महिलाओं और पुरुषों के बीच विवाद में जरूरी नहीं कि हर बार पुरुषों की गलती होगी।
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मुझे याद है बचपन में करीब 10-11 साल की उम्र में हम दोस्तों के ग्रुप में एक जोड़ा जुड़वां भाई-बहन का था। अक्सर बहन सबके सामने भाई को मार-पीट लेती थी और बहुत बदतमीजी से पेश आती थी।
एक दिन उसने फिर वही किया और उस दिन वो लड़का हमारे सामने फूट फूट कर रोया। हम सब उसकी बहन पर गुस्सा थे और हमने उसे चुप कराते हुए कहा कि वो क्यों नहीं घर में बताता या वो भी बदले में बहन को एक आध थप्पड़ क्यों नहीं लगाता?
बदले में उसने सिसकते हुए कहा-' मां ने कहा है, गुड बॉयज लड़कियों पर हाथ नहीं उठाते।' और हमारे पास कोई जवाब नहीं था।
ये एक कड़वा सच है कि लड़कों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रतिशत उन लड़कियों का है जो रोज बसों में, ट्रेन में, दफ्तर में और यहां तक कि धर्मस्थलों और घरों तक में शोषण और प्रताड़ना का शिकार होती हैं। ऐसी विकृत मानसिकता वालों की कोई कमी नहीं जो औरत को महज मांस का टुकड़ा समझकर ट्रीट करते हैं और स्कूल जाती बच्चियों को भी नहीं छोड़ते। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिए लड़कियों को मजबूत बनाने की जरूरत है।
पर क्या आपने पिछले कुछ सालों में ये महसूस नहीं किया कि दहेज से लेकर यौन शोषण तक की झूठी रिपोर्ट लिखवाने वाली लड़कियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। वहीं समाज में ऐसे लड़को की संख्या बढ़ रही है जो महिलाओं के साथ एक स्वस्थ माहौल बनाने और उनको सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
तो आखिर समाज की इस स्थिति के पीछे क्या वजह है? एक तरफ हम लड़कियों को आगे बढाने, समाज की उनके प्रति विचारधारा को बदलने की बात करते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं लड़कियों को लड़की होने के नाते कमजोर बनकर प्रस्तुत होने को भी प्रोत्साहित करते हैं।
अगर बिग-बॉस में जो हुआ वो स्क्रिप्टेड है तो गलत है क्योंकि इस तरह से एक गलत विचारधारा समाज तक पहुंच रही है और अगर यह स्क्रिप्टेड नहीं है तो भी गलत ही है क्योंकि इसका मतलब है कि आपके आस पास समाज में ऐसे लोग हैं जो इसी विचारधारा के साथ जीते हैं।
छेड़ने वालों को लात मारें, समान मेहनत पर समान मेहनताना मांगें, समान मौलिक अधिकारों के लिए लड़ें, शराबी या प्रताड़ना देने वाले पति के अन्याय के खिलाफ़ खड़ी हों, तो लड़कियों का सही अर्थों में आगे बढ़ना साबित होगा। लेकिन अगर लड़कियां इस सोच के साथ कदम बढ़ाएंगी कि हमें लड़की होने के नाते गलत बात के लिए भी फेवर मिलना चाहिए तो वे सही रास्ते से भटक जाएंगी।
पिछले दिनों नेशनल ज्योग्रफी पर भारतीय फौज के ट्रेनिंग प्रोग्राम पर एक डॉक्यूमेंट्री देखने को मिली जिसमें महिला-पुरुष ट्रेनिंग के बारे में बताया जा रहा था। गौरतलब है कि भारतीय सेना में महिलाओं के लिए अब बतौर युद्ध करने वाले सैनिक के तौर पर भी नियुक्तियां प्रारम्भ हो गई हैं।
वायुसेना में लड़कियां फाइटर प्लेन उड़ाने की आधिकारिक पात्रता हासिल कर चुकी हैं और यह पात्रता पाने के लिए उन्हें एक लंबी लड़ाई लड़कर खुद को सिद्ध करना पड़ा। यह नहीं हुआ कि वे महिलाएं हैं इसलिए उनके लिए नियमों या ट्रेनिंग में ढील दे दी गई हो। उन्होंने वही सब ट्रेनिंग प्राप्त की जो इस पद के लिए पुरुष करते हैं।
उन्होंने खुद को साबित किया और अपने लिए सम्मान हासिल किया। इसी बात को उक्त डॉक्यूमेंट्री में एक महिला ट्रेनी ने सिद्ध करते हुये कहा- यहां कोई लड़का या लड़की नहीं है। जो नियम हैं वो सबके लिए समान हैं। हम सब यहां अपने देश के लिए आए हैं और हर एक यही चाहता है कि वो अपना बेस्ट दे। जो सबसे अच्छा होगा वो आगे जायेगा। चाहे वो लड़का हो या लड़की।
लैंगिक भेदभाव की दीवार को तोड़ने के लिए जरूरी है कि पहले घर से ही इसकी शुरुआत की जाए। अगर आप अपने बेटे को ये सिखा रहे हैं कि उसे महिला का सम्मान करना चाहिए तो बेटी को भी ये सिखाना होगा कि तुम्हें पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में हर मोर्चे पर खुद को मजबूती से आगे बढ़ाना है लेकिन खुद के लिए किसी अतिरिक्त कम्फर्ट की चाह के बिना।
उन्हें यह सिखाना जरूरी है कि सफलता के लिए मर्दों से स्वस्थ प्रतियोगिता रखो, पूर्वाग्रह नहीं। फिर जब सफलता मिलेगी तो कोई यह कहने का साहस नहीं कर पायेगा कि लड़की थी इसलिए मिल गई।