मैं ये जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर पंडित रविशंकर को इतना अक्खड़ और गुस्से वाला क्यों कहा जाता है।
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उस वक्त तो आपकी उम्र काफी कम रही होगी?
मैं 11-12 साल का था जब दादा ने हमें पेरिस बुला लिया। दादा की उदय शंकर एंड हिज हिन्दू बैले मंडली के साथ मैं यूरोप और अमेरिका के सात साल के दौरे पर निकल गया। कोई 84 शहरों में दादा ने परफॉर्म किया और पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति से जुड़ी तमाम कथाओं को बैले नृत्य शैली में पेश किया। नृत्य में उनका जो योगदान है वो हमेशा याद किया जाएगा।
फिर आपकी पहचान खुद कैसे बनी?
जैसा मैंने बताया कि 17-18 साल की उम्र तक मैं बहुत बिगड़ गया था। बुरी आदतों का शिकार हो गया था। ये तो भला हो वर्ल्ड वार का जो हमें भारत लौटना पड़ा। दादा ने पेरिस का सेटअप खत्म कर दिया और भारत आकर अल्मोड़ा में अपना सेंटर खोल दिया। तभी मैंने तय कर लिया कि मुझे बनारस लौट जाना चाहिए और वहीं रहकर शास्त्रीय संगीत सीखना चाहिए।
मैं लौटकर बाबा (उस्ताद अलाउद्दीन खां) के घर के बगल में रहने लगा। इतने साल की अपनी लाइफ स्टाइल बदलने के लिए मैं खाट पर सोता, मच्छर और कीड़े मकोड़े काटते। वहां सांप, बिच्छू होते, डर भी बहुत लगता लेकिन मेरे भीतर संगीत का जुनून था, इसलिए मैं करीब 6 महीने तक इतने मुश्किल हालात में रहकर उनसे संगीत सीखता रहा।
बाबा ने मुझे सामान्य तरीके से रहना सिखाया और मेरे वेस्टर्न रहन सहन को बदलने में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने मुझे संगीत की बारीकियां सिखाईं, पहली बार गत सिखाया, सुरबहार बजाना सिखाया, फिर शास्त्रीय रागों को बारीकी से समझाया, तीन ताल से लेककर झाला तक मैंने उनसे सीखा। उनसे जो सबसे बड़ी चीज़ मैंने सीखी वो है ह्यूमैनिटी। उनके भीतर जितनी सब्र और शालीनता थी, वह अद्भुत थी।
आप तो शायद इप्टा के साथ भी जुड़े रहे थे?
जुड़ा तो नहीं था, लेकिन मुंबई मैं 1945 में आया और पहली बार वहां परफॉर्म किया। उसी दौरान ख्वाज़ा अहमद अब्बास एक फिल्म बना रहे थे धरती के लाल...इसका संगीत मुझे देना था। इस दौरान इप्टा के अंधेरी ऑफिस में जाना होता था। वहां का माहौल बेहद देशभक्ति और क्रांतिकारी गीतों वाला होता था। उसी दौरान हमने इकबाल की मशहूर गजल ''सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'' की धुन बनाई थी।
उसी दौरान चेतन आनंद भी एक फिल्म बना रहे थे नीचा नगर। उसका संगीत भी मुझे ही देना था। इसमें एक गीत था– हम रुकेंगे नहीं, हम झुकेंगे नहीं। इसे गाने के लिए एक नया लड़का आया, लेकिन उसकी आवाज़ में वो जोश नहीं दिखा तो हमने उसे नहीं लिया। बाद में वही लड़का बेहतरीन गायक मोहम्मद रफी के नाम से मशहूर हुआ।
पंडित जी अपने अनुभव बता रहे थे और मैं ये जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर पंडित रविशंकर को इतना अक्खड़ और गुस्से वाला क्यों कहा जाता है। उनके कई ऐसे किस्से सुनता रहा था कि उन्होंने कई बार ज़रा भी डिस्टर्बेंस होने पर अपना परफॉर्मेंस बंद कर दिया था या आयोजकों को मना कर देते थे। इस बारे में सवाल करने पर पंडित जी ने हंसते हुए बताया कि हां कई बार ऐसा हुआ है। मुझे लगता है कि आप जब संगीत सुन रहे हैं तो उसमें डूब जाइए, उसे महसूस कीजिए।
दरअसल, हमारे यहां शुरू से संगीत को राजा महाराजाओं या अमीरों की चीज़ मानते रहे हैं। ये दरबारी मानसिकता और जबरदस्ती की वाह वाह या संगीत को अय्याशी की तरह इस्तेमाल करना मुझे कभी पसंद नहीं रहा। यहां लोग वक्त पर नहीं आते, कोई कभी आ रहा है, कोई कभी, कोई कंसर्ट के दौरान बातें कर रहा है, तो महिलाएं स्वेटर बुन रही हैं, या कोई वेंडर मूंगफली बेच रहा है। बजाते वक्त मुझे ये सब डिस्ट्रैक्ट करता है और मैं इसके लिए खुलकर रिएक्ट करता रहा हूं। इसके लिए मुझे वेस्टर्न एटीट्यूड वाला भी कहा जाता रहा है।
युवाओं से था खास लगाव
पंडित जी बता रहे थे कि उन्हें युवाओं से खास लगाव है, वो जानते हैं कि यही वो पीढ़ी है जो हमारे संगीत को समझ सकती है, आगे बढ़ा सकती है, इसलिए हमारी कोशिश होती है कि हम उनके लिए संगीत के केन्द्र खोलें, उन्हें आगे बढ़ाएं और संगीत में वो तमाम प्रयोग करें जो आज की पीढ़ी को पसंद आता है। इसीलिए हमने भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिमी संगीत से भी जोड़ा, जैज़ के साथ फ्यूज़न किया और तमाम प्रयोग किए जिसके लिए आलोचनाएं भी सुनीं।
जाहिर है एक बड़ा संगीतकार बहुत व्यापक तरीके से सोचता है, उसकी सोच परंपरागत होने के साथ प्रयोगात्मक भी होती है। और पंडित जी के साथ बात करते हुए हमें इस बात का पूरा एहसास हुआ कि आखिर उन्हें सितार का सम्राट क्यों कहा जाता है।
इंटरव्यू के कई और हिस्से हमने शूट किए, कांट छांट कर कुछ समय सीमा का ध्यान रखकर हमने ‘रोज़ाना’ में इसे 10-12 मिनट चलाया भी। वो ऐतिहासिक इंटरव्यू शायद बीएजी फिल्म्स की लाइब्रेरी में कहीं पड़ा भी हो, लेकिन अफसोस कि उसकी कोई वीडियो कॉपी मेरे पास नहीं है। स्मृतियां हैं और कुछ नोट्स हैं। लेकिन वाकई पंडित जी के साथ ये मुलाकात उनके तमाम अनछुए पहलुओं को खोलने वाली एक अंतरंग बातचीत थी।