यमन में जारी हिंसा का जबरदस्त असर भारत के चावल उद्योग पर पड़ा है। एक अनुमान के अनुसार देश का करीब 1400 करोड़ रुपये का चावल सऊदी अरब और अन्य रास्तों में फंसा हुआ है।
फंसे चावल में आधे से ज्यादा हिस्सा हरियाणा और खासकर करनाल के चावल निर्यातकों का है। आशंका जताई जा रही है कि यमन में छिड़ी हिंसा के बीच कई स्थानों पर चावल की लूट की गई है और फिलहाल किसी भी चावल की खेप के साथ कोई नहीं है और न ही उसका कोई रखवाला है। उधर, चावल निर्यातकों ने केंद्र सरकार से इस मामले में दखल की मांग की है।
करीब एक माह से यमन में जारी हिंसा का असर चावल उद्योग पर भी पड़ा है। एक और जहां सरकार ने सफलता पूर्वक यमन में रह रहे भारतीयों को लाने में सफलता पाई है, वहीं भारत से बासमती की बड़ी खेप अभी तक अरब देशों में विभिन्न बंदरगाहों पर अटकी पड़ी है, जिससे चावल निर्यातकों के भविष्य पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
हर माह होता 25 हजार एमटी चावल निर्यात
आंकडे़ बताते हैं कि भारत से सालाना 40 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल निर्यात होता है। इसमें अकेले हरियाणा का हिस्सा 45 प्रतिशत है और प्रदेश में करनाल का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है। हरियाणा में 1200 राइस मिल हैं और इनमें से 350 अकेले करनाल जिले में हैं, जो ज्यादातर बासमती चावल का ही काम करते हैं।
वहीं अगर यमन की बात करें तो वहां प्रतिमाह 25 हजार मीट्रिक टन बासमती चावल भारत से निर्यात होता है। इसके अलावा 8 से 10 एमटी गैर बासमती चावल भी निर्यात होता है। विदेशी डॉलर और बासमती के रेट (120 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम) के हिसाब से अगर 25 हजार एमटी चावल की कीमत की बात करें तो यह आंकड़ा करीब 1400 करोड़ रुपये बनता है। इनमें से आधे के करीब चावल हरियाणा का है और हरियाणा में ज्यादातर चावल करनाल के निर्यातकों का है।