झज्जर। अप्रैल 2021 की वह रात, जब गोच्छी गांव के प्रेम नगर निवासी एडवोकेट श्यामफूल भारद्वाज का शरीर सिर्फ 35 किलोग्राम का रह गया था। परिजनों ने उम्मीद छोड़ दी थी। घर वाले उन्हें गांव ले आए और अंतिम तैयारियों में जुट गए।
कोरोना ने सांसों को इतना कमज़ोर कर दिया था कि हर धड़कन एक संघर्ष बन गई थी लेकिन जिस सांस को हार मान लिया गया था। उसी ने आगे चलकर एक ऐसी थीसिस लिख दी जो आज सैकड़ों वकीलों के मानसिक तनाव को कम करने की राह दिखा रही है।
कोरोना से लौटे तो परीक्षाओं की झड़ी लग गई
1994 से यानी करीब 30 साल से रोहतक और झज्जर में वकालत कर रहे श्यामफूल के लिए 2021 आसान साल नहीं था। कोरोना से उबरे ही थे कि उसी साल एमए प्रथम वर्ष की परीक्षा सिर पर आ गई। जुलाई में टाइफाइड ने घेर लिया। उससे संभले तो परीक्षा से ठीक एक महीना पहले जॉन्डिस हो गया। हालत इतनी बिगड़ी कि आयुर्वेद कॉलेज ब्राह्मणवास में पंचकर्म कराने पहुंचे डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए। लेकिन श्यामफूल ने हार नहीं मानी। आयुर्वेद के सहारे इलाज कराया और 2022 में योग एवं नैचुरोपैथी में एमए पूरी कर ली।
यहीं से उनके भीतर एक नया संकल्प जन्मा। योग ने जो जीवन उन्हें दोबारा दिया था। उसे वह यूं ही नहीं जाने देना चाहते थे। जनवरी 2023 में उन्होंने पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराया। जब उन्होंने अपना शोध वकीलों के मानसिक तनाव और कल्याण पर योग के प्रभाव तो कमेटी ने मानने से इन्कार कर दिया लेकिन श्यामफूल अड़े रहे क्योंकि यह विषय उनके अपने जीवन का ही तो सार था।
कैंसर ने दी दस्तक, नहीं टूटी लगन
जनवरी 2024 में एक और झटका लगा, लीवर में कैंसर की पहली स्टेज का पता चला लेकिन इस बार श्यामफूल पहले से ज़्यादा दृढ़ थे। उन्होंने यह बात अपनी पत्नी और बच्चों तक को नहीं बताई। खामोशी से आयुर्वेद और योग के सहारे इलाज कराते रहे और साथ ही झज्जर व रोहतक के वकीलों पर अपना शोध-कार्य भी जारी रखा। कुछ महीनों बाद जब दोबारा जांच कराई तो रिपोर्ट नॉर्मल आ चुकी थी। जिस बीमारी ने डराया था, वह हार मान चुकी थी और उधर थीसिस का काम भी आकार ले चुका था।
गुरु को दिया श्रेय
श्यामफूल की 62 साल की उम्र में माधव यूनिवर्सिटी, पिंडवाड़ा, सिरोही (राजस्थान) से श्यामफूल की पीएचडी पूरी हो चुकी है। वह अपने इस शोध-कार्य का पूरा श्रेय अपने मार्गदर्शक योगी डॉ. अनिल कश्यप को देते हैं जिनके सहयोग के बिना यह सफर संभव नहीं था। श्यामफूल कहते हैं कि वकालत का पेशा लंबी चलने वाली सुनवाइयों, न्यायिक प्रक्रियाओं और लगातार मानसिक दबाव से जुड़ा रहता है। इसलिए योग के ज़रिए वकीलों के तनाव को कम करने की संभावनाओं पर हुआ यह शोध भविष्य में एक उपयोगी आधार बन सकता है।
संस्कृत की परीक्षा भी पास की, अब भी पढ़ाई जारी रखने का इरादा
इस पूरे संघर्ष के बीच श्यामफूल ने 2023 में एक और उपलब्धि जोड़ी। बोर्ड की तरफ से मिले विशेष चांस के तहत दसवीं और बारहवीं में संस्कृत विषय की परीक्षा पास की। उन्होंने आठवीं तक संस्कृत पढ़ी थी और वर्षों बाद इसे पूरा करने की ठानी। इसके अलावा 1995 में वह लेबर लॉ का डिप्लोमा भी कर चुके हैं। श्यामफूल का कहना है कि वह आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं। उनका कहना है कि जिस सांस को कभी आखिरी माना गया था उसने अब भी बहुत कुछ लिखना बाकी रह गया है।
27jjrp17- अपना शोध पत्र सौंपते एडवोकेट श्यामफूल भारद्वाज। स्रोत : स्वयं- फोटो : File Photo