सत्ता लोलुपता का जीता-जागता उदाहरण
कल तक नीतीश कुमार में दुनिया का हर दुर्गुण देखने वाली, उन्हें बीमार और मानसिक रोगी बतानेवाली भाजपा को भी यह बताना चाहिए कि रातोरात नीतीश जी में उन्हें क्या सुधार दिखा की पुनः उनके आज्ञाकारी सहयोगी बन गए हैं? यह कैसी पॉलिटिक्स है?
जहानाबाद के उस कार्यकर्ता की आत्मा को भाजपा नेता क्या मुंह दिखाएंगे जिसकी मौत पटना में भाजपा के प्रदर्शन में पुलिस की पिटाई से हुई थी? उस लाठी चार्ज को जदयू और राजद जायज ठहरा रहे थे। भाजपा अब किस मुंह से उसकी आलोचना करेगी? भाजपा नेता कार्यकर्ताओं को अपना मुख्यमंत्री और अपनी सरकार का जो सपना दिखाते आ रहे थे, उस सपने का क्या होगा?
क्या यह माना जाए की कार्यकर्ताओं को गुमराह किया जा रहा था? सत्ता लोलुपता के सन्दर्भ में भाजपा, जदयू या राजद में कोई अंतर दिखता है क्या ?
पाला बदल कर नीतीश कुमार 9वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। सर्वाधिक लम्बे काल तक बिहार का मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड नीतीश कुमार के नाम जरूर दर्ज हो गया है। लेकिन इस बाजीगरी से बिहार की प्रतिष्ठा गिरी है। नेताओं की विश्वसनीयता पेंदे में चली गई है। ऐसी पलटीमार राजनीति से बिहार का कोई भला होनेवाला नहीं है।
सबसे बड़ा संकट भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के सामने आ खड़ा हुआ है। भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने केसरिया पगड़ी बांधनी शुरू कर दी थी। उन्होंने कहा था कि यह पगड़ी नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने के बाद ही खोलेंगे। नीतीश ने ऐसी कलाबाजी दिखाई कि सम्राट ने जिसको हटाने का संकल्प लेकर पगड़ी बंधी थी उसी के नेतृत्व में वे उप-मुख्यमंत्री बन गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा कोर टीम की बैठक में उन्होंने अपनी पीड़ा खुलकर रखी। उन्होंने पूछा की अब वे क्या करेंगे ? बताते हैं की वे इस समझौते के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उन्हें पार्टी के फैसले को मानना पड़ा।
नीतीश के पास बंद दरवाजे की चाभी
भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्णिया की जनसभा में घोषणा की थी कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे सदा के लिए बंद हो गए हैं। यह बात उन्होंने तीन बार दोहराई थी। लेकिन नीतीश तो बाजीगर हैं। उनके पास हर दरवाजे की चाभी रहती है। जब चाहते हैं अपनी सुविधानुसार दरवाजे खोल लेते हैं। उनके लिए कभी कोई दरवाजा बंद नहीं होता। अमित शाह को बिहार की जनता को बताना चाहिए कि ऐसा क्या हो गया की नीतीश के लिए सदा के लिए बंद दरवाजा खोलना पड़ा ? अब कौन उनकी बात पर भरोसा करेगा?
नीतीश पत्रकारों से बारबार कहा करते थे कि- आप पर दिल्लीवालों का कब्जा है। आप वही दिखाएंगे और लिखेंगे जो आपको दिल्ली वाला कहेगा। अब वे खुद उसी दिल्लीवाले के कब्जे में चले गए। अब उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी यह देखना दिलचस्प होगा। एनडीए के सहयोगी दल रालोसपा और लोजपा (रामविलास) भी भाजपा के इस फैसले से हतप्रभ हैं। नाखुश हैं। उन्हें मनाने में भाजपा को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
यह कहने में कोई गुरेज नहीं की नीतीश कुमार राजनीति के वे दूल्हे हैं जिनकी पालकी उठाने के लिए हर पार्टी तैयार रहती है। वे बिहार की अवसरवादी राजनीति के चैंपियन बन चुके हैं।
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