दरअसल, कोरोना को लेकर अलग-अलग तरह के दावे सामने आते रहे हैं।
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प्रकृति ने चेताया पर हम चेते नहीं
प्रकृति ने मानव को उसके प्रति की जा रही क्रूरता छोड़ने के लिए कई दफा छोटी-बड़ी आपदाओं के रूप में चेताया और शायद कुछ समय के लिए मानव चेत भी गया। पर मनुष्य ने अपने भूलने और गलती करने के स्वभाव को दोहराते हुए प्रकृति से छेड़छाड़ पुनः शुरू कर दी। प्रकृति से द्वेष रखने के परिणाम स्वरूप ही सुनामी और केदारनाथ जैसी आपदाएं आई, लेकिन मनुष्य ने सबक नहीं लिया. इसीलिए ही सूखा, अतिवृष्टि, तूफान, अकाल, भूकंप, महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं प्रकृति का कोप बन मानव समाज पर कहर ढा रही हैं।
इतिहास में दर्ज प्राकृतिक आपदाओं की बात करें तो साल 1770 में करीब 1 करोड़ लोगों की बंगाल के अकाल में मौत हो गई थी। उत्तरी हिंद महासागर में वर्ष 1999 में 260 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से आए सुपर साइक्लोन ने करीबन 15 हजार जाने ले लीं थी। साल 2013 में केदारनाथ में प्रकृति ने अपना ऐसा रोद्र रूप दिखाया कि लगातार भारी वर्षा और भू-स्खलन के कारण करीबन तकरीबन 50 हजार से से ज्यादा लोग काल कलवित हो गए। एक तरह से यह सरकारी आंकड़ा है, जबकि जमीन पर हालात कैसे होंगे यह तो सोचने का विषय है। हर साल मुंबई में आने वाली बाढ़, अलग-अलग क्षेत्रों में आने वाले भूकंप, महामारी और न जाने कितनी ही आपदाएं मानव के दृष्टिहीन विकास की बली चढ़ रही प्रकृति का ही श्राप हैं।
कहीं प्रकृति द्वेष का ही तो परिणाम नहीं कोरोना
आज मानव सभ्यता के लिए अभिशाप बन चुका कोरोना भी संभवतः मनुष्य की ऐसी ही किसी गलती का दुष्परिणाम हो। कोरोना काल से उबरने के बाद मानव को ये सीख तो लेनी ही चाहिए कि प्रकृति के प्रति द्वेष कैसे उसके आसमान छूते विकास के दंभ को एक ही झटके में धराशायी कर देता है।
दरअसल, कोरोना को लेकर अलग-अलग तरह के दावे सामने आते रहे हैं। पहले इसे बायोवेपन माना जा रहा था और मैनमेड वायरस बताया जा रहा था। खास बात यह है कि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया व अमेरिकी सरकारों ने इसे चीनी का ही जैविक हथियार माना है, लेकिन क्या यह उतना सच है। यह तो आने वाला समय ही बताएगा और यह सच साबित होता है तो यह भी प्रकृति के जीवन चक्र में मनुष्य का सीधा हस्तक्षेप होगा और इसके परिणाम भी घातक ही सिद्ध होंगे।
दूसरी ओर से देखा जाए तो खान-पान, रहन-सहन और जीवन जीने की संस्कृति में बदलाव, ना खाने योग्य खाना, जैविक पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ के नतीजों ने कोरोना वायरस जैसी महामारी को जन्म दिया है। चीन के वुहान में चमगादाड़ के भीतर पाए जाने वाले इस वायरस ने पूरी दुनिया को तहस-नहस कर दिया है। गौर करने वाली बात है कि चीन में वुहान स्थित जैविक प्रयोगशाला जहां संदेह के घेरे में रही है वहीं यहां का एनिमल मार्कैट पूरी दुनिया में एक विभत्स और मनुष्य की सबसे अलग प्रवृत्ति के कारण चर्चा में रहा है। बहरहाल, यदि यह वायरस जानवरों से फैला है प्रकृति के कहर का यह चक्र निकट भविष्य में मिटने के आसार तो नजर नहीं आ रहे।
देखने वाली बात यह है कि कैसे एक छोटे से वायरस के सामने उसके आसमान छूते मेडिकल साइंस ने घुटने टेक दिए हैं, कैसे विकास का पैमाना मानी जाने वाली कंक्रीट से बनीं इमारतें एक बीमारी के सामने खोखली नजर आ रही हैं, कैसे विकास के नाम पर काटे गए वृक्षों ने ऑक्सीजन के लिए मानव को उसकी औकात दिखा दी है। ऐसे कितने की सवाल हैं जिनके उत्तर मनुष्य को खुद के सुरक्षित भविष्य के लिए तलाशने होंगे अंत में केवल इतना कि मनुष्य प्रकृति का विरोध कर अपने लिए विकास का जो रास्ता बना रहा है, वह उसे केवल विनाश की ही ओर ले जाएगा।
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