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वाह रे शिक्षा विभाग! हजारों के खर्चे दिखे नहीं, माह के 75 रुपये माफ कर लूट जा रही वाहवाही

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चंडीगढ़। कोरोना काल में हर किसी ने दुख झेले हैं, लेकिन सर्वाधिक मार गरीबों पर पड़ी है। किसी परिवार की नौकरी गई तो किसी का व्यवसाय खत्म हो गया। इन परिवारों के बच्चों को राहत देने के लिए शिक्षा विभाग ने 152 रुपये फीस को माफ करते हुए 75 रुपये (50 फीसदी फीस माफ) कर दिया, लेकिन यह माफ की गई फीस मजाक बन गई। इन परिवारों व छात्रों को यह रास नहीं आई। उनका तर्क है कि शिक्षा विभाग ने असली खर्च को नहीं देखा जो 800 से 1000 रुपये प्रति माह है। विभाग मासिक फीस में 50 फीसदी छूट देने के बाद कह रहा है कि उन्होंने छह महीने की फीस माफ की है। अभिभावक विभाग की इस व्यवस्था को केवल वाहवाही लूटने जैसा बता रहे हैं। उनका कहना है कि पूरी फीस माफ होती तो बात बनती।
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छात्रों की पढ़ाई पर खर्च हो रहे पैसों का गणित
नौवीं-दसवीं की वार्षिक फीस 164 रुपये और मासिक 152 रुपये है। वहीं दोनों कक्षाओं के विद्यार्थियों की किताबें, ड्रेस, सीबीएसई फीस और इंटरनेट इत्यादि का खर्चा हजारों रुपये का है। इस असली खर्च में शिक्षा विभाग ने किसी तरह की राहत नहीं दी है। विद्यार्थियों के मुताबिक एक विद्यार्थी का कक्षा का स्टेशनरी का खर्च 1200 से 1300 रुपये का है। स्कूल ड्रेस और जूतों पर 1000 से 1500 रुपये खर्च होते हैं। हर माह इंटरनेट पर भी कम से कम 200 रुपये खर्च है। वहीं नौवीं में सीबीएसई की रजिस्ट्रेशन फीस लगभग 400 रुपये अलग से है। दसवीं कक्षा में सीबीएसई का परीक्षा शुल्क एक विद्यार्थी का 2100 रुपये के आसपास है। इस तरह पूरा खर्च जोड़ें तो हजारों में पड़ रहा है।
ये है वार्षिक शुल्क
एडमिशन फीस 12 रुपये
अध्ययन यात्रा 62 रुपये
मैगजीन फीस 50 रुपये
बिल्डिंग फीस 15 रुपये
स्पोर्ट्स फीस 25 रुपये
ये है मासिक शुल्क
ट्यूशन फीस 37 रुपये
स्टेशनरी 20 रुपये
समामेलित फंड 25 रुपये
हेल्थ फंड 6 रुपये
ऑडियो-विजुअल फंड 6 रुपये
रेडक्रास फंड 7 रुपये
चाइल्ड वेलफेयर फंड 7 रुपये
साइंस फंड 7 रुपये
वर्क एक्सपीरियंस फंड 10 रुपये
साइकिल फंड 2 रुपये
आईटी फंड 25 रुपये
जुलाई में जारी हुए थे यह आदेश, अब फिर से दोहराए
शिक्षा विभाग ने 26 जुलाई को सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे नौवीं-दसवीं के विद्यार्थियों की 50 प्रतिशत फीस माफ की थी। इसमें विद्यार्थियों की वार्षिक और मासिक फीस शामिल थी। इसी निर्देश को जिला शिक्षा अधिकारी ने बुधवार को दोबारा सभी स्कूलों को भेजा, क्योंकि स्कूल अप्रैल में ही विद्यार्थियों से वार्षिक शुल्क ले चुके थे। ऐसे में उसे एडजस्ट कैसे किया जाए, इसे लेकर स्कूल असमंजस में थे। सरकारी स्कूल के विद्यार्थी इंटरनेट रिचार्ज, हजारों की किताबें और ड्रेस, सीबीएसई शुल्क इत्यादि में राहत की मांग करते आ रहे थे, क्योंकि स्कूल की फीस इतनी अधिक नहीं है, स्कूल का अन्य खर्च हजारों का होने के कारण विद्यार्थियों को उसे पूरा करने में समस्या आती है। हालांकि इसमें स्कूल अपने स्तर पर एनजीओ और समाजसेवियों की सहायता लेकर विद्यार्थियों की आर्थिक सहायता करते हैं। इसके साथ ही कॉलोनी और गांव के कई स्कूलों में जहां शिक्षक अपने ग्रुप बनाकर फंड इकट्ठा करते हैं और उसे विद्यार्थियों की विभिन्न फीसों, किताबों और रिचार्ज इत्यादि में इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर हजारों रुपये के खर्च के बीच 50 फीसदी स्कूल फीस में छूट पर्याप्त नहीं है।
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वर्जन---
शिक्षा विभाग का बजट सीमित ही है। लॉकडाउन और कोरोना महामारी के कारण विद्यार्थियों की हमने अपने स्तर पूरी आर्थिक सहायता करने की कोशिश की है। कम बजट के कारण हमने 50 प्रतिशत फीस माफ की है। वहीं स्कूल एनजीओ का सहारा लेकर विद्यार्थियों की मदद कर देते हैं। -सरप्रीत सिंह गिल, शिक्षा सचिव, यूटी
दसवीं तक की शिक्षा मुफ्त करनी चाहिए
सरकारी स्कूलों में आठवीं तक शिक्षा मुफ्त होती है। ऐसे ही अगर सभी वर्गों को शिक्षा मुहैया करवानी है तो सरकारी स्कूलों में दसवीं तक सभी शुल्क माफ किए जाने चाहिए, क्योंकि कोरोना के बाद आर्थिक हालात खराब होने के साथ ऑनलाइन पढ़ाई के कारण हर माह इंटरनेट का खर्च भी बढ़ गया है। - मनीष सोनी, अभिभावक और अध्यक्ष, पेरेंट्स यूनियन फॉर जस्टिस
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