जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक
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अगले साल यूपी में विधानसभा के चुनाव होने हैं, लेकिन इसका असर हरियाणा पर दिखाई देने लगा है। इसी कारण प्रदेश की भाजपा सरकार अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक के आगे कमजोर पड़ गई और उनसे बातचीत के लिए एक मंत्री को दिल्ली भेजना पड़ा।
यूपी में जाटों का धरना-प्रदर्शन शुरू होने से पहले हरियाणा में जाटों के धरनों को खत्म कराने के केंद्र के दबाव के चलते प्रदेश सरकार को यशपाल मलिक से उन पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के बावजूद बातचीत करनी पड़ी और उनकी अधिकतर शर्तों को पूरा करने का भरोसा दिया।
आरक्षण समेत कई मांगों को लेकर 5 जून से शुरू हुए जाटों के धरनों ने प्रदेश के साथ ही केंद्र सरकार को टेंशन में रखा। सबसे बड़ी टेंशन यूपी चुनाव को लेकर थी, जिसमें जाट वोटों के डैमेज का डर केंद्र को ज्यादा सताता रहा। दरअसल, यूपी के जाटों को प्रदेश में आरक्षण का लाभ मिल रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण रद्द होने के कारण वह केंद्रीय सेवाओं में फायदा देने की मांग कर रहे हैं। इसलिए यूपी के जाट सीधे केंद्र सरकार के खिलाफ खड़े हैं। माना जाता है कि यशपाल मलिक की यूपी के जाट बेल्ट में अच्छी पकड़ है।
ऐसे में यदि हरियाणा के जाटों के समर्थन में पश्चिमी यूपी में भी धरना-प्रदर्शन शुरू हो जाते तो उससे केंद्र सरकार के सामने समस्या खड़ी हो जाती। यही नहीं इसका असर यूपी के विधानसभा चुनाव पर साफ दिखाई देता। यूपी में जाटों का धरना-प्रदर्शन शुरू हो जाता तो आंदोलन लंबा खिंच सकता था। इसी के मद्देनजर केंद्र ने खट्टर सरकार को जल्द से जल्द मलिक को मनाकर मामला सुलझाने के लिए कहा।
भाजपा सूत्रों की माने तो यूपी चुनाव को देखते हुए हाईकमान जाटों के आंदोलन से संबंधित हर पल की जानकारी लेता रहा और प्रदेश सरकार को किसी भी तरह से जाटों को मनाने के लिए कहा गया। वहीं, मलिक पर देशद्रोह का केस दर्ज होने के कारण सरकार किरकिरीसे बचने के लिए उनसे मीटिंग नहीं करना चाहती थी। सरकार ने खापों के मुखिया और अन्य जाट नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन उनसे बात नहीं बनी तो मलिक से दिल्ली में बातचीत करनी पड़ी।