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जवाहरलाल नेहरू 132वीं जयंती विशेष: देश के पहले प्रधानमंत्री ने ही तैयार किया था आजाद भारत का पहला चुनावी घोषणा-पत्र

सार

कुल 30 बिंदुओं में कांग्रेस के इस पहले चुनावी घोषणा पत्र को तैयार किया गया था। शुरुआत गांधीजी से हुई, कैसे उनकी अगुवाई में देश को आजादी मिली और कैसे उनके नैतिक रास्तों पर चलकर ही देश तरक्की कर सकता है। ये अलग बात है कि नेहरूजी ने ‘रामराज्य’ जैसे शब्द से परहेज ही किया। दूसरे और तीसरे बिंदु में रोटी, कपड़ा और ‘शेल्टर’ की बात की गई, मकान या होम शब्द का उल्लेख नहीं था। 
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पंडित जवाहरलाल नेहरू जन्मदिवस विशेष - फोटो : iStock
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विस्तार
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अंतरिम सरकार के मनोनीत प्रधानमंत्री से लेकर पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर साल 1947 से 1951 का समय नेहरूजी की जिंदगी में काफी बदलाव लेकर आया। कहां उनको पीएम बनने के लिए अध्यक्ष बनने तक में मुश्किलें थीं, कहां कांग्रेस अध्यक्ष पर उनके समर्थित उम्मीदवार भी हार जाते थे, कहां उनके चाहने पर भी हैदराबाद या सोमनाथ में किसी और की मर्जी चलती थी और कहां वो पहले आम चुनाव तक आते आते देश, सरकार और पार्टी के निर्विवाद मुखिया के तौर पर उभर चुके थे।

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दरअसल, वजह थी उनकी किस्मत! गांधीजी, सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे दिग्गज नेता दुनिया छोड़ चुके थे। पटेल के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पुरुषोत्तम टंडन ने भी इस्तीफा दे दिया था और नेहरूजी अध्यक्ष बनकर पार्टी भी संभालने लगे थे।

पहले चुनाव के लिए पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र (मेनीफेस्टो) भी नेहरू जी ने ही तैयार किया था। पहली बार न केवल लोकसभा के बल्कि सभी विधानसभाओं के चुनाव भी साथ ही होने थे। नेहरूजी ने जो मेनीफेस्टो तैयार किया था, उसको बेगलुरु कांग्रेस के सत्र में 13 जुलाई 1951 को रखा गया, अगले दिन इसे स्वीकार कर लिया गया। 
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16 अक्टूबर को दिल्ली एआईसीसी की मींटिग में इसे मंजूर किया गया, फिर बाकायदा अखबारों में छापा भी गया। उनके मुकाबले में थे जयप्रकाश नारायण जेपी, आचार्य नरेन्द्र देव आदि की सोशलिस्ट पार्टी, सीपीआई, किसान मजदूर पार्टी और जनसंघ।
 

3.29 फीसदी वोट लेकर सीपीआई ने 16 सीटें जीती जबकि इससे थोड़े कम वोट लाकर जनसंघ केवल 3 सीटें ला पाया। रामराज्य परिषद को भी 3 सीटें मिलीं, 10.59 फीसदी वोट लाकर सोशलिस्ट पार्टी के हिस्से बस 12 सीट आई, जबकि उसके चार गुने से भी कम यानी 44.99 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस तीस गुना यानी 364 सीटें लाई। 

 

क्या था कांग्रेस के पहले चुनाव घोषणा-पत्र में

कुल 30 बिंदुओं में कांग्रेस के इस पहले चुनावी घोषणा पत्र को तैयार किया गया था। शुरुआत गांधीजी से हुई, कैसे उनकी अगुवाई में देश को आजादी मिली और कैसे उनके नैतिक रास्तों पर चलकर ही देश तरक्की कर सकता है। ये अलग बात है कि नेहरूजी ने ‘रामराज्य’ जैसे शब्द से परहेज ही किया। दूसरे और तीसरे बिंदु में रोटी, कपड़ा और ‘शेल्टर’ की बात की गई, मकान या होम शब्द का उल्लेख नहीं था। 

ये लिखा गया कि गुलामी, विश्व युद्धों, और विभाजन की त्रासदी झेलकर आई जनता को अब आर्थिक आजादी की जरूरत है। पाकिस्तान से कड़वे रिश्तों का उल्लेख किया, साथ ही सिविल और मिलिट्री सर्विसेज को फिर से संगठित करने की जरूरत बताई और ये भी कि उसमें से विदेशी तत्व कम करके देसी जोड़ने हैं।

  • चौथे बिंदु में धर्मनिरपेक्षता, कॉपरेटिव कॉमनवेल्थ, स्वतंत्र विदेश नीति और विश्व शांति की बात की गई। 

  • पांचवे बिंदु में ना केवल योजना आयोग के जरिए पूरे देश के विकास के लिए योजनाएं बनाने, बल्कि जमींदारी, जागीरदारी व्यवस्था को खत्म करने की बात भी की गई। 

  • छठे बिंदु में एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन बढ़ाने और कॉपरेटिव फार्मिंग को बढ़ावा देने की बात की गई।

    सातवें बिंदु में खेतिहर मजदूरों की हालत पर चिंता जताई गई। उनको नए इलाकों में जमीनें आवंटित करने व हाउसिंग साइट्स पर ज्यादा सुविधाएं देने को कहा गया।

  • आठवें बिंदु में नेहरूजी ने दुधारू और वजन ढोने वाले पशुओं को संरक्षित रखने की जरूरत बताई।

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नेहरू जी ने तैयार किया था पहला घोषणापत्र - फोटो : Twitter

भारत के समग्र विकास का खांका

नवें बिंदु में छोटे और लघु उद्योगों को कैसे सरकार को बढ़ावा देना चाहिए, इसके लिए रिसर्च की बात की, हैडलूम इंडस्ट्री को कैसे धागा मिले इसकी बात की गई। दसवें बिंदु में नेहरूजी ने ये साफ कर दिया कि उद्योगों के मामले में अहस्तक्षेप की नीति नहीं अपनाई जा सकती। कई देशों में इसे पूरी तरह खारिज कर दिया है, लिखा कि ये वर्तमान में भारत के लिए बिलकुल अनुपयुक्त है, साथ ही ये भी साफ कर दिया कि कांग्रेस की बरसों पुरानी नीति रही है कि आधारभूत उद्योग राज्य के अपने और राज्य द्वारा ही संचालित हों।

मेनीफेस्टो में साफ कर दिया गया था कि अर्थव्यवस्था निजी और सरकारी, दोनों तरह की मिश्रित होगी। ग्यारह और बारहें बिदुओं में महंगाई और उस पर नियंत्रण को लेकर नीति स्पष्ट की गई। 13वें बिंदु में साइंटिफिक रिसर्च, खेती और बिजली के लिए नदी घाटियों को प्राथमिकता और आधारभूत उद्योगों पर जोर देने की बात की गई।

14वें, 15वें और 16वें बिंदुओं में आर्थिक असमानता दूर करने, ब्लैक मार्केटिंग पर लगाम लगाने, असामाजिक गतिविधियों, आर्थिक घपलों को रोकने, भारतीयों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की बात तो की गई। सरकार के लिए कहा गया कि उसको मजदूरों के लिए हाउसिंग भी बढ़ानी चाहिए। 17वें बिंदु में रेलवे की सुविधाओं की बढ़ाने की बात की गई तो 18वें में प्रदेशों की ट्रांसपोर्ट सर्विस के राष्ट्रीयकरण की बात की गई।

नई शिक्षा निति पर तब भी था जोर
19वें बिंदु में भर्तियों की बात की गई और कहा गया कि भर्तियों में उच्चतम नैतिकता बरती जानी चाहिए, साथ ही लिखा कि जहां जरूरत हो उचित ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

20वें बिंदु में समाज में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की बात की गई। 21वें बिंदु में शिक्षा और स्वास्थ्य की चर्चा की गई और डिग्री मैन्युल वर्क अनुभव के बाद देने पर ही जोर दिया गया। आपको मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति यहां नजर आएगी।

22वें बिंदु में महामारियों पर नियंत्रण की बात हुई और केवल मलेरिया पर नियंत्रण का जिक्र हुआ। 23वें बिंदु में गांधीजी का जिक्र करके एससी, एसटी और पिछड़ा वर्ग के उत्थान की बात की गई। 24 वें बिंदु में उस वक्त के राज्यों के वर्गीकरण ए, बी, सी में सभी में कानूनी व्यवस्था एक जैसी करने को लेकर जिक्र किया गया।

25वें बिदु में पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों पर चिंता जताई गई और उनके पुनर्वास की बात की गई, ये कहा गया कि इस साल इन पर सरकार 140 करोड़ रुपया खर्च करेगी।


महिला और आर्थिक सुधार को किया रेखांकित

26वें बिंदु में ये कहा गया कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए सबको बराबर अधिकार हैं। 27वें बिंदु में भारत में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए कदम उठाने को कहा गया। 28वें बिंदु में भाषाई आधार पर नए राज्यों के गठन और आयोग बनाने की बात की गई।

29वें बिंदु में ही स्वतंत्र विदेश नीति की बात करना और उसी में कश्मीर मसले का समाधान कश्मीरियों की राय के मुताबिक ही करने का ऐलान करना, थोड़ा अजीब था। आखिरी बिंदु में दुनिया भर में होने वाले संकटों से भारत को बचाने के लिए भारत की भूमिका शांतिपूर्ण दिशा में रखने को कहा गया.

इसको पढ़कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे शरणार्थी, खाद्यान्न समस्या, मलेरिया, हस्तक्षेप की नीति, पशु संरक्षण, जमींदारी व्यवस्था आदि की जिक्र कमोवेश चुनावी घोषणा-पत्रों से खत्म सा हो चला है। गौर से इसको पूरा पढ़ेंगे तो पाएंगे कि ये लुभावने वायदों के बजाय आजकल प्रचलित संकल्प पत्र और शपथ पत्र जैसा नजर आता है, क्योंकि उनको ये बखूबी पता था कि कांग्रेस के मुकाबले कोई नहीं है।

 

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