अर्जुन, भगवान कृष्ण से कहते हैं कि मन को नियंत्रित करना बहुत कठिन है, जिस पर भगवान कृष्ण ने कहा-
'मन जहां भी जाता है उसे कुशलतापूर्वक वापस ले आओ।' मन से लड़ो मत! यह बिल्कुल अपने बच्चों को घर वापस लाने जैसा है। यह वैसा ही है, जैसे यदि आप किसी छात्र या किशोर से कुछ न करने के लिए कहें, तो वे वही करना चाहेंगे। आपका मन एक किशोर की तरह है जिसे आप अपने साथ लेकर घूम रहे हैं और यह परिपक्व नहीं हुआ है। यह ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता जिसे आप इसे करने के लिए कहें, तो आप इसे घर वापस कैसे लाएंगे?- कुशलता से!
सत्य और विरोधाभास
यदि आप भगवद् गीता को आरंभ से अंत तक पढ़ेंगे तो पाएंगे कि इसमें कितने विरोधाभास हैं! कृष्ण ने अर्जुन के सामने विरोधी तर्क रखकर उसे पूरी तरह भ्रमित कर दिया है। कई लोगों ने इनमें 'समन्वय' लाने का प्रयत्न किया है, अर्थात उन्होंने विरोधाभास को समाप्त करने की कोशिश की है, किंतु मेरा विचार भिन्न है। आपको इन विरोधाभासों को मिटाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। सत्य विरोधाभास में ही प्रकट हो सकता है। सत्य सदैव विरोधाभासी होता है।
उदाहरण के लिए किसी विशेष स्थान पर जाने के लिए, आप कह सकते हैं: 'दाएं जाओ और बाएं मुड़ो' या 'दाएं जाओ और दाएं मुड़ो'। दोनों सही हो सकते हैं। यह 'गोलाकार सोच' है, जो धर्मशास्त्र या दर्शन की दुनिया के लिए सबसे बड़ा उपहार है। यह दुनिया के किसी अन्य भाग में मौजूद नहीं है।
उदाहरण के लिए, पश्चिम में लोग इस बात पर भ्रमित हैं और सोच रहे हैं, 'यदि ईश्वर सर्वव्यापी है, तो शैतान को कहां स्थान दिया जा सकता है?' आप शैतान को 'रख' नहीं सकते। यदि आप ऐसा करते हैं, तो ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है ! यही है न? लेकिन पूर्व में यही विरोधाभास, समग्रता के एक अंश के रूप में सह-अस्तित्व में स्वीकृत किया गया है और यही अद्वैत है।
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