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लालटेन की लौ तेज, 'चिराग' बुझकर भी कर गया भाजपा को रोशन, भाजपा अब बड़ा भाई

Wed, 11 Nov 2020 12:23 AM IST
हरि वर्मा हरि वर्मा
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Bihar Election Result 2020 - फोटो : अमर उजाला
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बिहार के चुनावी नतीजे नहीं बल्कि एग्जिट पोल के रुझान चौंकाने वाले रहें। ऐसा पहली बार नहीं, जब वहां के लिए अधिकांश एग्जिट पोल गलत साबित हुए। पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। इस बार एग्जिट पोल के रुझान में लालटेन की लौ जितनी तेज दिखी, नतीजे और शुरुआती रुझान में स्थिति उसके उलट दिखी। उलटफेर का दौर रात तक चला। दोपहर तक एनडीए को बढ़त और शाम के बाद लालटेन की लौ। आखिर में जनादेश और रूझान ने फिर विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक पंडितों के आकलन को फेल कर दिया। रग-रग, पग-पग पर राजनीति की जमीन में पलने-बढ़ने वाले बिहार के मतदाताओं का मिजाज भापना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन। इस नतीजे की कई वजहें रहीं। यह चुनाव रोजगार, प्रवासी मजदूर, निर्णायक युवा व महिला मतदाता, नीतीश से नाराजगी, जंगलराज बनाम सुशासन, 15 साल बनाम 15 साल और विकास के मुद्दे पर लड़ा गया। चुनावी मुद्दों की खिचड़ी में भीतर ही भीतर जात-पात, ध्रुवीकरण, कश्मीर-गलवां का छौंका भी लगा।

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तेजस्वी की हवा बहुमत के करीब ठिठकी
जनसभाओं में उमड़ी भीड़ और माहौल से शुरुआती संकेत मिले कि इस बार तेजस्वी की लहर है। ईवीएम तक पहुंचते-पहुंचते यह लहर बहुमत के करीब पहुंच कर हवा हो गई। नतीजे में आखिरकार बहुमत के करीब पहुंच कर महागठबंधन ठिठक गया। आंकड़ों के गणित का जोड़-घटाव करने वालों का मानना था कि राज्य में युवा मतदाता पचास फीसदी के करीब हैं और वह 10 लाख रोजगार के मुद्दे पर एकमुश्त लालटेन के पक्ष में ईवीएम का बटन दबाने वाले हैं। लगा भी ऐसा ही कि इस बार बेरोजगार युवा तेजस्वी पर लट्टू हैं। वैसे, पहली बार के मतदाता हर विधानसभा सीट पर कम हैं। कुल मतदाताओं की तुलना में पचास फीसदी युवा मतदाताओं के जो आंकड़े हैं उनमें 30-40 साल वाले मतदाता भी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से इन युवा मतदाताओं पर नरेंद्र मोदी का जादू बरकरार है। ऐसे युवा मतदाताओं को तेजस्वी बनाम मोदी में से एक को चुनना था। इन निर्णायक युवा मतदाताओं के मन पर मोदी के यूपी की जोड़ी (राहुल-अखिलेश) से जोड़कर डबल-डबल युवराज (राहुल-तेजस्वी) वाले बयान ने खासा प्रभाव डाला। युवा मतदाताओं का मन-मिजाज बदलने के लिए यह टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। यह कारण भी रहा कि एकतरफा तेजस्वी के पक्ष में युवा समर्थन का माहौल थोड़ा धीमा पड़ा।  

प्रवासी मजदूरों की नाराजगी ईवीएम तक नहीं
संक्रमण काल में हुए इस सबसे बड़े चुनाव में सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूरों के मुद्दे ने तूल पकड़ा। चुनाव तारीख की घोषणा भी नहीं हुई थी कि मुंबई में का बा... से लेकर बिहार में का बा... के गीत बजने लगे। आनंद विहार और बाहरी राज्यों से पैदल कट-मरकर घर तक जैसे-तैसे पहुंचने वाले प्रवासी मजदूरों के बारे में चुनावी गलियारे में यही राग छिड़ा कि इस बार नीतीश से जबरदस्त नाराजगी है। विपक्ष का आकलन था कि प्रवासी मजदूर एकतरफा नीतीश के खिलाफ वोट करने जा रहे हैं। हकीकत में नीतीश के प्रति नाराजगी भी थी। हालांकि, बड़े उलट-पलट वाले बिहार से तब तक उलटी गंगा बह चुकी थी। विपक्ष और राजनीतिक पंडित इस उलटी गंगा को नहीं समझ सके। जब दशहरे-दिवाली और छठ में बाहरी राज्यों से घर वापसी (बिहार लौटने वालों) का कारवां होता, तो अप्रैल-मई में गांव- घर तक जैसे-तैसे पहुंचने वाले ज्यादातर प्रवासी रोटी-रोजगार के लिए फिर से महानगरों को लौट चुके थे या लौट रहे थे। चुनाव के एक पखवाड़े पहले तक वहां की जमीनी स्थिति यही थी। त्योहारी स्पेशल ट्रेनों और बसों में लद-लदकर मजदूर सिर्फ इसलिए बिहार से महानगर काम पर वापस लौट गए थे कि उन्हें गांव में भी आर्थिक संकट झेलना पड़ रहा था। महानगरों से प्रवासियों को पहले से ज्यादा मजदूरी पर काम वापसी का ऑफर भी था। घर वापसी वाले मजदूर, काम वापसी (महानगर-फैक्टरियों) कर चुके थे। सो, जिनकी नाराजगी थी, वह प्रवासी मजदूर ईवीएम का बटन दबाने के लिए बूथों तक पहुंचे ही नहीं। जिन्हें लगा कि संक्रमण के दौरान गरीब-गुरबा को राशन आदि के लाले पड़ गए, यह भी सौ फीसदी जमीनी सच नहीं था। संक्रमण के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से जूझे और नाराज लोगों को भी मुफ्त कोरोना वैक्सीन के वादे का ऐसा टीका लगा कि उनके जख्म भर गए। प्रवासी मजदूरों की नाराजगी वाला जोड़घटाव और मुफ्त कोरोना वैक्सीन का वादा विपक्ष के पल्ले नहीं पड़ा। तेजस्वी ने मुफ्त पढ़ाई, दवाई, कमाई का वही राग अलाप दिया, जिसका मोदी न केवल लोकसभा बल्कि हाल के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में टेप चला चुके थे। तेजस्वी भवः पर आयुष्मान भवः भारी पड़ा।
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चाणक्य नीति व नीतीश का मास्टर स्ट्रोक
सबका साथ, सबका विकास वाले एनडीए में चुनाव के ऐन मौके पर भले बिहार में लोजपा ने अलग राह पकड़ ली लेकिन सभी को इतना तो लग ही गया था कि वह भाजपा की ही बी टीम है। भाजपा को मदद पहुंचा रही है। विपक्ष और राजनीतिक पंडितों का नजरिया यह था कि चिराग पासवान जदयू और खासतौर से नीतीश का तीर निशाने पर नहीं बैठने दे रहे हैं। खेल बिगाड़ रहे हैं। अंदर की बात यह है कि राजनीति में जो दिखता, वह होता नहीं। जब लोजपा व चिराग पर मोदी और शाह तक ने चुप्पी साध ली, तो भी यह साफ हो गया था कि वह भाजपा के इशारे पर खेल बना रहे हैं। नीतीश ने भी शुरुआती तल्खी के बाद चिराग को घर का बच्चा बताकर नो कमेंट्स की मुद्रा अख्तियार कर ली। दरअसल, इस चुनाव में नीतीश के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी। चिराग के खेल की अंतर्कथा कुछ यूं। जब चिराग ने कहा, वह राम (मोदी) के हनुमान हैं और नीतीश के खिलाफ, तो खास वोट बैंक की नीतीश के प्रति हमदर्दी बढ़ी। हमदर्दी दिखाने वाले ये खास मतदाता नीतीश (जदयू) के सोशल इंजीनियरिंग व जातीय समीकरण के साथ-साथ कामकाज की बदौलत उनके हिमायती थे। लोजपा को दो सीटें थी। जैसे-तैसे खाता खुला, वह भी भाजपा के बागी राजेंद्र सिंह से। चिराग बुझकर भी एनडीए में भाजपा को रोशन कर गए। हनुमान की संजीवनी से एंटी इनकम्बैसी से मूर्छित लक्ष्मण (नीतीश) को तो ऑक्सीजन मिला ही, साथ ही नीतीश के एंटी इनकम्बैसी को राम (भाजपा) के पक्ष में ला कर उसे बड़ा भाई भी बना दिया। इस खेल और रणनीति के सूत्रधार चाणक्य थे। जाहिर है चाणक्य ने कहा भी था कि चुनाव बाद चिराग का भविष्य तय होगा, अब इंतजार कीजिए उन्हें केंद्र में इनाम (मंत्री पद) मिल सकता है। अंतिम दौर में आखिरी चुनाव वाला एलान नीतीश का मास्टर स्ट्रोक था। नीतीश की एंटी इनकम्बैसी हमदर्दी में तब्दील हो गई। नीतीश मैदान में पिछड़कर बड़े भाई से छोटा भाई जरूर हो गए और 20 साल बाद वहां भाजपा बड़ा भाई हो गई लेकिन नीतीश होम ग्राउंड पर चौका लगा चुके हैं। यानी चौथी बार भी नीतीशे सरकार। नए- नए बने बड़े भाई (भाजपा) के लिए उनकी अनदेखी आसान नहीं, बंगाल बगल में है।

जंगलराज बनाम सुशासन
जंगलराज बनाम सुशासन और 15 साल बनाम 15 साल की इस लड़ाई के नतीजे की राह खुद राजद ने ही तैयार कर दी। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार यूं तो अधिकांश दलों और गठबंधन ने दागियों या दागियों के परिजनों को टिकट दिया लेकिन राजद इसमें न केवल सबसे आगे रहा बल्कि अनंत ताकत झोंकने में वैसे चेहरों को भी मैदान में उतार दिया जो जंगलराज में खौफनाक रहे। मुजफ्फरपुर आश्रय गृह कांड व मंजू वर्मा की उम्मीदवारी को विपक्ष इसलिए मुद्दा नहीं बना सका क्योंकि दुष्कर्म के आरोपियों की पत्नी को टिकट देकर वह हमले करने की स्थिति में नहीं था। नीतीश राज में भले आपराधिक घटनाएं नहीं थमीं, लेकिन जिन्होंने जंगलराज का दौर देखा, उन्हें लकड़सुंघवा के मंत्र से सांप सूंघ गया। जंगलराज के मुद्दे से बचने के लिए ही तेजस्वी ने लालू-राबड़ी की छाया से परहेज किया। इसका उलटा असर हुआ। लालू की कमी और सहानुभूति के अभाव ने तेजस्वी के विजय रथ को अंतिम मुकाम तक पहुंचने से पहले पंक्चर कर दिया। लालू बाहर होते तो मुकाबला दिलचस्प होता। लालू की कमी को देखते हुए नीतीश का अनुभवी बनाम नौसिखिया वाला जुमला भी काम आया। राजद में दिग्गज नेताओं के परिजनों को टिकट तो मिल गया लेकिन ये दिग्गज सिर्फ अपने बाल-बच्चों के लिए मैदान में जुटे रहें। लालू की अनुपस्थिति और रघुवंश बाबू की कमी के चलते तेजस्वी को राजद के दिग्गज नेताओं का साथ नहीं मिला। अनुभवी मार्गदर्शन नहीं मिला और नौसिखिया साबित हुए। महागठबंधन में साथ मिला तो राहुल का जो खुद अपनी पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई बिहार, यूपी और देश में लड़ रहे हैं। बिहार में कांग्रेस अपना पिछला प्रदर्शन भी नहीं दोहरा नहीं पाई। पिछली बार 42 सीटों पर लड़कर 27 जीतने वाली कांग्रेस इस बार 70 सीटों पर लड़कर भी कम सीटें पाकर महागठबंधन के लिए कमजोर कड़ी साबित हुई।  

15 साल बनाम 15 साल
नौकरीपेशा, कारोबारी और पेशेवर (डॉक्टर-इंजीनियर) मतदाता भी ईवीएम में लालटेन का बटन दबाने से पहले उन दिनों को याद कर खौफजदा दिखें। लालू राज में नौकरीपेशा और पेंशनधारियों को वेतन-पेंशन तक के लाले पड़ गए थे, नीतीश राज में वेतन आदि मिलना पटरी पर लौटा। बुजुर्ग मतदाताओं का लद-लदकर बूथ तक पहुंचना जंगलराज के मुकाबले मंगलराज पर मुहर लगा रहा था। सुशासन व विकास के नाम पर ईवीएम का बटन दबा क्योंकि डबल इंजन की सरकार से मतदाताओं में विकास की उम्मीद जागी। चुनाव से पहले ताबड़तोड़ विकास योजनाओं के उद्घाटन-शिलान्यास से भी मोदी ने यह दर्शाने की कोशिश की, मोदी हैं तो बिहार का विकास मुमकिन है। उन्होंने नीतीश के 15 साल के कार्यकाल के विकास को गिनाने की बजाए यह भी साफ संदेश दिया कि अब तक नीतीश  विकास के लिए लड़ते रहें और अब बिहार आत्मनिर्भर होगा।

महिला मतदाता निर्णायक
इस बार सत्ता की चाबी युवा और महिला मतदाताओं के पास ही रही। अंकगणित के मुताबिक, महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले खूब मतदान किया। 2020 में पुरुष मतदाताओं ने 54.7 फीसदी मतदान किया। उनसे करीब पांच फीसदी अधिक महिला मतदाताओं ने 59.69 फीसदी मतदान किया। पिछली बार भी करीब पांच फीसदी का ही अंतर था। इस अंकगणित का रसायन अल्कोहल और उज्जवला योजना से जुड़ा। रसायन यह है कि पिछली बार महिलाओं ने ज्यादा मतदान कर शराबबंदी के फैसले पर मुहर लगाई थी। लोकसभा चुनाव में उज्जवला गैस और शौचालय निर्माण योजना से महिलाओं में मोदी के प्रति दीवानगी दिखी। सो अल्कोहल और एलपीजी की केमिस्ट्री नीतीश-मोदी के लिए मददगार रही। इस बार 11 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं, जहां महिलाओं ने 70 फीसदी से अधिक मतदान किया है। 141 विधानसभा सीटों पर महिलाओं ने 60 फीसदी तक मतदान का रिकार्ड बनाया। इसके ठीक उलट 243 सीटों में एक भी विधानसभा सीट ऐसी नहीं, जहां अकेले पुरुष मतदाताओं ने 60 फीसदी से अधिक मतदान किया। केवल 37 विधानसभा क्षेत्रों में पुरूष मतदाताओं ने 60 फीसदी तक मतदान किया। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि संक्रमण और बाढ़ के बीच पिछले चुनाव में 56.6 फीसदी के मुकाबले इस बार 57.5 फीसदी कुल मतदान हुआ। लगभग एक-डेढ़ फीसदी कुल मतदान की बढ़त 2005, 2010 और 2015 में भी रही। मतदाता इसी अनुपात में बढ़े भी। पहले आशंका जताई जा रही थी कि संक्रमण और बाढ़ के चलते इस बार मतदान घटेगा। मतदान में यदि पांच फीसदी तक की गिरावट या वृद्धि होती तो यह सत्तारुढ़ गठजोड़ के लिए खिलाफ होता। इस बार मतदान फीसदी न गिरा और न उस अनुपात में ज्यादा बढ़ा। बेटियों के बीच साइकिल-स्कूटी, वजीफे योजनाओं के चलते भी नीतीश पसंदीदा रहे। ये बिटिया मतदाता भी युवा ही रहीं, जिन्हें नजरअंदाज करना विपक्ष की भूल रही।

जात-धर्म और ध्रुवीकरण का तड़का
रोजगार से लेकर पलायन, बाढ़ व कई स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ कश्मीर, पाकिस्तान, गलवां, सीएए पर लड़ी गई  इस लड़ाई में आखिरकार जात-पात-धर्म (ध्रुवीकरण) प्रभावी रहा। इस बार अधिकांश ने महिलाओं के बाद अगड़ों पर दांव खेला। भूरा बाल, बाबू साहेब के सामने सीना तान, रघुवंश बाबू के निधन के बीच अगड़े एकजुट दिखें, वहीं ओबीसी, दलित, महादलित, मुस्लिम और यादव मतदाताओं को बांटने में ज्यादातर वोटकटबा मोर्चा-दलों की सक्रियता का असर पड़ा। अगड़ों को भाजपा ने थामा, पिछड़ों पर जदयू की पकड़ पूरी तरह से ढीली नहीं पड़ी। उधर, महागठबंधन की राह में ओवैसी और पप्पू यादव ने मुश्किलें खड़ी कर राजद के माई समीकरण में मामूली सेंध लगा दी। महादलितों-अति पिछड़ों के वोटों में रालोसपा-बसपा गठबंधन ने तो बागियों ने जातीय समीकरण में बिखराव पैदा कर दिया। पीएम नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ फिर से स्टार प्रचारक साबित हुए। दोनों ने जिन-जिन क्षेत्रों के लिए प्रचार किया, वहां भाजपा-एनडीए की बांछें खिल गईं। संक्रमण काल में हुआ बिहार का यह चुनाव सही मायने में काफी दिलचस्प रहा। लोकतंत्र के जज्बे को सलाम। अब विजेताओं और मतदाताओं की दिवाली, करो छठ की तैयारी...। आगे बंगाल की बारी।

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