहर ने मानो भाग्य रेखा को ही बदल दिया।
पहले मां डाॅ. सीमा पाठक और उसके दस दिन बाद ही पिता प्रो.जितेन्द्र पाठक ने भी कोरोना से लड़ते हुए दम तोड़ दिया। एक हंसता-खेलता परिवार अचानक बिखर गया। बच्चों के मामा अशोक शर्मा भी प्रोफेसर हैं।
बहन और बहनोई के असमय निधन से दुखी अशोक शर्मा दोनों बच्चों को अपने घर ले आए। वनिशा के पिता जितेन्द्र पाठक ने भोपाल की पेबल वे काॅलोनी में अपना मकान बनाने के लिए एलआईसी से 2012 में 26 लाख रु. का कर्ज लिया था। उनके और पत्नी के निधन के बाद कर्ज की किस्तें भरनी बंद हो गईं और कर्ज की राशि भी बढ़कर 29 लाख हो गई। लेकिन एलआईसी बदस्तूर कर्ज वसूली के नोटिस भेजती रही।
यही नहीं, उसने जितेन्द्र पाठक के तमाम क्लेम और बचतों को इस कारण से रोक दिया कि वनिशा अभी नाबालिग है। जबकि जितेन्द्र पाठक एलआईसी की विशेष सुविधाओं वाली योजना मिलियन डाॅलर राउंड टेबल क्लब के सदस्य भी थे, लेकिन कर्ज वसूली नोटिसों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
इस बीच वनिशा ने विशेष परिस्थिति और अपने अनाथ होने का हवाला देकर एलआईसी ऋण वसूली स्थगित करने की गुहार की तो संस्था ने यह कहकर टालमटोल शुरू कर दी कि आवेदन हेड ऑफिस को भेजा गया है। वहां से मंजूरी के बाद ही कोई फैसला होगा।
संज्ञान के बाद आदेश
यह पूरा प्रकरण जब एक दैनिक अखबार में छपा तो हडकंप मच गया। मप्र. बाल अधिकार आयोग ने इसका संज्ञान लेते हुए कहा कि बच्चों को इस तरह वसूली नोटिस देना पूरी तरह गलत है। यह द्रवित कर देने वाला मामला केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन की जानकारी में आया तो उन्होंने एलआईसी अधिकारियों को तुरंत इस मामले में कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इसके बाद भारतीय जीवन बीमा निगम के स्थानीय अधिकारी दोनों बच्चों से मिलने शिवाजी नगर स्थित उनके मामा के घर पहुंचे। जहां अधिकारियों ने बच्चों के बालिग होने तक ऋण वसूली की कार्रवाई नहीं करने और 2023 तक ऋण बकाया पर किसी तरह का दंड नहीं लगाने का आश्वासन दिया।
उधर भोपाल जिला कलेक्टर अविनाश लवानिया ने एलआईसी के स्थानीय अधिकारियों से मामले में चर्चा कर दोनों बच्चों को राहत देने और किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने एलआइसी को नोटिस जारी कर एलआईसी से जवाब-तलब किया। इस बीच बेटी वनिशा ने मुख्यंमत्री व जिला प्रशासन के साथ एलआईसी अधिकारियों से मकान का लोन माफ कराने की गुहार लगाई।
उसका कहना है-
माता-पिता की मृत्यु के बाद उनके पास आय का कोई जरिया नहीं है। यदि एलआईसी घर नीलाम कर देती है, तो रहने के लिए घर भी नहीं बचेगा।
हालांकि राज्य सरकार ने भी कोरोना राहत के नाम पर दोनों बच्चों को एक-एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी थी। वहीं हर महीने उनकी परवरिश के लिए सरकार की ओर से पांच-पांच हजार रुपये दिए जा रहे हैं।