मप्र देश का सर्वाधिक जनजातीय आबादी वाला राज्य है।
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हालात ये भी हुए कि कांग्रेस प्रदेश की 29 में से एक सीट तक सिमट गई थी। कांग्रेस कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तक रहने के बावजूद अपनी पारंपरिक छिंदवाड़ा सीट भर बचा पाए। भाजपा को न केवल मप्र बल्कि देशभर में चुनावी फ़तह बरकरार रखने के लिए वोट बैंक पकड़े रहने के लिए ओबीसी, आदिवासी और दलित वर्ग को साधे रखना है।
मप्र में 2022 की तैयारी
मप्र में 2003 से अब तक भाजपा के तीनो मुख्यमंत्री ओबीसी वर्ग के रहे हैं। उमा भारती सात महीने, बाबूलाल गौर 15 महीने सीएम रह सके और शिवराजसिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में 14 साल पूरे कर चुके हैं।
वे 2023 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट चुके हैं। जाहिर है इसी तैयारी में भाजपा की 2022 के लोकसभा चुनाव की तैयारी भी शामिल है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीसरी पारी की तैयारी में उप्र की तरह मप्र की लगभग सभी सीटें जीतने का बीते चुनाव का इतिहास दोहराना प्रमुख कारक होगा जो भाजपा के लिए परम आवश्यक होगा।
मप्र देश का सर्वाधिक जनजातीय आबादी वाला राज्य है। देश की आबादी में आदिवासी करीब पौने आठ फीसदी हैं, मप्र में 21 फीसदी आबादी आदिवासियों की है, जो 52 में से 21 जिलों में है, 6 जिले आदिवासी बहुल हैं।
भाजपा मप्र की धरती पर जनजातीय गौरव दिवस और गोंड रानी कमलापति के नाम पर विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशन का नामकरण प्रधानमंत्री की मौजूदगी में करके न केवल मप्र बल्कि छत्तीसगढ़, झारखंड से लेकर करीब उन दो दर्जन राज्यों के आदिवासियों को भी संदेश देना चाह रही है, जहां लोकसभा की इस वर्ग के लिए आरक्षित ज्यादातर सीटें आती हैं।
आदिवासी बहुल राज्यों झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तेलंगाना आदि में भाजपा सत्ता में नहीं है। दुनियाभर में मूल निवासियों के अधिकारों की अनदेखी बड़ा मुद्दा है, ऐसे में खुद को विश्व की सर्वाधिक सदस्यता वाली लोकतांत्रिक पार्टी होने का दावा करने वाली इसे विश्व स्तर पर भी शोकेस कर सकती है।
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