ऐसी आशंका है कि भविष्य में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' बौद्धिक आदान- प्रदान में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करेगा।
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मानवीय सभ्यता के विकास में भाषा का प्रचलन शुरू होने के बाद सूचनाओं के आदान-प्रदान, बात-विचार और व्यवहार में आसानी तो हुई ही। संचार के दूसरे माध्यमों मसलन प्रिंट- रेडियो, वायरलेस- टेलीविजन -टेलीग्राफ, इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये पलक झपकते सूचनाओं का एक स्थान से दुनिया के किसी हिस्से में सूचनाओं का पहुंचाना बेहद आसान हो गया है। ऐसी भविष्यवाणी 19वीं सदी के उत्तरार्ध में निकोला टेस्ला ने भी किया था कि -आने वाले समय में ' सिंगल विंडो सिस्टम' के जरिए किसी फाइल को दुनिया के छोर से दूसरे छोर पर भेजना संभव हो जाएगा। उनकी अधिकतर भविष्यवाणियों की तरह यह भविष्यवाणी भी आज की हकीकत है। मानवी सभ्यता ने भाषा के विकास के बाद बातचीत के जरिए भी कई संस्थाओं का विकास किया है। शिक्षा भी उन संस्थानों में एक है, जहां बातचीत के जरिए ही हम अपने विचार का आदान-प्रदान करते हैं।
लोकतंत्र के बारे में युवाल नोआ हरारी का कहना है कि -
लोकतंत्र की संस्था भी बातचीत के जरिए ही मजबूत हुई है, और आगे बढ़ी है। आज सोशल मीडिया टेलीविजन और इंटरनेट हमारे विचारों को एक स्थान से दूसरे पर स्थान तक पहुंचाने के माध्यम है। इन माध्यमों से हम अपने विचारों से देश और दुनिया को अवगत कराते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास में इन माध्यमों का उल्लेखनीय योगदान है। सवाल है कि अगर 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' और 'अलगोरिदम' ही भविष्य में हमारा भाग्य विधाता होने वाले हैं , तो हमारी बातचीत की प्रचलित परपाटी का क्या होगा?
क्या हम अपने विचारों से एक दूसरे को अवगत कराने और उनसे असहमत होने के अपने मौलिक अधिकार से-जो किसी लोकतंत्र की खूबसूरती है, वंचित नहीं हो जाएंगे? ऐसी आशंका है कि भविष्य में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' बौद्धिक आदान- प्रदान में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करेगा। हमारा दिमाग और हमारे सोच का तरीका एक 'कार्बनिक इन्टीटी' है और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' उस तरह की 'ऑर्गेनिक इन्टीटी' नहीं है।
यह एक ऐसी 'इन्टीटी' है ,जो अनथक और अनवरत काम करता है। यह न सिर्फ हमारा ध्यान आकर्षित करता है, बल्कि अब तो यह हमारे जिन्दगी के एक -एक पल की निगरानी भी कर रहा है। इसलिए हमारी बातचीत के दायरे सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उनके व्यक्तिगत होने का भी अब दावा नहीं किया जा सकता है।
एक तरह से 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' हमारे विश्वास और बातचीत करने की योग्यता को भी खत्म कर रहा है। रही बात सूचनाओं की तो सूचनाएं हमेशा सत्य नहीं होती।युवाल नोआ हरारी कहते हैं कि सूचनाओं की तरह सत्य भी एक बेहद पेचीदा मसला है। इस अर्थ में अगर देखा जाए तो सत्य की तह तक पहुंचाना और सत्य का ज्ञान प्राप्त करना आज के युग में कितना कठिन होता जा रहा है।अब तक हम बात - विचार को, सुनने -गुनने को, विचारों के आदान-प्रदान के जरिये एक दूसरे से सीखते -सीखाते रहे हैं।
अब अगर बातचीत की भी कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी, जैसा कि युवाल नोआ हरारी दावा कर रहे हैं। तब यह बेहद जरूरी है कि अभी से हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए आने वाली पीढ़ी को तैयार करें।
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