‘सच बताऊं, तो यह पदक मेरे लिए बहुत मायने रखता है। आठ साल पहले ग्वांगझू में स्वर्ण पदक जीतने की खुशी महसूस हो रही है। एक ऐसा भी वक्त आया था, जब मैं बहुत निराश हो गई थी, लेकिन जकार्ता एशियन गेम्स के रजत पदक ने मेरे जीवन में एक बार फिर खुशी का संचार किया है। अब मैं दोगुनी मेहनत से ट्रेनिंग करूंगी।’ यह कहना है जकार्ता एशियाड की 3000 मीटर स्टीपल चेज में रजत जीतने वाली एथलीट 32 वर्षीय सुधा सिंह का, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से आलोचकों के मुंह पर ताले जड़ दिए।
अमर उजाला से फोन पर हुई खास बातचीत में उन्होंने इस पदक के लिए अपने परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि पिता, मां और भाई ने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसलिए यह पदक मैं उन्हीं को समर्पित करती हूं।
लखनऊ मेरी कर्मस्थली रही है। यहां केडी सिंह बाबू के एथलेटिक्स हॉस्टल में (2002 से 2005 तक) विमला मैम से एथलेटिक्स की बारीकियां सीखीं। इस शहर से मेरा नाता कभी न टूटने वाला है।
पश्चिम रेलवे में सीनियर टीटी पद पर कार्यरत सुधा ने यूपी सरकार के शासनादेश के अनुसार, जॉब मिलने के बाबत पूछने पर कहा, कौन अपने घर वापस नहीं आना चाहता है। मैं बहुत पहले सरकार में उच्च पदाधिकारियों से मिलकर बात कर चुकी हूं। अब तो पदक भी जीत लिया है। सरकार से राजपत्रित अधिकारी का ऑफर मिला तो खुशी से स्वीकार करूंगी।