पिछड़ापन, आर्थिक असमानता, गरीबी, लाचारी और सर्वसुलभ न्याय दुर्लभ होने के कारण अब भी भारत की आजादी को अधूरी मानने वाले लोगों से हम सहमत हो या नहीं, मगर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि 15 अगस्त 1947 को हमें जो आजादी मिली थी वह सचमुच अधूरी ही थी, क्योंकि आजादी की घोषणा केवल ब्रिटिश भारत के लिए की गई थी और लगभग 562 रियासतों वाले शेष भारत का भविष्य तब भी अधर में लटका हुआ था।
देखा जाए तो जिस 15 अगस्त के दिन अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई मुकाम तक पहुंची उसी दिन से देशी शासकों के अधिपत्य वाले रियासती भारत में आजादी की निर्णायक जंग शुरू हुई जो कि 1975 में सिक्किम के विलय तक जारी रही।
मानने वाले तो 5 अगस्त 2019 को संविधान की धारा 370 और 35 ए के प्रावधानों की समाप्ति को ही आजादी के समय शुरू हुई विलय की प्रक्रिया की सम्पूर्णता मानते हैं।
15 अगस्त 1947 को जब भारत में नए लोकतांत्रिक युग का सूत्रपात हुआ उस समय भारत में दो तरह की शासन व्यवस्थाएं थीं। इनमें से एक देशी रियासतों की सामंती व्यवस्था और दूसरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था थी।
ब्रिटिश भारत भी बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों तथा पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान समेत भारत के 17 प्रोविन्सों में बंटा हुआ था। उस समय लगभग 562 देशी राज्य थे जिनमें कुल 27 की जनसंख्या वाली बिलबाड़ी रियासत भी थी तो इटली देश से बड़ी हैदराबाद रियासत भी थी जिसकी जनसंख्या उस समय 1.40 करोड़ थी।
इनमें वे 35 हिमालयी रियासतें भी थीं जिनसे बाद में हिमाचल प्रदेश बना। एक अनुमान के अनुसार इन सभी रियासतों का क्षेत्रफल लगभग 7,12,508 वर्गमील या 11,40,013 वर्ग किमी था।
कैबिनेट मिशन स्पष्ट कर चुका था कि देशी राज्यों को पौरामौंट्सी संधि के तहत आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की जो गारंटी ब्रिटिश सरकार ने दे रखी है, वह 15 अगस्त 1947 को संधि के समाप्त होने पर स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।
सन् 1857 की गदर के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से छीन कर अपने हाथ में लिए जाने के बाद जब 1876 के अधिनियम के तहत ब्रिटिश साम्राज्ञी को ‘‘क्वीन एम्प्रेस ऑफ इंडिया’’ या भारत की महारानी घोषित किया गया और राज्यहरण की नीति त्याग कर देशी रियासतों को आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की गारंटी दी गई तो बदले में उनकी सार्वभौम सत्ता ब्रिटिश क्राउन में सन्निहित हो गई थी।
इसमें देशी राज्यों के रक्षा, संचार, डाक एवं तार, रेलवे एवं वैदेशिक मामले ब्रिटिश हुकूमत में निहित हो गए थे। इसलिए सरदार पटेल और वीपी मेनन ने बहुत ही होशियारी से सबसे पहले देशी राज्यों को भारत संघ में मिलाने से पहले उनसे ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर करा कर स्वतंत्र निर्णय लेने के मामले में कानूनी तौर पर उनके हाथ बांध दिए थे।
इसके बाद चरणबद्ध तरीके से उन सबका भारत संघ में विलय करा दिया गया। इस प्रक्रिया में उड़ीसा के 36 राज्यों का विलय 15 दिसंबर 1947 को तो कोल्हापुर और दक्कन ऐजेंसी के 17 राज्यों का विलय 8 मार्च 1948 को हुआ। सन् 1948 में ही सौराष्ट्र और काठियावाड़ की रियासतों का विलय हुआ।
बुंदेलखंड और बाघेलखंड की 35 रियासतों का 13 मार्च 1948, राजपूताना की 19 रियासतों का विलय भी मार्च 1948 में, जोधपुर, जैसलमेर, जयपुर, एवं बीकानेर का 19 मार्च 1948 को, इंदौर, ग्वालियर झाबुआ एवं देवास का जून 1949 में, पंजाब की 6 रियासतों का 1948 में, उत्तर पूर्व के मणिपुर का 21 सितंबर 1948 में, त्रिपुरा का 9 सितम्बर 1949 में, कूच बिहार का 30 अगस्त 1949 में विलय हुआ।
बड़े राज्यों में से हैदराबाद का पुलिस कार्यवाही के बाद 18 सितंबर 1948 को अधिग्रहण किया गया। जबकि त्रावनकोर-कोचीन 27 मई 1949, कोल्हापुर फरबरी 1949 तथा मैसूर का विलय 25 नवंबर 1949 को तथा हिमालयी राज्य टिहरी का विलय 1 अगस्त 1949 को हुआ। हिमाचल प्रदेश का गठन करने से पहले 1948 में ही वहां की 27 रियासतों का संघ बना कर उसे केंद्रीय शासन के तहत लाया गया।
ब्रिटिश भारत में जहां कांग्रेस आजादी के लिए लड़ रही थी वहीं रियासतों में कांग्रेस के ही दिशा निर्देशन में प्रजामंडल सक्रिय थे। इन प्रजामंडलों का संचालन सन् 1927 में बंबई में गठित ‘‘अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद’’ (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस) कर रही थी। इसकी कमान पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1939 में स्वयं संभाली जो कि 1946 तक इसके अध्यक्ष रहे।