भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का जिक्र हो तो गाय की चर्चा जरूर होती है। कन्हैया की अधिकांश बाल कथाओं में गऊ प्रेम दर्शाया गया है। ब्रज की धरती पर गोवंश के प्रति यह गहरा लगाव आज भी दिखाई देता है। यही वजह है कि यहां गायों की संख्या लाखों में है।
राधा जी का गांव बरसाना तो गायों का आशियाना बन गया है। यहां तो आज भी कृष्ण के भजनों पर गाय झूमने लगती हैं। यहां माताजी गोशाला में ही 40,000 गाय हैं। जबकि इसके आसपास के इलाकों में छोटी-बड़ी कई दूसरी गोशालाएं भी चल रही हैं।
जगजाहिर है कि कृष्ण की नगरी में तो सुबह भी राधे-राधे, कृष्ण-कृष्ण के जाप से शुरू होती है। यहां की तो गाय भी भगवान कृष्ण के नाम पर झूम उठती हैं। कई गोशालाएं ऐसी हैं जहां यदि कोई गऊ सेवक कृष्ण-कृष्ण पुकारने लगता है तो गाय उसके पास पहुंच जाती हैं।
बरसाना की माताजी गोशाला में 40,000 गोवंशीय पशु हैं, इनमें एक हजार गाय दूध दे रही हैं। यहां ग्वालों ने गायों के नाम भी रख रखे हैं। मोहिनी, गोपाली, सुदेवी, गोविंदी, जगवती, भोली और शांति। बताया जाता है कि सुबह भगवान कृष्ण के भजन बजते हैं तो गायें झूमने लगती हैं। गोशाला के सचिव सुनील सिंह बताते हैं कि गायों को अपने ग्वालों से बहुत प्यार है। कई गाय ऐसी हैं यदि कोई उनके ग्वालों से तेज आवाज में बोलने लगे तो दौड़कर उसकी मदद को पहुंच जाती हैं।
गोसेवा करने पहुंचते हैं लोकसेवक
कई आईपीएस, आईएएस और पीसीएस अधिकारी यहां गोशालाओं में आकर गो सेवा करते हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो हर महीने गोशाला में पहुंचकर दिन बिताते हैं। गायों की मालिश करते हैं, अपने हाथों से नहलाते हैं और चारा खिलाते हैं। रविवार को परिवार के साथ पहुंच जाते हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और बिहार तक से अधिकारी यहां की गोशालाओं में पहुंचते हैं। कई जगह तो अधिकारी मशीन से खुद चारा काटकर गायों को खिलाते हैं, उनका गोबर उठाते हैं। कई बड़े सियासी लोग भी गायों की सेवा के लिए ब्रज की धरती पर आते-जाते रहते हैं।
यहां हैं गोशालाएं
मथुरा, बरसाना, गोकुल, वृंदावन, नंदगांव, गोवर्धन, राधाकुंड, बलदेव और रावल।