राबर्ट वाड्रा लैंड डील मामले की जांच का जिम्मा संभालने वाले जस्टिस शिव नारायण ढींगरा 1984 सिख दंगों के मामलों से जुड़ी विशेष अदालत के जज रह चुके हैं। उन्होंने दंगों और लूटपाट के 97 दोषियों को सजा भी सुनाई थी। इसके अलावा जस्टिस ढींगरा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 498ए पर ऐतिहासिक फैसले दिए जाने के लिए भी जाने जाते हैं।
दिल्ली में दो मार्च, 1949 को जन्मे जस्टिस ढींगरा की शिक्षा और कर्मभूमि दिल्ली ही रही है। कानून के क्षेत्र में आने से पहले उन्होंने पूसा पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीएससी की।
1979 में उन्होंने डीयू से ही एलएलबी और 1993 में एलएलएम की पढ़ाई की। वे 1984 में सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट आन रिकार्ड भी रहे। एडवोकेट के रूप में उन्होंने फरवरी 1976 में शुरुआत की और दिसंबर 1987 तक कंपनी मामलों, क्रिमिनल केसों की पैरवी करते रहे।
दहेज की धारा 498ए पर भी दे चुके हैं ऐतिहासिक फैसले
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जस्टिस ढींगरा छह जनवरी, 1988 में वे एडिश्नल जिला व सत्र न्यायाधीश बने। उन्होंने वैवाहिक कोर्ट, टाडा कोर्ट, 1984 दंगों से संबंधित विशेष अदालत, फूड अडल्टरेशन कोर्ट और पोटा के तहत विशेष अदालत में अपनी सेवाएं दी हैं।
वे फरवरी 2005 से फरवरी 2006 तक दिल्ली के जिला व सत्र न्यायाधीश पद पर भी रहे। 28 फरवरी, 2006 को वे दिल्ली हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए, जहां से एक मार्च, 2011 को उन्होंने रिटायरमेंट ली।
जस्टिस ढींगरा द्वारा देश में हमेशा से विवाद और चर्चा का विषय बने रहे दहेज निरोधक कानून की धारा 498ए पर अनेक ऐतिहासिक फैसले सुनाते हुए इस धारा के दुरुपयोग के बारे में सरकार को भी आगाह किया।
धारा 498ए, जिसके तहत विवाहित महिला द्वारा अपने ससुरालियों की पुलिस में शिकायत किए जाने पर बिना पूछताछ व जांच के ससुरालियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, के विभिन्न केसों पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस ढींगरा ने टिप्पणियां कीं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
‘वैवाहिक घर ईंटों और दीवारों से बनी एक इमारत नहीं है। यह आशीर्वाद से भरा परिवार के सदस्यों और बड़ों के संबंधों की मिठास से शामिल एक घर है।’
‘विवाह विफल रहने के कारण पत्नी कानून का उपयोग अपने ससुरालियों को परेशान करने के लिए नहीं कर सकती।’