साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की ओर से रविवार को हुई मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने समाज के विविध पक्षों को कविता के माध्यम से उठाया। सिप्टी जीआईसी के प्रवक्ता सामश्रवा आर्य ने ‘पीकर शराब लोग भूल जाते अपने को, अच्छे में बुरे में कुछ फर्क नहीं कर पाते’ कविता सुनाई।
राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता रिटायर्ड प्रधानाचार्य डॉ.भुवन चंद्र जोशी ने ‘राष्ट्र को विकसित कराने की कहां कोई बात है, एक-दूजे को मिटाना, घात और प्रतिघात है’और हिमांशु जोशी ने ‘दल सारे दलदल हुए, राजनीति है डंक’ और शिक्षक फणींद्र कुमार पांडेय ने ‘आजकल नेता मंदिरों में नित यों शीश झुका रहे हैं, मार्च ग्यारह को क्योंकि चुनाव परिणाम आ रहे हैं’ अपनी रचना सुनाई। हर्षित पांडेय ने ‘अब तो गधे को गधा कहते भी डर लगता है, उसे तो ज्ञानियों का प्रेरणास्रोत समझा जाता है’ कविता सुनाई। रिटायर्ड प्रधानाचार्य डॉ.तिलक राज जोशी ने ‘किसे विधायक हम चुनें, हैं विध्वंसक, चोर, मत हथियान के लिए करते हैं सब शोर’ कविता के माध्यम से आज की राजनीति पर प्रहार किया।
डॉ.कीर्तिबल्लभ सक्टा ने ‘कभ्भै चीन छ शत्रु, तुमरो कभ्भे छ हो पाक भौ’ कविता सुनाई। पुष्कर सिंह बोहरा ने ‘मानव जब धरती पर आया, कर्ज बहुत सा लेकर आया’ नेहा पंत ने ‘प्रकृति की छटा भी कितनी निराली है, गुंजती जिसमें भौंरों की किलकारी है। शिक्षिका अंजू पांडेय ने ‘पंरिदों से जरा कह दो, पर अपने फैला लो, कहीं सुलगी हुई चिंगारी, दिलों में जाग जायेगी’ और लता खर्कवाल ने ‘कभी सबके दिल में रहती थी मैं, आज मोबाइल में सबके रहती हूं’ रचना सुनाई।
डॉ.सतीश पांडेय ने होली की शुभकामना देते हुए ‘जिस तरह होली के रंगों की पड़े बौछार तन में, उस तरह खुशियों की बौछारें पड़े इस जिंदगी में पेश की’ कविता सुनाई। स्वाति जोशी ने ‘आओ रंग भरे जीवन में मिलकर खेलें होली, राग द्वेष सब मिटा जगत के, प्रेम की बोलें बोली’ कविता सुनाई। सरोज यादव सरू, बबीता जोशी, कशिश जोशी, नवीन पंत ने भी कविता के जरिए विविध रंग बिखेरे। गोष्ठी में लक्ष्मी ओली, रवींद्र सिंह बोहरा, साकेत जोशी सहित तमाम श्रोतागण मौजूद थे।