जाणता राजा के प्रत्येक प्रयोग में बाबा साहेब खुद दर्शक होते थे।
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आज फेसबुक पर बाबा साहेब के साथ लोग अपने-अपने फोटो डाल रहे हैं। मैंने एक भी फोटो नहीं डाला है। बाबा साहेब के साथ फोटो में आने की मेरी लायकी नहीं है। 'सह्याद्रीतील सात रत्ने' का प्रयोग मैंने उनके सामने किया। वासुदेव बलवंत फड़के का प्रयोग भी उन्होंने देखा। उन्होंने मंच पर आकर मुझे आशीर्वाद दिया था। वह मेरी जिंदगी के लिए अनमोल पल था।
वे कई बात किस्सागोई में ऐसी बातें बता जाते कि हर कोई अचंभित रह जाता-
एक बार हम खाना खा रहे थे। उन्होंने बाल गंधर्व से जुड़ी याद सुनाई। सुबोध भावे की फिल्म में भी यह दृश्य है। एक प्रसंग है। एम्बेसेडर गाड़ी में जाते समय बाल गंधर्व को एक थैली मिलती है। वह लेकर जा रहे होते हैं। उनके साथ एक व्यक्ति है, जिसका नाम फिल्म में नहीं है। उस व्यक्ति को बाल गंधर्व गाड़ी रोकने का बोलते हैं। फिर एक जगह थैली रख देते हैं। बाबा साहेब ने एक बार बताया था कि उस एम्बेसेडर में बैठा व्यक्ति मैं था। यह बात कहीं भी सामने नहीं आई है। ऐसे थे बाबा साहेब।
अब तक उनका छत्र हमारे ऊपर था। बाबा साहेब ने बहुत मेहनत कर जाणता राजा की टीम जुटाई है। बाबा साहेब के जाने से टीम को धक्का लगा होगा। पर मुझे यकीन है कि जाणता राजा के प्रयोग होते रहेंगे। उनकी टीम यह प्रयोग जारी करेगी। जाणता राजा नहीं थमना चाहिए। जाणता राजा के प्रत्येक प्रयोग में बाबा साहेब खुद दर्शक होते थे। शिवाजी मंच पर आते तो वे खुद अभिवादन करते। इस तरह उन्होंने छत्रपति के जीवन को जीया है।
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