बच्चों को सुविधाएं दें, लेकिन उन्हें कमरे रूपी कुकर में न छोड़ें।
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जैसे ही आपको लगे कि सब्जी और मसाले मिल गए हैं, आपस में इनका रिश्ता गहरा हो गया है तो इसमें आवश्यकता के मुताबिक पानी, नमक डालकर आंच तनिक तेज कर दें। नजर रखें कि कड़ाही में उबाल तो आए लेकिन सब्जी का रस बहने न पाए। ऐसा हुआ तो भी स्वाद पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
यह नियम गैस चूल्हे पर भी लागू है, इन्डक्शन पर भी लागू है और अगर गलती से कहीं आपके घर में मिट्टी-लकड़ी का चूल्हा है तो उस पर भी लागू है। हम सब इस बात से परिचित हैं कि आजकल हर घर में मौजूद कुकर में बनी सब्जी में वह स्वाद नहीं होता जो ऊपर बनाई गयी विधि से मिलता है।
बस, बच्चों का लालन-पालन भी कुछ कड़ाही में बनने वाली मसालेदार सब्जी की तरह ही किया जा सकता है। गारंटी फिर भी आप नहीं ले सकते कि बच्चा सही रास्ते पर ही जाएगा लेकिन सम्भावना इस बात की है कि बेपटरी नहीं होगा।
आजकल हम कहीं भौतिकवाद में, कहीं पैसों के प्रदर्शन में तो कहीं अत्याधुनिक दिखने के दबाव में बच्चों को दे तो सब कुछ रहे हैं लेकिन बंद कुकर की तरह सारी सुविधाओं के साथ कमरे में छोड़ दे रहे हैं। फिर भाप निकलने की जगह न मिलने की वजह से कई बार कुकर फटने के हादसे हम सबने सुने हैं। जानते हैं क्यों? अरे क्या मूर्खतापूर्ण सवाल मैं पूछ रहा हूं। आप सब जानते हैं कि अगर कुकर की सीटी और भाप निकलने के रास्ते की सफाई नहीं की गई तो हादसे तय हैं।
ठीक इसी तरह बच्चों को सुविधाएं दें, लेकिन उन्हें कमरे रूपी कुकर में न छोड़ें। कड़ाही में सब्जी की तर्ज पर बचपन को पकने दें। उन पर नजर रखें। उस कमरे में अनिवार्य रूप से जाएं जहां बच्चा सोता/सोती है। पढ़ाई की जगह जरुर विजिट करें। समय-समय पर बस्ता, आलमारी, बिस्तर की जांच-पड़ताल भी करते रहें और अंतिम बात यह कि बच्चों के साथ समय जरुर गुजारें।
उनसे आज की दिनचर्या पूछें और कल का प्लान भी। दोस्तों के बारे में बात करें और पढ़ाई की योजना पर भी। और हाँ, दो-चार प्रेरक किताबें अपने आसपास रखें। बच्चे वही करते हैं जो बड़ों को करते हुए देखते हैं। अगर आप गीता, रामचरित मानस, कुरआन, बाइबिल पढेंगे तो प्रबल सम्भावना है कि बच्चों की रूचि भी इसमें जाग जाए। अगर स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसी हस्तियों को पढेंगे तो संभव है कि आपके बच्चे भी उन्हें पढ़ना शुरू कर दें।
कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कितने व्यस्त हैं? थोड़ी कमाई कम कर दें लेकिन प्लीज व्यस्तता का बहाना न बनाएं और बच्चों को समय जरुर दें। उन्हें सही राह दिखाने का मात्र यही एक रास्ता है। मोबाइल, इंटरनेट का उपयोग तो हम सब कर ही रहे हैं।
इसके उपयोग-दुरुपयोग को भी हम सब आसानी से देख पा रहे हैं। और हाँ, बच्चे केवल परिवार के नहीं, देश के भी भविष्य हैं। इनका बेपटरी होना, हादसों को दावत देना है। मुझे उम्मीद है कि आप ऐसा कदापि नहीं करेंगे।
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