CG Election 2023: छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के तहत दूसरे चरण में 17 नवंबर को कुल 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव कराए जाएंगे। इनमें 34 सीटें वीआईपी हैं। इन वीआईपी सीटों में सबसे महत्वपूर्ण सीट अंबिकापुर है। क्योंकि यहां से कांग्रेस के दिग्गज नेता और वर्तमान डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव (त्रिभुनेश्वर शरण सिंहदेव) चुनाव लड़ रहे हैं। सरगुजा संभाग में कांग्रेस की हार-जीत में राजघराने की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
यहां से उनके सामने बीजेपी प्रत्याशी राजेश अग्रवाल चुनाव मैदान में हैं। यहां पर कांटे की टक्कर देखी जा रही है। दोनों प्रत्याशियों के बीच कड़ा मुकाबला है। सिंहदेव के सामने लगातार चौथी बार विधायक बनने की चुनौती है। सरगुजा संभाग में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। वहीं राजेश अग्रवाल की अग्निपरीक्षा है। वो खुद को बेहतर प्रत्याशी साबित करने में लगे हुए हैं। उन्हें पार्टी और ग्रामीणों पर पूरा भरोसा है।
'चिंतामणि ने बढ़ाई बाबा की चिंता'
बात टीएस सिंहदेव की करें तो तो लोग उन्हें प्यार से बाबा कहकर पुकारते हैं। इस बार इस सीट पर बाबा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, क्योंकि सामरी से कांग्रेस विधायक चिंतामणि महाराज ने उन्हें 'चिंता' में डाल दिया है। पहले से ही अंबिकापुर में राजेश अग्रवाल के साथ बाबा का कड़ा मुकाबला देखा जा रहा था, तो दूसरी ओर हाल ही में टिकट नहीं मिलने पर सामरी से कांग्रेस विधायक चिंतामिण महाराज बागी होकर बीजेपी प्रदेश प्रभारी ओम माथुर के सामने बीजेपी का दामन थाम लिया था। उनके जाने से कांग्रेस को सरगुजा संभाग में बड़ा झटका लगा है। क्योंकि कांग्रेस उन्हें मनाने की हरसंभव कोशिश की थी। खुद बाबा ने कहा था कि चिंतामणि महाराज को कांग्रेस में बने रहना चाहिए क्योंकि बीजेपी से आने के बाद पार्टी ने उन्हें पूरा सम्मान दिया था। चिंतामणि के बीजेपी में प्रवेश होने के पीछे उनके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। वो सरगुजा संभाग में कांग्रेस की 6 से 7 सीटें प्रभावित कर सकते हैं। चिंतामणी महाराज छत्तीसगढ़ के संत गहिरा गुरु के बेटे हैं। सरगुजा संभाग में संत समाज के अनुयायी अंबिकापुर, लुंड्रा, सामरी, पत्थलगांव, जशपुर, कुनकुरी और बिलासपुर के रायगढ़, विधानसभा क्षेत्रों में हैं। प्रदेश भर में उनके समाज के अनुयायी हैं। ऐसे में बीजेपी में उनके प्रवेश करने से सरगुजा संभाग की 6 सीटों पर सीधा असर पड़ सकता है। बीजेपी यहां से आगे हो सकती है क्योंकि वर्तमान में संभाग की 14 की 14 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। उनके इस कदम से कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है।
आदिवासी बहुल सरगुजा संभाग में सिंहदेव का वर्चस्व
आदिवासी बहुल सरगुजा संभाग में सिंहदेव का वर्चस्व है। सरगुजा संभाग और उसके आस-पास के क्षेत्रों में राज परिवार या सरगुजा रिसासत का सीधा दखल रहता है। आदिवासी बहुल संभाग में दशकों से रियासत परिवार को सम्मान मिलता रहा है। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के समय से ही रिसायसत परिवार को जनप्रतिनिधि के रूप में तवज्जो मिलता रहा है। पूर्व सीएम अजीत जोगी के कार्यकाल को छोड़ दें तो बाकी काल में सिंहदेव परिवार को मौका मिलता रहा है। सिंहदेव की छोटी बहन जहां हिमाचल प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं तो सिंहदेव प्रदेश में डिप्टी सीएम के रूप में सियासत की बागडोर संभाले हुए हैं। उन्हें भावी सीएम के रूप में भी देखा जा रहा है।
ढाई-ढाई साल के सीएम बनने का उठा था मु्द्दा
वर्ष 2018 के चुनाव में बाबा 15 साल का कांग्रेस का वनवास खत्म कराए थे। 2018 में बीजेपी का सुपड़ा ही साफ हो गया था। टीएस सिंहदेव की वजह से निर्णायक जीत मिली थी क्योंकि वो खुद कांग्रेस का घोषण पत्र तैयार किए थे। संभाग की जनता उन्हें सीएम मानकर चल रही थी। क्योंकि 2018 में प्रदेश में सीएम का कोई चेहरा घोषित नहीं था। सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था, लेकिन चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलने पर तत्कालानी प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को सीएम बना दिया गया। इससे सरगुजावासियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। उस दौरान ढाई-ढाई साल तक के सीएम बनने का मुद्दा भी उठा था। खुद बाबा मीडिया के सामने ये बात उठाते रहे हैं। इसे लेकर सीएम भूपेश बघेल से सियासत में अन-बन किसी से छुपी नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से कई मौकों पर एक दूसरे पर हमला करते नजर आए थे।
क्यों अहम है सरगुजा संभाग
छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों में सरगुजा संभाग की 14 सीटें काफी अहम हैं। यहां की 14 में से 9 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। महज 5 सीट सामान्य वर्ग के लिए है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटों पर कब्जा किया था। जबकि 2013 के विधानसभा चुनावों में 7 सीटों पर भाजपा का कब्जा था और 7 सीटों पर कांग्रेस थी। यानी 2018 के चुनाव में भाजपा को यहां काफी नुकसान उठाना पड़ा था।
कांग्रेस का मजबूत किला है अंबिकापुर
अंबिकापुर सीट से एक बार बीजेपी तो तीन बार कांग्रेस चुनाव जीती है। इसमें तीनों ही बार सिंहदेव ने जीत हासिल की। साल 2003 में हुए विधानसभा के चुनाव में बीजेपी ने कमल भान सिंह को चुनाव मैदान में उतारा तो वहीं कांग्रेस ने मदन गोपाल सिंह को मैदान में उतारा था। इसमें बीजेपी को जीत मिली थी। वहीं साल 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने टीएस सिंहदेव को मैदान उतरा तो भाजपा ने अनुराग सिंहदेव को प्रत्याशी बनाया। जिसमें टीएस सिंहदेव ने बाजी मारी। यही सिलसिला साल 2013 और साल 2018 के चुनाव में बरकरार रहा। तीनों ही बार अनुराग सिंहदेव और टीएस सिंहदेव आमने-सामने दिखे। राज्य गठन से पूर्व 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव से ही अंबिकापुर विधानसभा सीट अस्तित्व में आई। तब यह सीट आरक्षित थी, लेकिन राज परिवारों और भारत सरकार के बीच हुई संधि के तहत कुछ विधानसभा में दो सदस्य चुने जाते थे। अंबिकापुर विधानसभा सीट से भी एक विधायक चुनकर, तो दूसरा विधायक राज परिवार कोटे से होता था। विधायक टीएस सिंहदेव के पूर्वज तब से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र में रोजगार का प्रमुख साधन कृषि है। किसानों की मजबूत स्थिति के कारण यहां बैंकिग, सभी प्रमुख मार्केट और फाइनेंस सेक्टर का अच्छा नेटवर्क है।
कौन हैं टीएस सिंहदेव?
सरगुजा रियासत के राजा टीएस सिंहदेव उत्तर प्रदेश में जन्मे, मध्य प्रदेश में पढ़े लिखे और छत्तीसगढ़ की राजनीति में सिर्फ चेहरे के रूप में सामने नजर आए थे। बाद के दौरा में उनका कद बढ़ता चला गया। शुरू से ही टीएस सिंहदेव की राजनीति में खासा रुचि नहीं थी। राजनीति में सक्रिय होने के बाद सिंहदेव पहली बार अंबिकापुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष चुने गए। साल 2008, 2013 और साल 2018 में वह लगातार तीन बार विधायक चुने गए। इसके साथ ही साल 2014 में वह नेता प्रतिपक्ष रहे। साल 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद साढे़ 4 सालों तक छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री के रूप के रूप में काम किए। बाबा के जनाधार को कांग्रेस भी बखूबी समझती है इसलिए 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के दौरान ढाई-ढाई साल का सीएम बनने का मुद्दा भी खूब गूंजा। खुद बाबा भी गाहे-बगाहे सीएम न बन पाने को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं। कई बार खुले मंच से अपनी नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में सरगुजा संभाग में बाबा की राजनीतिक पकड़ और कहीं कांग्रेस का जनाधार न खिसक जाए दोनों बातों को देखकर विधानसभा चुनाव 2023 से महज चार महीने पहले बाबा को डिप्टी सीएम का ताज पहनाया गया। ऐसे में माना जाता है कि कहीं न कहीं बाबा की नाराजगी को कम करने की कोशिश की गई है। अब बाबा भी खुश नजर आ रहे हैं और चुनावी प्रचार में बीजेपी और केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर हैं।
बीजेपी को ग्रामीण जनता पर भरोसा, खुद को साबित करने में जुटे राजेश
भाजपा ने अंबिकापुर से राजेश अग्रवाल को चुनावी मैदान में उतारा है। पार्टी को उम्मीद है कि राजेश अम्बिकापुर के ग्रामीणों का वोट हासिल करने में सफल होंगे। इसी फार्मूले के तहत भाजपा जीत दर्ज करने की कोशिश कर रही है। बीजेपी को उम्मीद है कि पहली बार विधानसभा चुनाव में नए चेहरे के रूप में उतरे राजेश अग्रवाल बाबा को पटखनी देने में कामयाब होंगे। विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्य न के बराबर हुए हैं। इससे ग्रामीणों में काफी नाराजगी देखी जा रही है। ऐसे में बीजेपी को लगता है कि उन्हें जनता का साथ मिल सकता है। कई जगहों पर ग्रामीण बैनर-पोस्टर लगाकर बाबा का विरोध भी जता चुके हैं।
वहीं राजेश अग्रवाल का कहना है कि "कोई चुनौती नहीं है। भाजपा को पहले से ही पता था कि टीएस सिंहदेव से सामना होना है। पूरा भाजपा का संगठन मिलकर चुनाव लड़ रहा है। हम सब साथ हैं। अग्रवाल का मानना है कि पिछली बार सिंहदेव विपक्ष में थे, इसलिए जनता का साथ उन्हें मिला। इस बार वो मंत्री हैं और जनता से दूर रहे हैं। उनके पास जो मंत्रालय थे, उनमें भी काम नहीं होने के चलते जनता में घोर निराशा है। उनका मानना है कि इस बार जनता बीजेपी का साथ देगी। मैं ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ा हुआ हूं। खुद भी किसान हूं। सिंचाई परियोजना ठप है। घुनघुट्टा श्याम परियोजना और कुंवरपुर डेम दोनों का पानी टेल तक नही पहुंचता है। 15 साल की रमन सिंह सरकार में बहुत से डैम बनाये गए, जिसका मेंटेनेंस भी इस सरकार में नहीं किया गया।
कौन हैं राजेश अग्रवाल?
राजेश अग्रवाल पहले कांग्रेस में थे। वे टीएस सिंहदेव के काफी करीबी रह चुके हैं। लखनपुर क्षेत्र के रहने वाले हैं राजेश लखनपुर नगर पंचायत के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। अग्रवाल पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे हैं। उनका सीधा मुकाबला 3 बार के विधायक और डिप्टी सीएम टीएस सिंह से होने जा रहा है।
जातीय समीकरण
अंबिकापुर में करीब 50 फीसद आबादी यहां एसटी वर्ग की है। जिनमें उरांव, कंवर और गोंड समाज का क्षेत्र में दबदबा है। साल 2018 में यहां कुल 2 लाख 25 हजार 830 मतदाता थे। जिनमें 1 लाख 13 हजार 61 पुरुष और 1 लाख 12 हजार 744 महिला मतदाताओं की संख्या थी। वहीं अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र भले ही अनारक्षित है, लेकिन आज भी जीत और हार का फैसला ग्रामीण और आदिवासी मतदाता करते हैं। समीकरण के हिसाब से मानें तो गोंड, कंवर, उरांव और रजवार समाज के मतदाता ही जीत और हार में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा रजवार जाति की भी बहुलता अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र में है। इस विधानसभा में अंबिकापुर, लखनपुर और उदयपुर विकासखंड के क्षेत्र आते हैं। विधानसभा की भौगोलिक स्थिति भी सीधी ही है।
स्थानीय मुद्दे
- स्वास्थ्य
- शिक्षा
- पेयजल
- सिंचाई
- कृषि
- बेरोजगारी
- ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं का आभाव
पहले चरण में हुआ था 78 प्रतिशत मतदान
पहले चरण में 7 नवंबर को 20 विधानसभा सीटों पर चुनाव संपन्न हुए थे। इसके तहत छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित संभाग बस्तर की 12 सीटें और दुर्ग संभाग के नक्सल प्रभावित जिले राजनांदगांव, कवर्धा और खैरागढ़ की 8 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए थे। पहले चरण में कुल 78 प्रतिशत मतदान हुआ था। बस्तर की सभी 12 सहित कुल 16 सीटों पर पिछले चुनावें की तुलना में इस बार अधिक वोटिंग हुई है। वहीं 2018 की तुलना में 4 सीटों पर कम मतदान हुआ है। इन 4 सीटों में कबीरधाम जिला की दोनों सीट पंडरिया और कवर्धा के साथ खैरागढ़- छुईखदान जिला की खैरागढ़ सीट और राजनांदगांव जिला की खुज्जी सीट शामिल है। बस्तर संभाग की सभी 12 सीटों पर इस बार रिकार्ड तोड़ वोटिंग हुई है।