पंजाब भाखड़ा-ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) की स्थापना को मान्यता नहीं देता और इस संबंध में एक मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यह खुलासा शनिवार को पंजाब प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को लिखे एक पत्र में किया। पत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि वह केंद्र सरकार की ओर से बीबीएमबी की स्थायी सदस्यता से पंजाब और हरियाणा को अलग किए जाने के फैसले का विरोध दर्ज कराएं और इस संबंध में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात करें। पत्र में उन्होंने कहा कि पंजाब-हरियाणा बीबीएमबी के मालिक हैं और सारा खर्च उठा रहे हैं।
जाखड़ ने पत्र में लिखा कि यह मानते हुए कि बच्चे का जन्म अमान्य है, पंजाब ने कभी भी बीबीएमबी की स्थापना को मान्यता नहीं दी है। उन्होंने कहा कि बीबीएमबी की स्थापना पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 78-80 के तहत की गई थी। पंजाब ने इन धाराओं की संवैधानिक वैधता को संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत चुनौती दी है, जो सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। पंजाब का कहना है कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 को संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत निहित किया गया है, इसलिए बीबीएमबी की ओर से किए जा रहे अंतरराज्यीय जल के वितरण, नियंत्रण और प्रबंधन को इस अधिनियम के तहत निपटाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि अंतर्राज्यीय जल वितरण, नियंत्रण और प्रबंधन, संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत आते हैं और संविधान के इन प्रावधानों के तहत कोई कानून नहीं बनाया गया है। इसके अलावा पानी, राज्य सूची (सातवीं अनुसूची की सूची 2) की प्रविष्टि 17 के तहत राज्य का विषय है और अंतर्राज्यीय जल, संविधान की संघ सूची (सातवीं अनुसूची की सूची 2) की प्रविष्टि 56 के तहत आता है।
जाखड़ ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि पंजाब और हरियाणा बीबीएमबी के मालिक व सदस्य हैं। वे बोर्ड के खर्च के लिए धन मुहैया कराते हैं। यहां तक कि इन दोनों राज्यों से कर्मचारियों को बोर्ड में प्रतिनियुक्ति पर लिया जाता है। उन्होंने कहा कि नए संशोधन के बाद अब बोर्ड के सदस्यों के तौर पर हरियाणा और पंजाब के अधिकारियों को नियुक्त करना अनिवार्य नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि चूंकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियां हरियाणा और राजस्थान के बीच अंतरराज्यीय नदियां नहीं हैं, इसलिए इन नदियों के जल का वितरण, प्रबंधन और नियंत्रण किसी भी केंद्रीय कानून के तहत नहीं किया जा सकता है। जाखड़ ने आगे कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के तहत बीबीएमबी की स्थापना की वैधता को चुनौती दी गई है, बीबीएमबी के मालिक-सदस्यों (पंजाब व हरियाणा) के मौजूदा अधिकारों और विशेषाधिकारों को हटाने वाले बीबीएमबी नियमों में संशोधन गलत और अमान्य है। ऐसे में केंद्र को अपना फैसला तब तक वापस ले लेना चाहिए, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से निर्णय नहीं ले लिया जाता।
जाखड़ ने चन्नी को लिखा, पीएम के समक्ष मुद्दा उठाएं
पंजाब प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने इस मामले पर राज्य के सभी सियासी दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होने का आह्वान करने के अगले ही दिन शनिवार को मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को पत्र लिखकर मांग की कि वह बीबीएमबी नियमों में संशोधन के मसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष उठाएं। जाखड़ ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वह इस मामले पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखें और एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए प्रधानमंत्री से मुलाकात भी करें। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 23 फरवरी को बीबीएमबी नियम 1974 में संशोधन करने के लिए एक अधिसूचना जारी की है, जिसमें बोर्ड के पूर्णकालिक सदस्यों के चयन के मानदंड में बदलाव किया गया है। केंद्र के इस फैसले से पंजाब के लोगों में रोष पनपने लगा है, क्योंकि इन संशोधित नियमों के सहारे अब पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति ओपन सिलेक्शन के माध्यम से किसी भी राज्य से की जा सकेगी। अब तक लागू नियमों के अनुसार पूर्णकालिक सदस्य राज्य पंजाब और हरियाणा से ही अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लिया जाता रहा है।