पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियां नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहरें हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा।
महात्मा गांधी
बहरहाल, यह लेख कोरोना पर नहीं है, क्योंकि यह महामारी अज्ञात है, जाहिर है जब तमाम दावों के बीच दुनिया में कोई नहीं जानता कि कोविड-19 मैन मेड है या प्राकृतिक? तो इस पर लिखना बेमानी है। पर यदि यह इन दोनों में से ही कोई एक है तो फिर यह महामारी मनुष्य सभ्यता के लिए प्रकृति का अंतिम अलर्ट है। इंसानियत के वजूद पर कुदरत का सबसे बड़ा अल्टीमेटम। यह वक्त सांस-सांस के हिसाब-किताब का है। सांसो की ऐसी माला भला मनुष्य ने कब जपी होगी? जो हर जगह उपलब्ध है फिर भी प्राप्त नहीं, ऐसी भयावह आपदा अकल्पनीय है।
आइए प्रकृति और मनुष्य के संबंध को याद करें। यह एक प्रार्थना है इसे दोहराएं।
एक चिट्ठी मनुष्य के नाम
एक ऐसे समय में जबकि बीमारियां उपहार स्वरूप मिल रही हैं और मृत्यु संदेहास्पद बन गई है। प्रकृति और मनुष्य के बीच सहअस्तित्व का बंधन डगमगा गया है। स्वाभाविक स्थिरता के बीच कहीं एक तोड़फोड़ हुई है। मनुष्य की बौद्धिक चेतना प्रकृति के खिलाफ खड़ी नजर आ रही है। पृथ्वी पर जीवन के ज्ञात इतिहास में प्रकृति से मनुष्य का नाता क्रूर और पैशाचिक हुआ है। मनुष्य की विखंडित चेतना प्रकृति को पहचान ही नहीं रही है। सभ्यता की बिखरी और टूटी हुई जीवन प्रणाली, अस्वस्थता और बीमारियां फैला रही हैं, शारीरिक क्रम के भीतर तबाही मचा रही है। ऐसे में हमें पीढ़ियों के लिए सुंदर, सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य रचना होगा। यह वसुंधरा स्वस्थ होगी। यहां बीमारियां ना हों, घरों से ज्यादा अस्पताल ना हों, मास्क ना हो, पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर लादे घूमने वाला बचपन ना हो।
दूूूूूसरी चिट्ठी सभ्यता केे नाम
महामारियों से जूझती चली आ रही मनुष्य सभ्यता जितनी आधुनिक और वैज्ञानिक चेतना से ओतप्रोत आज है उतनी पहले कभी नहीं रही। क्षण में संचार, पल में प्रतिक्रिया और तत्काल परिणाम की तकनीक के बीच 21वी सदी के मुनष्य ने प्रकृति को अपने से सबसे ज्यादा दूर किया है। पहले पहाड़ों को फाड़कर मैदान, नदियों की छाती पर बांध, कैमिकल फैक्ट्रीज, कारखानों, उद्योगों से जहर निकालकर जलवायु परिवर्तन, असंतुलित निर्माण और कथित विकास से मनुष्य ने प्रकृति को चौंकाया और फिर आगे चलकर जीवनचक्र से उसे चुनौती दी। अब संकट इसका नहीं है कि कहां क्या तोड़फोड़ मचाकर निर्माण किया या किस नदी को खोदकर कंगुरे बनाए बल्कि यह जैविक चेतना में हस्तक्षेप का है।
दूर मत जाइए, दुनिया को यूट्यूब की विंडो से झांककर देखिए, असंख्य वीडियो मिल जाएंगे जो पूरी मनुष्य सभ्यता के लिए चेतावनी है।
जो नहीं खाना है वह खाया जा रहा ,
जानवरों, कीट पतंगों, सांपों पक्षियों को खाकर एक चक्र ध्वस्त किया जा रहा ,
जो नहीं पीना है खून, मूत्र, और वह सबकुछ जो जहर, पिया जा रहा,
जहां नहीं रहना,वहां रहा जा रहा,
भूख को मारकर, नींद को उड़ाकर,
रात को जागकर,
दिन में सोकर,
घंटों बैठकर,
दिनभर ऋतुओं के विरुद्ध,
मौसम के खिलाफ
हम प्रकृति के उन्हीं नियमों को तोड़ रहे हैं
जिसके बूते उसका अपना अस्तित्व कायम है.
याद रखिए हम सब प्रकृति के अपराधी हैं
हम सब बीमार पड़ते रहेंगे
यह सबकुछ प्रकृति के उलट है। नियमों के विरुद्ध। ध्यान रखिए प्रकृति नियमों में स्थित है और जीवन उसी में समाहित।
गांधी जी कहते थे- विश्व में एक नियमितता है। जो भी अस्तित्व में होता है उसके नियमन के लिए अपरिवर्तनशील नियम है। अन्धा नियम, किसी भी मनुष्य के व्यवहार को नियमित नहीं कर सकता।
यकीन मानिए आप प्रकृति को छेड़ेंगे तो वह आपको नहीं छोड़ेगी क्योंकि जिन नियमों से उसका अपना अस्तित्व है वह उसे तोड़ने तो क्या छूने भी नहीं देगी। पूछिए एक सवाल खुदसे खुद के लिए- "यह सबकुछ क्यों है और किसलिए है? प्रकृति को चुनौती किसलिए और कब तक? क्या केवल मृत्यु के चक्र से बाहर आने के लिए?" पृथ्वी पर सदा के लिए बने रहने के लिए? मृत्यु को जीतकर प्रकृति पर विजय के लिए? यह असंभव है और तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि प्रकृति में समाहित ना हुआ जाए।
गंभीर सवाल नेचर से इंट्रैक्शन का है। उस परिचय का है जो सहअस्तित्व का रहा। सोचिए जहां मेरे होने से आपके होने की कल्पना हो, अस्तित्व परस्पर निर्भरता से टिका हुआ हो वहां परिचय जैसा शब्द कितनी भयावह चेतावनी देता है, जिससे हम हैं उससे ही परिचय किसी भी जाति के लिए कितना घातक होगा? यह ऐसा हो कि जिस घर में रहा जाए उसी से अंजान रहकर उसे ही नष्ट करने की योजना बनाई जाए।
लाखों साल के ज्ञात इतिहास में इंसानियत को कुदरत से इतनी दूर भला किसने और कब देखा होगा? कल्पना भी नहीं की होगी? और जो थोड़ा बहुत भी नाता प्रकृति से बंधा है वह डोर कितनी कमजोर है, कितनी छिछली है उसकी बानगी बीमार मनुष्य और प्रदूषित पृथ्वी दे रही है। प्रकृति के संदर्भ में रिपोर्ट, रिसर्च, अध्ययन, खोजें, अनुसंधान तब तक बेकार है जब तक कि मनुष्य उसे अपने लिए नहीं मानता।
प्रकृति से हमारे नाते में खोट पैदा हुई है। दुनिया जानती है धोखे के संबंध दूर तक नहीं चलते।
शेष इतना ही कि..!
स्मृतियों में रहे
महामारियां आती हैं और चली जाती हैं
शेष केवल मृत्यु के शोक गीत और स्मृतियां साथ रहती हैं.
चिंता इस बात की नहीं कि
मनुष्य प्रकृति से दूर हो गया है
बल्कि इस बात की है
कि प्रकृति अब हमें नहीं पहचान रही...!
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।विज्ञापन