बिहार चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि अब भी नरेंद्र मोदी की छत्रछाया ही जीत की सबसे बड़ी गारंटी है
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- तेजस्वी चुनाव हार कर भी जीत गए
बिहार चुनाव के रोमांच पर गौर करें तो राजद के तेजस्वी यादव चुनाव हार कर भी जीत गए हैं। सबसे कम उम्र का यह नौजवान बिहार की राजनीति के फलक पर नए नेता के रूप में उभर चुका है। सबसे बड़े दल के नेता के रूप में उभरने के साथ ही उनके पास सबसे बड़ा जनादेश है। उनके पास सबसे अधिक 76 विधायकों का समर्थन होने के साथ ही सर्वाधिक 23.11 प्रतिशत मत प्रतिशत का जनादेश भी है जबकि भाजपा को 19.32 प्रतिशत और जदयू को 15.42 ही मत प्रतिशत हासिल हुआ है।
इस चुनाव में भाजपा का मतप्रतिशत भी घटा है। तेजस्वी के लिए इस चुनाव में कांग्रेस सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई। अगर कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती और कुछ और सीटें हासिल कर पाती तो चुनाव के नतीजे कुछ और ही होते। वैसे भी देखा जाए तो कांग्रेस ने इस चुनाव को तेजस्वी के भरोसे छोड़ दिया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अत्यंत व्यस्त शेड्यूल में से 12 चुनाव रैलियों के लिए समय निकाला जबकि सोनिया गांधी बिहार गई ही नहीं और राहुल गांधी केवल 8 रैलियां ही कर सके। जबकि तेजस्वी ने अपनी कुल 247 रैलियों में से 47 रैलियां कांग्रेस प्रत्याशियों और 8 रैलियां वामदलों के प्रत्याशियों के समर्थन में कीं। जाहिर है कि तेजस्वी इस चुनाव में कांग्रेस का बोझा भी ढो रहे थे।
- अगले साल भाजपा के काम आएंगे ये चुनाव नतीजे
अगले साल अप्रैल या मई में असम, पश्चिम बंगाल, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडू की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। इनमें से असम में भाजपा की सरकार चल रही है जिसे विपक्ष से बचाना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि एनआरसी के बाद वहां हालात बदले हुए हैं। लेकिन इससे भी कहीं बड़ा लक्ष्य भाजपा के सामने पश्चिम बंगाल का है जिसे ममता बनर्जी से छीनने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झौंकी हुई हैं।
चूंकि पश्चिम बंगाल भौगोलिक रूप से बिहार से जुड़ा हुआ है इसलिए बिहार के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव पश्चिम बंगाल पर भी पड़ सकता है। इन विधानसभा चुनावों में बिहार से मिली ऊर्जा भाजपा के काम आएगी जबकि विपक्ष को अपना मनोबल उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।
बिहार चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि अब भी नरेंद्र मोदी की छत्रछाया ही जीत की सबसे बड़ी गारंटी है। इसलिए शिवसेना के बाद अकाली दल की किनाराकसी से एनडीए में जो बिखराव शुरू हुआ वह फिलहाल रुक जाएगा और बहुत संभव है कि अकाली दल और पासवान की लोजपा वापस एनडीए के फोल्ड में लौट जाएं।
- ओपिनियन और एक्जिट पोल की पोल खुली
बिहार चुनाव ने मीडिया और खासकर ओपीनियन पोल और एक्जिट पोल कराने वालों की पोल भी खुल गई है। उनकी विश्वसनीयता का भट्टा बैठ गया है। मतदान से पहले ओपिनियन पोल वाली ज्यादातर ऐजेंसियां एनडीए की एकतरफा जीत की भविष्यवाणियां कर रहीं थीं तो मतगणना से पहले एक्जिट पोल वाले तेजस्वी की एकतरफा जीत बता रहे थे। चिंता का विषय यह कि इस गोरखधंधे में कुछ मीडिया ग्रुप भी शामिल थे जिन्होंने मीडिया की विश्वसनीयता को एक बार फिर कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया।
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