एक्जिट पोल पर चुनाव आयोग जारी करे स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2007 इसका एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है। लगभग सभी एक्जिट पोल गठबंधन सरकार या त्रिशंकु विधानसभा का दावा कर रहे थे। लेकिन परिणाम में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। एक्जिट पोल सामाजिक गठबंधनों, स्थानीय नेतृत्व की पकड़ और जातीय पुनर्संरचना की समझ हासिल नहीं कर पाए।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी स्थिति दोहराई गई। कई प्रतिष्ठित एजेंसियों ने एनडीए को दो-तिहाई बहुमत के समीप दिखाया, जबकि वास्तविक परिणाम काफी भिन्न रहे। यह दर्शाता है कि सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन, मतदाता की मनोवैज्ञानिक प्राथमिकताएँ और स्थानीय मुद्दों की गतिशीलता को समझना मात्र संख्यात्मक सैंपलिंग से संभव नहीं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि एक्जिट पोल तभी विश्वसनीय हो सकता है, जब वह पारदर्शी, पद्धतिगत और क्षेत्रीय-सामाजिक संवेदनशीलता पर आधारित हो। इसलिए यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग एक अनिवार्य स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल जारी करे, जिसके तहत कोई भी एक्ज़िट पोल रॉ डेटा और शोध पद्धति के बिना सार्वजनिक न किया जा सके।
एक्जिट पोल को चुनावी तुक्का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध प्रक्रिया के रूप में मान्यता दी जाए
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चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि हर सर्वे एजेंसी निम्नलिखित विवरण आयोग के समक्ष जमा करे:
1. सैंपल साइज और उसका जिले, विधानसभा और सामाजिक वर्गों में अनुपातिक वितरण।
2. सैंपलिंग पद्धति और उसका चयन-तर्क।
3. प्रश्नावली (मॉड्यूल) की भाषा, संरचना और तटस्थता।
4. सर्वेक्षण टीम की योग्यता और प्रशिक्षण प्रक्रिया।
5. डेटा प्रोसेसिंग, वेटिंग, मार्जिन ऑफ एरर और कॉन्फिडेंस लेवल के मानक।
बिना इन जानकारियों के कोई भी एक्ज़िट पोल केवल अनुमान और प्रचार का उपकरण बन सकता है। बिहार जैसे सामाजिक-राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में, जहां जातीय, भौगोलिक, भाषाई, वर्गीय और वैचारिक परतें एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं, सतही सर्वेक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना न शोध है और न ही पत्रकारिता।
अतः यह समय है जब एक्जिट पोल को चुनावी तुक्का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध प्रक्रिया के रूप में मान्यता दी जाए। लोकतंत्र की विश्वसनीयता तथ्य, पारदर्शिता और प्रमाणिकता पर टिकी होती है और इसके लिए चुनाव आयोग का स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल अब अनिवार्य कदम है।
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