'सनराइज़ इन स्ल्म्स' किताब काफी चर्चा में रही
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बेहद लोकप्रिय रहा यह कविता संग्रह
1983 में उनका एक कविता संग्रह आया- नाख़ून बढ़े अक्षर। इसकी कविताओं में सत्ता, व्यवस्था और ब्यूरोक्रेसी पर जबरदस्त व्यंग्य था और इसकी कविताएं इतनी चर्चित हुईं कि उन्हें 1985-86 में इसके लिए दिनकर पुरस्कार दिया गया। उनकी कविता ‘जला आदमी’ बहुत चर्चित हुई और हर मंच पर उनकी इस कविता की मांग उठती– इस शहर में कहां रहता है भला आदमी...।
डॉ.रवीन्द्र राजहंस कई सालों तक पटना के दैनिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण और पाटलीपुत्र टाइम्स में अपना व्यंग्य कॉलम लिखते रहे। हर हफ्ते सत्ता, नेता और व्यवस्था पर उनके तीखे व्यंग्य खूब पसंद किए जाते थे।
साहित्य में उनके योगदान के लिए 2009 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके तमाम कार्यक्रम होते रहे और उनकी कविताओं और व्यंग्य रचनाओं को खूब पसंद किया जाता रहा। बेशक उन्होंने खुद को सोशल मीडिया से दूर रखा, साहित्यिक खेमेबाजी के हिस्से नहीं रहे और शुद्ध रूप से अपनी रचनात्मकता और आम आदमी से जुड़ी अपनी दृष्टि को बरकरार रखा। जाहिर है डॉ.राजहंस इसलिए बहुत चर्चा में नहीं रहे और न ही सम्मानों और पुरस्कारों की दौड़ में रहे।
गरीब बच्चों के जीवन को केंद्र में रखकर लिखा
डॉ.राजहंस सीधी सपाट और सीधे तौर पर आपको समझ में आने वाली कविताएं लिखते थे। न ज्यादा छंदों, अलंकारों में बात करते थे और न ही साहित्य की गूढ़ और छायावादी शब्दावलियों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन व्यंग्य का पुट ऐसा होता था कि आपको बेचैन भी कर दे, मुस्कराते हुए हालात पर सोचने के लिए मजबूर भी कर दे। उनकी कविता दृष्टि में बदलाव तब आया जब उन्होंने गरीब बच्चों की जिंदगी को बहुत करीब से देखा।
इन बच्चों पर उनकी 57 कविताओं का संग्रह 2002 में आया- किस चिड़िया का नाम है बचपन। बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था प्रयास की पहल पर ये संग्रह छपा। बाद में स्लमडॉग मिलेनियर से प्रभावित होकर डॉ.राजहंस ने गरीब बच्चों पर खूब लिखा। पेंगुइन ने इनकी किताब ‘सनराइज़ इन स्ल्म्स’ 2013 में छापी जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी में बच्चों पर 101 कविताएं थीं... इसका विमोचन तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया।
उनके दोनों बेटों ज्योति कलश और अमृत कलश पर भी उनके साहित्य का असर कुछ हद तक नजर आता है और भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में अहम पदों पर रहते हुए उनके बच्चों ने डॉ.राजहंस के लेखन को निखारने और सम्मान दिलाने की लगातार कोशिशें की हैं। इसी कोशिश का नतीजा है कि 2018 में वाणी प्रकाशन ने डॉ.रवीन्द्र राजहंस का संग्रह छापा – सूने पिंजरे की चहचहाहट।
दरअसल, साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी, व्यापक और खेमेबाजियों से भरी हुई है। ऐसे में किसी कवि और रचनाकार के चिंतन और लेखन को उचित जगह और उचित सम्मान मिल सके, समाज में पहचान मिल सके, ये एक अहम बात होती है। जाहिर है डॉ.रवीन्द्र राजहंस भी हाशिये पर पड़े उन कई अहम रचनाकारों की ही तरह रहे जिन्हें वो जगह नहीं मिल सकी जिसके वो हकदार रहे।
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