विशेषज्ञ बताते हैं कि नालों के पानी को साफ करने के लिए लगने वाले वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पर करीब 1 करोड़ रुपये खर्च होता है, जबकि नम भूमियों का निर्माण ढाई से 3 लाख रुपये में हो जाता है। इसके लिए सबसे पहले नाले के पानी के लिए ऑक्सीडेशन टैंक बनाते हैं। यहां सारी पानी जमा होता है, जिससे जल प्रदूषण के स्तर में सुधार होता है। आगे इस पानी को एक चैनल से गुजारते हैं। इसमें पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े होते हैं। पानी पत्थरों से टकराता हुआ आगे बढ़ता है, जिससे उसके टीडीएस आदि में सुधार आता है। फिर नदी की तलहटी जैसी एक बड़ी नम भूमि बनाई जाती है। इसमें नरकट, बेशरम, पटेरा जैसी करीब 40 प्रजातियों के पौधे लगे होते हैं। आगे जरूरत के हिसाब से पांच-सात नम भूमियां तैयार होती हैं। इसमें से गुजरता हुआ पानी नदी में मिलने से पहले बिल्कुल स्वच्छ हो जाता है। एनजीटी के आदेश पर दिल्ली में नजफगढ़ ड्रेन व उत्तर प्रदेश सरकार की हिंडन पर इसी मॉडल काम करने की योजना है। उत्तर प्रदेश सरकार के सूत्र बताते हैं कि उसके अधिकारियों की यमुना बॉयोडायवर्सिटी पार्क के विशेषज्ञों के साथ इस मसले पर कई बार चर्चा भी हुई है। फिलहाल पूरे पोजेक्ट की डीपीआर तैयार की जानी है।
2 पार्क तैयार, 5 पर चल रहा काम
दिल्ली में 457 एकड़ में फैला यमुना बॉयोडायवर्सिटी पार्क व करीब 692 एकड़ में फैला अरावली बॉयोडायवर्सिटी पार्क तैयार हो गया है। इसमें अलग-अलग प्रजाति के करीब 1000 पौधे व जंतुओं की करीब 2000 प्रजाति हैं। इसके अलावा तुगलकाबाद, तिलपत वैली, नीला हौज, कमला नेहरू व दक्षिणी दिल्ली बॉयोडायवर्सिटी पार्क पर काम चल रहा है। सभी पार्कों के तैयार होने पर दिल्ली में जैव विविधता पार्कों का दायरा करीब 2 हजार एकड़ हो जाएगा।
लैंटाना व कीकर ने बिगाड़ी दिल्ली रिज की सूरत
दिल्ली रिज की सबसे बड़ी दिक्क्त लैंटाना व कीकर हैं। रिज के 60 फीसदी हिस्से को इन दोनों ने कवर कर रखा है। विलायती कीकर का न सिर्फ जल बजट खराब है, बल्कि जमीन पर फैलने वाली लैंटाना के साथ मिलकर इसने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का कमजोर कर रखा है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि दिल्ली सरकार ने 2017-18 में इसे हटाने के लिए बजटीय प्रावधान किया है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है। इसका प्रस्ताव तैयार कर दिल्ली सरकार के पास भेजा गया है। सरकार ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं मिली है।