सीटी स्कैन के दौरान निकलने वाले रेडिएशन से कैंसर के चांस को सिरे से खारिज कर दिया गया है। इस पर पीजीआई में इमरजेंसी रेडियोलॉजी की तीन दिवसीय कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें इस क्षेत्र के पितामह कहे जाने वाले अमेरिकी प्रांत स्थित इलिनोएस की रस यूनिवर्सिटी मेडिकल के डिपार्टमेंट ऑफ रेडियोलाजी के प्रोफेसर लियोनार्ड बर्लिन भी पहुंचे।
उनका कहना है कि अब तक ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है, जिससे माना जाए कि सीटी स्कैन के डोज से कैंसर का खतरा रहता है। यह सब एक मनगढ़ंत कहानी है। इसे यूएस मीडिया के एक दो घरानों ने ही फैला रखा है।
यह जरूर है कि जब भी रेडिएशन प्लांट में एक्सीडेंट जैसी कुछ घटनाएं होगी, तभी कैंसर होने की संभावना रहेगी। प्लांट से रेडिएशन लीक होने पर लोग ल्यूकेमिया, थायराइड व ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ सकते हैं। जापान में लंग्स कैंसर के भी सुबूत मिले हैं।
नहीं मिले रेडिएशन से कैंसर के सबूत
प्रोफेसर लियोनार्ड बर्लिन ने बताया कि सीटी स्कैन के दौरान रेडिएशन के बहुत ही कम डोज दिए जाते हैं। यदि किसी मरीज का तीन से चार बार सीटी स्कैन हो तब भी उसके रेडिएशन का डोज उस स्थिति तक नहीं पहुंच सकता, जिससे कैंसर होने को खतरा हो।
सिर के सीटी स्कैन में पांच एमएल सीव्रत का प्रयोग होता है, जबकि चेस्ट में 10 एमएल सीव्रत तो पेट के लिए 10-15 सीव्रत का इस्तेमाल किया जाता है।
शून्य से लेकर 100 एमएल सीव्रत डोज तक किसी भी तरह के कैंसर का कोई खतरा नहीं है। इस तरह से कैंसर होने के अब तक कोई भी प्रमाण भी नहीं मिले हैं। उन्होंने बताया कि रेडिएशन से चिकित्सकों को भी कोई खतरा नहीं है।
साल 1960-70 के बाद से कोई भी ऐसी सूचना नहीं मिली है, जिससे किसी डाक्टर को रेडिएशन से खतरा पैदा हुआ हो। सीटी स्कैन करते वक्त डाक्टरों को सुरक्षा को पूरा इंतजाम करना चाहिए।
रेडियोलाजिस्ट का विकल्प है टेलीरेडियोलॉजी
न्यू डेली आपरेशन सेंटर की डायरेक्टर डॉ. अंजलि अग्रवाल के मुताबिक, भारत में एक लाख लोगों पर एक रेडियोलाजिस्ट है, जबकि अमेरिका में दस हजार पर एक। रेडियोलाजिस्ट की बेहद कमी है। ऐसे में टेलीरेडियोलाजी का कंसेप्ट काम कर सकता है।
धीरे-धीरे यह काफी सक्सेस होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि दूर-दराज गांवों में इमेजिंग सेंटर तो हैं, लेकिन रेडियोलाजिस्ट नहीं मिलते। ऐसे में टेलीरेडियोलाजी के तहत वे इमेजिंग भेजकर रेडियोलाजिस्ट आईपैड या लैपटॉप में आसानी से देख सकता है।
एम्स सहित कई इंस्टीट्यूट इस टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं। इस तकनीक के तहत रेडियोलाजिस्ट 24 घंटे 365 दिन मौजूद रह सकता है।