अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शोध प्रस्तुत करते शोधार्थी।
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दून लाइब्रेरी और रिसर्च सेंटर के सहयोग से मध्य एवं पश्चिमी हिमालय की संकटग्रस्त भाषाएं विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का विधिवत समापन हो गया। वक्ताओं ने क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने मातृभाषा के संरक्षण और संवर्द्धन में संगीत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। कहा कि बचपन में स्थानीय बोली में सिखाए गए गीत बच्चे को हमेशा याद रहते हैं। इस मौके पर शोधार्थियों द्वारा तीन शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए।
उत्तराखंड सेवानिधि सभागार में समापन सत्र के दौरान रामनगर से पहुंची संगीत की प्राध्यापिका शिप्रा पंत ने कहा कि अगर बच्चे को स्थानीय बालगीत सुनने और समझने का अवसर मिल गया तो वह जीवनभर अपनी मातृभाषा से अलग नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि बच्चे को लोरी सुनाने की परंपरा हमारे समाज में आज भी विद्यमान है लेकिन इसमें वाद्ययंत्रों का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता है। इसलिए ये बालगीतों के यह बोल बच्चे के मानस पटल में हमेशा हमेशा के लिए स्थान बना लेते हैं। और बच्चा हमेशा के लिए इन शब्दों को याद कर लेता है। शिप्रा पंत के शोध की मौजूद विद्वानों ने मुक्त कंठ से सराहना की और मातृभाषा के संरक्षण में इसे उपयोगी बताया।
कुविवि के डॉ. चंद्रप्रकाश फुलोरिया ने अल्मोड़ा नगर में कुमाऊंनी भाषा की वास्तविक स्थिति को आंकड़ों के आधार पर प्रस्तुत किया। पिथौरागढ़ डिग्री कालेज में हिंदी की प्राध्यापिका डॉ. मनीषा पंत पांडे ने पिथौरागढ़ में प्रचलित महाभारत के राजसूय यज्ञ के आधार पर मातृभाषा तथा लोक साहित्य पर चर्चा की। इस मौके पर पद्मश्री डॉ. ललित पांडे, प्रो. एमपी जोशी, ममता साह, प्रो. बीके जोशी आदि ने भी विचार रखे और सेेमिनार को क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण में अत्यंत उपयोगी बताया। समापन सत्र की अध्यक्षता जेएनयू से पहुंची डॉ. अरुषी अग्रवाल ने की जबकि शोध पत्रों की समीक्षा डॉ. मनीषा पांडे ने की।